Profile cover photo
Profile photo
vijay shanker Singh
94 followers
94 followers
About
Posts

Post has attachment
#नौकरशाही
इहो काम सरकारी, ऊहो काम सरकारी.

दिल्ली के नौकरशाह, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के आदेश को इसलिए नहीं मान रहे हैं कि गृह विभाग का कोई सर्कुलर उनके पक्ष में है। अब उन्हें यह कौन समझाए कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का निर्णय सबसे ऊपर और अंतिम होता है, जब तक कि उससे बड़ी संविधान पीठ ने कोई और फैसला न दे दिया हो ।

जयपुर के नौकरशाहों को यह हुक्म हुआ है कि प्रधानमंत्री की सभा के लिये भीड़ जुटाएं। यहां एक अवैधानिक ज़ुबानी हुक्म ने ही रीढ़ झुका दी। भीड़ तो जुटानी पड़ेगी ।

एक किस्सा पढ़ लें।
पहले प्राइमरी स्कूलों की चेकिंग के लिये डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स जिन्हें डिप्टी साहब कहा जाता था, आया करते थे। डिप्टी साहब का दौरा बड़ा हंगामाखेज होता था। पूरा स्कूल जुट जाता था उनकी आवभगत में। कहीं से टेंट, कहीं से कुर्सी मेज़, कहीं से मसहरी कहीं से मुर्गा मछली, आदि लोग जुगाड़ से ले आते थे। ऐसे ही एक स्कूल में एक हेड मास्टर साहब कुछ सहायक अध्यापकों को लेकर टेंट गड़वा रहे थे। एक नए नए मास्टर थे जो टेंट के लिये खूंटा गाड़ रहे थे। उन मास्टर साहब के एक मित्र अचानक वहीं से गुज़र रहे थे। मास्टर साहब, पसीने से लथपथ कुछ बच्चों के साथ टेंट के लिये खूंटा लगाने में व्यस्त थे। मित्र ने पूछा,
" अरे मास्टर साहब, यह क्या ? आप खूंटा क्यों गाड़ रहे हैं ? आप का काम थोड़े ही है । आप का काम तो पढ़ाना है । "
मास्टर जी ने कहा,
" अरे डिप्टी साहब आ रहे हैं। उनका मुआयना है। उसी कर लिये व्यवस्था की जा रही है। हेड मास्टर साहब, हलुआई ठीक करने गए हैं, और हमसे कह गए कि टेंट खड़ा करवा दीजिये। अब टेंट भी तो जुगाड़ से आया है। टेंट उतार कर आठ खूंटा दे कर चला गया। कह गया कि आप इसे गाड़िये और तंबू तान दीजिये। तो वही कर रहा हूँ। "
" फिर भी मास्टर साहब आप को तो पढ़ाने की नौकरी मिली है न कि तंबू खड़ा करने की। '
तब मास्टर जी ने खिसियाहट से हंसते हुए कहा,
" इहो काम सरकारी, ऊहो काम सरकारी। चाहे लइका पढ़वा लो चाहे खूंटा गड़वा लो। "
तब तक आखिरी खूंटा गड़ चुका था। वे बच्चों की सहायता से तंबू तानने में लग गए।

यह किस्सा मुझे एक प्रायमरी स्कूल के अध्यापक ने सुनाया था। पहले के प्राइमरी स्कूल जिला परिषद के अधीन होते थे। और बताते हैं कि डिप्टी साहब का मुआयना बड़ा महत्वपूर्ण होता था।

यह बात पुरानी है। यह किस्सा पुराना है। सच है या झूठ मैं नहीं बता पाऊंगा। पर आज भी नौकरशाही, अपना मूल काम, सरकारी नियमो के अनुसार न कर के खूंटा गाड़ने का काम करने लगती है। खूंटा गाड़ने का काम हमने भी किया है। हम उसे बेगारी कहते थे। जिस काम के लिये भर्ती हुए वह न कर के वह सब करने लगे जिन्हें नहीं करना चाहिये। बड़े बड़े असरदार सरकारी अफसर, बड़े बड़े नेताओं के हमप्याला हमनिवाला हो कर राजनीतिक दलों को चलाते हैं, लोगों को टिकट दिलवाते हैं, बड़े बड़े ठेकों में, बड़ी बड़ी योजनाओं में बिचौलिए की भूमिका निभाते हैं, चुनाव में खुल कर किसी दल विशेष के साथ हो जाते हैं। क्या यह नौकरशाही का पतन नहीं है। मैं अत्यंत प्रतिभावान सेवाओं की बात कर रहा हूँ, अधीनस्थ सेवाओं की तो बात ही छोड़िये। नौकरशाही की अब लगता है रीढ़ ही नहीं है। सरीसृप हो गए हैं। लेकिन अधिकांश नौकरशाही ऐसी नहीं है। बहुत से निष्ठावान और न झुकने वाले, नियम कायदे से काम करने वाले अफसर भी हैं। पर अधिकतर वे उपेक्षित रहते हैं। अपने इन्ही गुणों के कारण वे सवागत कष्ट भोगते रहते हैं । मैं कोई राज़ की बात नहीं कह रहा हूँ। यह सब अयां है।
#vss

नौकरशाही - इहो काम सरकारी, उहो काम सरकारी / विजय शंकर सिंह http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2018/07/blog-post_27.html
Add a comment...

