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Anisha Singh
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महिला दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें


शक्ति के हैं पीठ अनेक,नारी के हैं रूप अनेक

ज्ञान का मन्दिर" जगत 'तारन",यहां नारी रूप मे 'शक्ति'अनेक 

ओजस्विनी,तेजस्विनी,'गुरु' रूप मे शक्तिस्वरूपा

'नन्दिनीमय'पीठ मे पुष्पित,पुलकित परिवेश गर्वित


   उज्जवल,अभिभूत प्रांगण सारा ,कण-कण मे है 'उमा' का साया 

नवपुष्प को मिलता 'सुधा'रस ',गायत्री'जाप की गूंज है 

 क्रीडांगन की विजयपताका, 'विजया'की कहती है गाथा

'माधवी'का मधु समर्पित,चित्रा का एहसास है हर्षित 

  अज्ञानता के तिमिर मे चमके,'नीना' रूपी ज्ञान का तारा 

जिजीविषा का मधुर उजाला 'प्रेमलता'और 'किरन' मे छाया 

  दिव्य 'ऋचा 'से गुंजित प्रांगण 

       'निशा','अनिशा' 'उषा' पावन 

ज्ञान की 'सरिता' और 'कावेरी'

  सिंचित करती पुष्प की क्यारी 

सृजनस्वरूपाा 'शुभ्रा'बहती,नवल,धवल परिवेश शुद्ध 