Post has attachment
वायदा और वायदाखिलाफी भरमाने वाले वायदे केवल भरमाने के लिये ही किये जाते हैं / विजय शंकर सिंह http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2018/07/blog-post_5.html
Add a comment...

Post has attachment
#दिल्लीसरकर
दिल्ली पर जमा हुआ धूल का बादल - उपराज्यपाल और केजरीवाल के बीच बढ़ती रस्साकशी .

आज जैसी स्थिति दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और उप राज्यपाल के बीच तनातनी की आ गयी है अगर वैसी ही स्थिति किसी अन्य राज्य में होती तो क्या इसे उसी दृष्टिकोण से देखा जाता जिस तरह से आज देखा जा रहा है ? आप कहेंगे कि दिल्ली पूरा राज्य नहीं है अधूरा है। वहां के एलजी के पास सारी ताक़त है। वही सीएम की सारी फाइलें पास करता है। अगर हाई कोर्ट का आदेश देखें तो वही सचमुच में बॉस है। अब जब कानून ही ने एलजी को बॉस बता दिया तो क्या कहा जाय। कानून तो सबसे ऊपर है।

केजरीवाल ने कुछ योजनाओं को लागू करने के लिये नियमानुसार एलजी के पास पत्रावली भेजी और उस पर एलजी बैठ गए। पत्रावली पर बैठ जाना सचिवालय और सचिव की पुरानी आदत है। एलजी सर भी ठहरे एक नौकरशाह। वह भी स्टील फ्रेम वाले। जंग भी थोड़ा बहुत खा जाय तो स्टील तो स्टील ही होता है। उन्होंने उन फाइलों पर कोई निर्णय ही नहीं लिया। अब केजरीवाल मय लवाजमा लिये दिये एलजी हाउस में दाखिल हो गये। लेकिन एलजी ने मिलने से इनकार कर दिया। सारा लवाजमा धरने पर बैठ गया। धरने से और कुछ हो न हो एक फ़िज़ा तो बनेगी, सो फ़िज़ा बननी शुरू हो गयी। दिल्ली वैसे भी इन दिनों अंधी है। खबर फरोश बता रहे हैं कि दिल्ली के ऊपर तो धूल ने डेरा जमा लिया है सो न दिल्ली ऊपर से किसी को दिख रही है और न दिल्ली वाले किसी को देख पा रहे हैं।

तीन दिन से अधिक हो गए दिल्ली की मुन्तख़ब हुयी सरकार को दिल्ली की कानूनी सरकार के दीवान ए खास में कब्ज़ा जमाये। अरविंद केजरीवाल भी वैसे तो हैं एक पूर्व नौकरशाह और टेक्नोक्रेट, पर उन्हें नौकरशाही कभी रास नहीं आयी। वे ठहरे एक्टिविस्ट। एक्टिविज्म का कीड़ा जिसे काट ले वह सदैव एक्टिव ही रहता है और एक्टिविस्ट तथा शासक प्रशासक की भूमिका में तालमेल कम ही बैठ पाता है। यह जंग या रस्साकशी जो दोनों सरकारों के बीच चल रही है वह लोकतंत्र के लिये सुखद संकेत नहीं है। एक तरफ तो उप राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि है और दिल्ली के सिलसिले में उसे अतिरिक्त और विशेष अधिकार प्राप्त है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री को जनता ने चुना है और उसकी जवाबदेही जनता के प्रति है। जब कि एलजी किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है सिवाय अपने आका के जो कि केंद्र सरकार है।

एक सहज सवाल उठता है कि, क्या एक मुख्यमंत्री अपने सहयोगियों के साथ, एलजी के राजकीय आवास में उनसे मिलने की प्रतीक्षा में बैठा है और एलजी उससे मिलने के लिये कुछ कमरों की दूरी तय नहीं कर पा रहा है ! क्या उसका आचरण औपनिवेशिक काल के सामन्त की तरह नहीं दिख रहा है ? इतनी भी तमीज एलजी साहब को नहीं है कि वे उन प्रस्तावों पर मुख्यमंत्री से मिल कर जो उन्ही के ड्राइंग रूम में बैठा है, जा कर विन्दुवार चर्चा कर लेते। अगर तत्काल चर्चा करना किन्ही तकनीकी कारणों से संभव नहीं है तो यह तो वे कह ही सकते हैं कि आप लोग अभी तशरीफ़ ले जाइए और चर्चा की कोई और तिथि तय कर दी जाती। पर उस दर्प के वायरस का वे क्या करें जो सिविल सेवा की परीक्षा पास करते ही स्वभावतः दिमाग के एक कोने में आ बैठती है और गाहे बगाहे सिस्टम को हैंग करती रहती है।

आज चार मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समर्थन में दिल्ली आए हैं। बंगाल, केरल, कर्नाटक और आंध्र के। इनका अनुराग केजरीवाल से है या नहीं, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता है पर ये अच्छी तरह से जानते हैं कि राज्यपाल केंद्र के इशारे पर चलता है और देर सबेर ऐसी ही या इसी प्रकार की मिलीजुली असहज स्थिति से इन्हें भी रूबरू होना पड़ सकता है। ये सभी क्षेत्रीय दल हैं या कुछ ही राज्यों में सीमित हैं। कांग्रेस का रवैया थोड़ा इनसे अलग है। कांग्रेस दिल्ली में आआपा द्वारा अपदस्थ की गई है और वह खुद को दिल्ली में केजरीवाल की प्रतिद्वंद्वी मानती है, और है भी। शीला दीक्षित जब यह कहती हैं कि उनके समय तो कोई बात ही नहीं हुई और एलजी से संबंध उनके मधुर थे, तो वे यह भूल जाती हैं कि अपने 15 साला शासन में वे दस साल उस समय थीं जब केंद्र में कांग्रेस का शासन था और पांच साल जिस भाजपा का शासन था उसके प्रधानमंत्री अटल जी थे जो इन सब क्षुद्र मामलों में पड़ने वाले राजनेता नहीं थे। दूसरे शीला दीक्षित कोई एक्टिविस्ट नहीं थी और अनुभवी नेता थीं और नौकरशाही में उनकी व्यक्तिगत पैठ भी थी। एलजी और मुख्यमंत्री विवाद से एक मौलिक प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि जनता का चूना हुआ व्यक्ति ही शक्तिशाली है या फिर केंद्र द्वारा थोपा हुआ नौकरशाह। लोकतंत्र, चुने हुए व्यक्ति की बात करता है।

दिल्ली में एलजी की चलेगी या सीएम की, यह तो बाद में तय होता रहेगा, पर मेरी समझ मे एलजी का यह दर्पयुक्त निर्णय कि चाहे जितना भी धरना दे लो मैं बिल्कुल नहीं मिलूंगा अनुचित और अभद्र फैसला है। उनके इस फैसले से जनता में यह क्षवि बन रही है कि केजरीवाल सच मे जनता के लिये कुछ बेहतर करना चाहते हैं, पर वे क्या करें, एलजी करने ही नहीं देता। एलजी का यह निर्णय चाहे उनका अपना हो पर सामान्य धारणा यही है कि वे यह सब केंद्र के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं। केंद्र को चाहिए कि यह अशोभनीय सिलसिला खत्म हो और जिसके जो जो संवैधानिक अधिकार हों उन्हीं के अंतर्गत मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल बात कर के यह तमाशा बंद करें। केजरीवाल को आप कितना ही कुछ कहें, पर एक बात ध्रुव सत्य है कि दिल्ली के वे निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं और उन्हें वही जनादेश प्राप्त हुआ है जो सभी निर्वाचित सरकारोँ को संसदीय लोकतंत्र में प्राप्त होता है।
#vss

दिल्ली पर जमा हुआ धूल का बादल - उपराज्यपाल और केजरीवाल के बीच बढ़ती रस्साकशी - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2018/06/blog-post_17.html
Add a comment...

Post has attachment


नौकरशाही में सीधी भर्ती - एक चर्चा.

सरकार ने संयुक्त सचिव स्तर पर 10 पेशेवर लोगों को नियुक्त करने का निर्णय किया है। ये पेशेवर लोग सिविल सेवा के इम्तेहान के माध्यम से नहीं बल्कि एक इंटरव्यू के द्वारा चुने जाएंगे। इनके पेशेवराना अनुभवों का लाभ सरकार को नीति निर्माण में मिलेगा। ऐसा सरकार का मानना है। सरकार अपनी इस योजना पर कितना सफल होती है, यह तो भविष्य में ही पता चल पाएगा।
अब एक नज़र भारत मे सिविल सेवा के विकास पर भी डालते हैं।

लार्ड कार्नवालिस (गवर्नर-जनरल, 1786-93) पहला गवर्नर-जनरल था, जिसने भारत में इन सेवाओं को प्रारंभ किया तथा उन्हें संगठित किया। उसने भ्रष्टाचार को रोकने और सेवाओं की बेहतरी के लिये निम्न कदम उठाये। क्यो कि लार्ड कार्नवालिस यह मान बैठा था कि , “ हिन्दुस्तान का प्रत्येक नागरिक भ्रष्ट है। ”

* वेतन में वृद्धि।
* निजी व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध।
* अधिकारियों द्वारा रिश्वत एवं उपहार इत्यादि लेने पर पूर्ण प्रतिबंध।
* वरिष्ठता (seniority) के अधर पर तरक्की (Promotion) दिए जाने को प्रोत्साहन।

1793 के चार्टर एक्ट द्वारा 500 पाउंड वार्षिक आय वाले सभी पद, कंपनी के अनुबद्ध अधिकारियों (Covenanted Servents) के लिये आरक्षित कर दिये गये थे। कंपनी के प्रशासनिक पदों से भारतीयों को पृथक रखने के निम्न कारण थे।

वर्ष 1800 में, वैलेजली (गवर्नर-जनरल, 1798-1805) ने प्रशासन के नये अधिकारियों को प्रशिक्षण देने हेतु कलकत्ता में, फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना की। वर्ष 1806 में कम्पनी के कोर्ट आफ डायरेक्टर्स ने वैलेजली के इस कालेज की मान्यता रद्द कर दी तथा इसके स्थान पर इंग्लैण्ड के हैलीबरी (Haileybury) में नव-नियुक्त अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु ईस्ट इंडिया कॉलेज की स्थापना की गयी। यहां भारत में नियुक्ति से पूर्व इन नवनियुक्त प्रशासनिक सेवकों को दो वर्ष का प्रशिक्षण लेना पडता था।

1853 के चार्टर एक्ट द्वारा नियुक्तियों के मामले में डायरेक्टरों का संरक्षण समाप्त हो गया तथा सभी नियुक्तियां एक प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा की जाने लगीं जिसमें किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं रखा गया।
अंग्रेजों को यह विश्वास था कि ब्रिटिश हितों को पूरा करने के लिये अंग्रेजों को ही प्रशासन का दायित्व संभालना चाहिये। अंग्रेजों की यह धारणा कि भारतीय, ब्रिटिश हितों के प्रति अयोग्य, अविश्वसनीय एवं असंवेदनशील साबित होंगे। अतः यह धारणा कि जब तक इन पदों के लिये यूरोपीय ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं तथा उनके बीच ही इन पदों को प्राप्त करने हेतु कड़ी प्रतिस्पर्धा है, तब तक ये पद भारतीयों को नहीं दिये जाने चाहिए।

यद्यपि 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा कंपनी के पदों हेतु भारतीयों के लिये भी प्रवेश के द्वार खोल दिये गये किंतु वास्तव में कभी भी इस प्रावधान का पालन नहीं किया गया। 1857 के पश्चात, 1858 में साम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा में यह आश्वासन दिया गया कि सरकार सिविल सेवाओं में नियुक्ति के लिये रंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगी तथा सभी भारतीय स्वतंत्रतापूर्वक अपनी योग्यतानुसार प्रशासनिक पदों को प्राप्त करने में सक्षम होगे। किंतु इस घोषणा के पश्चात भी सभी उच्च प्रशासनिक पद केवल अंग्रेजों के लिये ही सुरक्षित रहे। भारतीयों को फुसलाने एवं समानता के सिद्धांत का दिखावा करने के लिए डिप्टी मैजिस्ट्रेट तथा डिप्टी कलेक्टर के पद सृजित कर दिये गये, जिससे भारतीयों को लगा कि वे इन पदों को प्राप्त कर सकते हैं किंतु स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। यह पद भी राजभक्त देशी ज़मीदारों की संतानों के लिये ही खोले गए थे। उन्हें सुविधाएं तो थीं पर अधिकार नहीं थे। यह एक प्रकार से राजभक्ति का प्रसाद था।

इसके बाद भारतीय सिविल सेवा अधिनियम, 1861 ( Indian Civil Services Act 1861) पारित किया गया। इस अधिनियम द्वारा कुछ पद अनुबद्ध सिविल सेवकों के लिये आरक्षित कर दिये गये किंतु यह व्यवस्था की गयी कि प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती के लिये अंग्रेजी माध्यम से एक प्रवेश परीक्षा इंग्लैण्ड में आयोजित की जायेगी, जिसमें ग्रीक एवं लैटिन इत्यादि भाषाओं के विषय होगे। प्रारंभ में इस परीक्षा के लिये आयु 23 वर्ष थी। तदुपरांत यह 23 वर्ष से, 22 वर्ष (1860 में), फिर 21 वर्ष (1866 में) और  अंत में घटाकर 19 वर्ष (1878) में कर दी गयी।1863 में, सत्येंद्र नाथ टैगोर ( रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ) ने इंडियन सिविल सर्विस में सफलता पाने वाले प्रथम भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया।

1878-79 में, लार्ड लिटन ने वैधानिक सिविल सेवा (Statutory Civil Service) की योजना प्रस्तुत की। इस योजना के अनुसार, प्रशासन के 1/6 अनुबद्ध पद उच्च कुल के भारतीयों से भरे जाने थे। इन पदों के लिये प्रांतीय सरकारें सिफारिश करेंगी तथा वायसराय एवं भारत-सचिव की अनुमति के पश्चात उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी जायेगी। इनकी पदवी और वेतन संश्रावित सेवा से कम होता था। लेकिन यह वैधानिक सिविल सेवा असफल हो गयी तथा 8 वर्ष पश्चात इसे समाप्त कर दिया गया।

1885 में अपनी स्थापना के पश्चात कांग्रेस ने मांग की कि, इन सेवाओं में प्रवेश के लिये आयु में वृद्धि की जाये। तथा
इन परीक्षाओं का आयोजन क्रमशः ब्रिटेन एवं भारत दोनों स्थानों में किया जाये। कांग्रेस तब आज़ादी के लिये तैयार नहीँ हो पायी थी, वह एक सेफ्टी वाल्व के सिद्धांत पर काम कर रही थी।

इसके बाद, लोक सेवाओं पर एचिसन कमेटी, 1886 (Aitchison Committee on Public Services, 1886) का गठन, लार्ड डफरिन ने 1886 में किया। इस समिति की निम्न सिफारिशें थी।

* सेवाओं में अनुबद्ध (Covenanted) एवं अ-अनुबद्ध (uncovenanted) शब्दों को समाप्त किया जाये।
* सिविल सेवाओं को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाये-
सिविल सेवाः इसके लिये प्रवेश परीक्षायें इंग्लैण्ड में आयोजित की जायें।
प्रांतीय सिविल सेवाः इसके लिये प्रवेश परीक्षायें भारत में आयोजित की जाये।
अधीनस्थ सिविल सेवाः इसके लिये भी प्रवेश परीक्षायें भारत में आयोजित की जाये।
* सिविल सेवाओं में आयु सीमा को बढ़ाकर 23 वर्ष कर दिया जाये।

1893 में, इंग्लैण्ड के हाऊस आफ कामन्स में यह प्रस्ताव पारित किया गया की इन सेवाओं के लिए प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन अब क्रमशः इंग्लैंड एवं भारत दोनों स्थानों में किया जायेगा। किंतु इस प्रस्ताव को कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। भारत सचिव किम्बरले ने कहा कि
“सिविल सेवाओं में पर्याप्त संख्या में यूरोपीयों का होना आवश्यक है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसे त्यागा नहीं जा सकता”।

इसके बाद प्रसिद्ध मांटफोर्ड सुधार, 1919 लागू किया गया।
इन सुधारों में, इस नीति की घोषणा की गयी कि,,
“यदि भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना होती है तो लोक सेवाओं में ज्यादा से ज्यादा भारतीय नियुक्त हो सकेंगे, जो भारतीयों के हित में होगा”।
इसने भी सिविल सेवा की प्रवेश परीक्षा का आयोजन क्रमशः इंग्लैण्ड एवं भारत में कराने की सिफारिश की।
इसने प्रशासनिक सेवा के एक-तिहाई पदों को केवल भारतीयों से भरे जाने की सिफारिश की तथा इसे प्रतिवर्ष 1.5 प्रतिशत की दर से बढ़ाने का सुझाव दिया।

मांटफोर्ड सुधारों के बाद, ली आयोग (1924) का गठन हुआ, जिसने निम्न सिफारिशें कीं-
* भारत सचिव को ही- भारतीय सिविल सेवा, सिंचाई विभाग के इंजीनियरों, तथा भारतीय वन सेवा इत्यादि में नियुक्तियों की प्रक्रिया जारी रखनी चाहिये।
* स्थानांतरित क्षेत्रों यथा- शिक्षा एवं लोक स्वास्थ्य सेवाओं में नियुक्तियों का दायित्व प्रांतीय सरकारों को दे दिया जाये।
* इंडियन सिविल सर्विसेज में भारतीयों एवं यूरोपियों की भागेदारी 50:50 के अनुपात में हो तथा भारतीयों को 15 वर्ष में यह अनुपात प्राप्त करने की व्यवस्था की जाये।
अतिशीघ्र एक लोक सेवा आयोग का गठन किया जाये (1919 के भारत सरकार अधिनियम में भी इसकी सिफारिश की गयी थी)।

भारत सरकार अघिनियम, 1935, में यह सिफारिश की गयी कि केंद्रीय स्तर पर एक संघीय लोक सेवा आयोग तथा प्रांतों में प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की स्थापना की जाये। उसी अधिनियम के अनुसार संघ और प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की स्थापना हुई।

1947 ई के 21 अप्रैल को सरदार बल्लभ भाई पटेल ने सिविल सेवा ( जो आईसीएस के बजाय आईएएस इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन सर्विस बनी, ) के प्रथम बैच के युवा अधिकारियों को, मेटकाफ हाउस में संबोधित करते हुये कहा कि, ये देश के प्रशासन का स्टील फ्रेम है। 21 अप्रैल को इसी लिये सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है।
( क्रमशः )

आगे आज़ादी के बाद सिविल सेवा फिर पुलिस सेवा और पुलिस सुधार पर लेख होंगे ।
#vss




भारत में नौकरशाही का विकास - एक चर्चा - 1 / विजय शंकर सिंह http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2018/06/1.html
Add a comment...

Post has attachment
लोक माध्यम
MONDAY, 14 MAY 2018
Ghalib - Ai taazaa waariididaane bisaate hawaaye dil / ऐ ताज़ा वारिदाने बिसाते हवाये दिल - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 85.
ऐ ताज़ा वारिदाने बिसाते हवाये दिल,
जिन्हार, अगर तुम्हें हवसे नाये वो नोश है !!

Ai taazaa waareedaane bisaate hawaaye dil,
Jinhaar, agar tumhe hawase naaye wo nosh hai !!
- Ghalib

अपनी इच्छाओं की बिसात के नए नए हुक्मरानों, अगर तुम्हें मदिरा पान की इतनी ही इच्छा और लालच है तो, तुम सावधान हो जाओ ।

यह आज के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक शेर है। यह शेर तो लिखा गया है बादशाह के मुसाहिबो के लोभ और अधिकार मद पर एक तंज़ के रूप में पर यह सत्ता के अधिकार के दुरुपयोग पर एक सार्वकालिक शेर है। यहां मदिरा अधिकार के रूप में है, और जैसे अधिक मदिरापान देह और समाज दोनों के लिये घातक होता है वैसे ही सत्ता के अशिकार का अतिशय उपयोग, जो दुरुपयोग में बदल जाता है , करने का लोभ किसी मे है तो वह सावधान हो जाये। यह सत्ता का मद अंततः पराभव की ओर ले जाता है।

यह शेर नए नए बने हुक्मरानों पर ही है । अंतिम मुग़ल सम्राट के पास राज करने लायक कुछ करने के लिये बचा ही नहीं था। लाल किला तो था पर सूरज किले पर ही उदय और अस्त होने लगा था। पर मुंहलगे मुसाहिबो का क्या कीजै। वह तो पतनोन्मुख मुगलों को ही चढाये रहे । रस्सी जल जाने के बाद भी ऐंठन बरकरार थी। उस सिकुड़े राज में भी मुगल बादशाह अपने साथ कई कई पंक्तियों का खिताब धारण करते थे। वे उस सांध्य बेला में भी जिल्ले इलाही ( ईश्वर की छाया ) थे। ग़ालिब उसी अहंकार जो मद्यपी का मिथ्या अहंकार होता है को इंगित कर के यह शेर कहते हैं। सच है अधिकार सुख सबसे मादक होता है और इस मदिरा की तासीर सबसे तीक्ष्ण।

© विजय शंकर सिंह
Add a comment...

Post has attachment
लोक माध्यम
THURSDAY, 17 MAY 2018
Ghalib - Ai dil e naa'aaqbat andesh zabt e shauq kar / ऐ दिल ए नाआकबत अंदेश ज़ब्त ए शौक़ कर - गालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 86.
ऐ दिल ए नाआकबत अंदेश जब्त ए शौक़ कर,
कौन ला सकता है ताब ए जलवा ए दीदार ए दोस्त !!

Ai dil e naa'aaqbat andesh zabt e shauq kar,
Kaun laa saktaa hai taab e jalwaa e deedaar e dost !!
- Ghalib

ना'आकबत अंदेश - परिणाम से अनभिज्ञ
ज़ब्त ए शौक़ - प्रेम या कामनाओं पर नियंत्रण.

परिणाम या अंत से अनभिज्ञ ऐ दिल, तुम ज़रा अपनी कामनाओं, इच्छाओं पर नियंत्रण करो, भला प्रिय के दर्शन करने की सामर्थ्य किसमे है ?

गालिब का यह शेर कर्मो के दर्शन पर है जिसे इस्लाम मे अच्छे आमाल पर स्वर्ग नसीब होने की बात कही गयी है। आकबत या आख़िरत वह क्षण है जब हम संसार से विदा लेते हैं। उस समय जो आमाल रहते हैं, वही संसार मे याद किये जाते हैं। यहां दिल या व्यक्ति को परिणाम या अंत का पता नहीं है। वह उसी अनभिज्ञता में अपनी कामनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं कर पाता है। इसी को इंगित कर के ग़ालिब कहते हैं कि जब तक इन इच्छाओं और कामनाओं पर नियंत्रण नहीं होगा तब तक भला, प्रिय यहां यह ईश्वर का प्रतीक है, के दर्शन या सानिध्य यहां यह जन्नत का प्रतीक है, कैसे प्राप्त होगा। सारी कामनायें और इच्छायें, बस आकबत तक ही है। जैसे ही जीवन शांत हुआ वे भी शांत हो गयीं।

© विजय शंकर सिंह
Add a comment...

Post has attachment
लोक माध्यम
SATURDAY, 19 MAY 2018
Ghalib - Ai baa'e gafalat e nigaah e shauq / ऐ बाए गफलत ए निगाह ए शौक़ / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 88.
ऐ बाए गफलत ए निगाह ए शौक़, वर्ना यां
हर पा रहे संग लख्त ए दिल ए कोह ए तूर था !!

Ai baa'e gaflat e nigaah e shauq, warnaa yaan,
Har paa rahe sang, lakht e jigar koh e tuur thaa !!
- Ghalib

खोज और पहचान न कर पाने की लापरवाही से भरी दृष्टि पर हमें अफसोस है, वर्ना संसार का हर टुकड़ा कोह ए तूर का एक अंश है।

कोह ए तूर वह पहाड़ है जहां हजरत मूसा को ईश्वर के दर्शन हुये थे और 10 समादेशों टेन कमांडमेण्ड्स की घोषणा हुयी थी। हजरत मूसा एक पैगम्बर हैं। यह शेर दृष्टि के परखने के गुण पर है। ग़ालिब को इस बात का अफसोस है कि, संसार मे सब कुछ है, बस हम उसे न देख पाते हैं और न ग्रहण कर पाते हैं। क्यों कि उन चीजों की पहचान करने वाली पारखी दृष्टि का हममे अभाव है। हमारी आंख उतनी गंभीर, दूरदर्शी और अंतर तक भेद सकने वाली नहीं है। ग़ालिब इसी को लापरवाही से भरी दृष्टि कहते हैं। उनका कहना है संसार मे कोह ए तूर सिर्फ तूर ही में नहीं है। यह कोहे तूर संसार के हर टुकड़े में हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं कि खुदा केवल कोहे तूर पर ही रहता है, और उसे पाने के लिये वहां की यात्रा करनी पड़ेगी। अगर हम अपनी नज़र थोड़ी पारखी बना लें तो हर पत्थर ही कोहे तूर का टुकड़ा है। ईश्वर वहां भी है। यह वही ईश्वरीय प्रकाश है जो मूसा को कोहे तूर पर दिखा था। यह शेर भी सूफियाना मिजाज़ का है। अनल हक़ या अहम ब्रह्मास्मि की बात करता है।

बनारस में भी इसी भाव से एक कहावत कहते हैं कि, काशी के कंकड़ कंकड़ में ही शंकर है। तुलसी भी पारखी दृष्टि की।प्रशंसा में यह कहते हैं कि,
सकल पदारथ एहि जग माहीं, कर्म हीन नर पावत नाहीं !!
दृष्टि का पारखी और गुणग्राही होना आवश्यक है।

लगभग ऐसी ही मिलती जुलती बात ग़ालिब से बहुत पहले कबीर कह गए है। कबीर, मृग और कस्तूरी के उपमा और रूपक से अपनी बात कहते हैं । उनका यह दोहा बहुत प्रसिद्ध और बहू श्रुत भी है।

कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे वन माहिं,
ऐसे घटि घटि राम है, दुनिया देखै नाहिं !!
( कबीर )

जिस प्रकार कस्तूरी के नाभि में विद्यमान होते हुये भी, हिरण उसकी सुगन्ध से भ्रमित हो कर जंगल जंगल घूमता रहता है, वैसे ही अपने अंदर ईश्वर को विद्यमान पा कर भी हम चारों तरफ भटक भटक कर खोजते रहते हैं।

© विजय शंकर सिंह
Add a comment...

Post has attachment
लोक माध्यम
SUNDAY, 20 MAY 2018
Ghalib - Ohde par madh e naaz / ओहदे पर मदह ए नाज़ - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 89.
ओहदे पर मदह ए नाज़ के बाहर न आ सका,
गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ !!

Ohade par madah e naaz ke baahar na aa sakaa,
Gar ik adaa ho to, use apni qajaa kahuun !!
- Ghalib

उसके नाज़ नखरे अदा की मैं कितनी प्रशंसा करूँ, उससे बाहर ही नहीं आ सका। यदि एक ही नाज़ ओ अदा हो तो उसे मौत कह दूँ, पर यहां तो हर अदा मौत है। किसकी किसकी प्रशंसा करूँ।
यह अतिशयोक्ति है। ग़ालिब यहां प्रेयसी के नाज़, नखरे, अदा, प्रदर्शन आदि की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं जब इतनी अदाएं भरी पड़ी हैं तो सबकी कहाँ तक तारीफ की जाय। एक एक अदा तो क़ातिल है। मारने वाली है। फिर भी यह प्रेमी का फर्ज है कि और अपनी प्रेयसी के हर नाज़ ओ अदा की तारीफ करे। लेकिन मैं अपना फर्ज या कर्तव्य इस लिये नहीं निभा सका कि इतनी अदाएं और इतनी विशेषताओं की प्रशंसा करना मेरे बस में नहीं है।

© विजय शंकर सिंह
Add a comment...

Post has attachment
लोक माध्यम
TUESDAY, 22 MAY 2018
Ghalib - Aur baazaar se le aaye agar tuut gayaa / और बाजार से ले आये अगर टूट गया / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 90.
और बाज़ार से ले आये अगर टूट गया,
सागर ए जम से मेरा जाम ए सिफाल अच्छा है !!

Aur baazaar se le aaye agar tuut gayaa,
Saagar e Jam se meraa jaam e sifaal achchaa hai !!
- Ghalib

मेरा मिट्टी का प्याला, जमशेद के मणिखचित प्याले से अच्छा है। अगर वह टूट जाय तो मैं वैसा ही दूसरा प्याला बाज़ार से ला सकता हूँ।

ग़ालिब कहते हैं कि, सागर के जम से मेरा जाम ए सिफाल अच्छा है। जम यानी जमशेद जो फारस का राजा था। फारस यानी ईरान का। उसका मदिरा पात्र, जो स्वर्ण का है और रत्नजटित है, बहुत कीमती है, से भी उत्तम, मेरा मदिरा पात्र, जो मिट्टी का बना है, कहीं बहुत अच्छा है। वह सस्ता और मिट्टी का भले ही हो, पर वह जमशेद के प्याले से इसलिए भी अच्छा है कि, वह अगर टूट गया तो मैं दूसरा मदिरा पात्र ला सकता हूँ। ग़ालिब का कहना है कि जो भी मेरे पास है वह किसी अन्य के पास महंगी से महंगी चीज़ हो तो उससे भी अच्छा है। मुझे बादशाह के मणिखचित प्याले का कोई लोभ नहीं है है जो मेरे पास है वही पर्याप्त है और मैं उसी से संतुष्ट हूँ। कम से कम अगर वह टूट जाएगा तो दूसरा प्याला इसी तरह का बाज़ार से तो ला सकता हूँ। पर मणिखचित प्याला अगर जम का मेरा पास हो और वह खो या टूट जाये तो वैसा प्याला कहां से लाऊंगा ? मुझे जमशेद के प्याले का कोई लोभ नहीं है। जो मेरे पास है, जितना और जैसा भी है, पर्याप्त है। मैं उसी में संतुष्ट हूँ।

© विजय शंकर सिंह
Add a comment...

Post has attachment
लोक माध्यम
WEDNESDAY, 23 MAY 2018
Ghalib - Kazaa ne thaa mujhe chaahaa / क़ज़ा ने था मुझे चाहा - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 91.
क़ज़ा ने था मुझे चाहा, ' खराबे नादाए उल्फत, '
फ़क़त ' खराब ' लिखा, बस न चल सका कलम आगे !!

Qazaa ne thaa mujhe chaahaa, kharaabe naadaaye ulfat '
Faqat ' kharaab ' likhaa, bas na chal sakaa qalam aage !!
- Ghalib

मौत ने तो चाहा था कि मै प्रेम की मदिरा पी कर नष्ट हो जाऊं, पर जब लिखना प्रारंभ किया तो बस वह नष्ट ही लिख पाया। उसकी लेखनी थम गयी।

नियति ने तो मेरे भाग्य में , जीवन मे प्रेम की मदिरा पी कर नष्ट हो जाने की बात लिखनी चाही थी। ग़ालिब अपने नियति के लेख की कल्पना करते हुये कहते हैं। खराब ए नादा ए उल्फत , नष्ट हो जाऊं प्रेम की मदिरा पी कर। पर जब नियति ने ग़ालिब का भाग्य लिखना चाहा तो उसने बरबादी तो लिखी पर नियति की कलम, इस बरबादी के आगे कुछ नहीं लिख पायी। उसकी कलम ही नहीं चली। ग़ालिब को अपनी बरबादी पर कोई अफसोस नहीं है। वह तो नियति ने ही तय कर दिया था। वे नियति को भी दोष नहीं देते हैं और न हीं कोसते हैं। पर बेचारी मासूम नियति जो लिखना चाहती थी वह नहीं लिख सकी। वक़्त पर उसकी कलम ही नहीं चली।

अगर नियति ने कहीं नष्ट होने का कारण प्रेम की मदिरा पीने से होना लिखा होता तो, ग़ालिब को कोई गिला नहीं रहता। प्रेम की मदिरा के तो वे प्रेमी ही थे। उनका चषक तो ऐसी मदिरा हेतु सदैव रिक्त रहता था। नियति की असहायता पर तो वे अफसोस तो करते हैं पर नियति की नीयत पर नहीं।सर्वशक्तिमान नियति का इतनी खूबसूरती से बचाव ग़ालिब ही कर सकते है !

© विजय शंकर सिंह
Add a comment...
Wait while more posts are being loaded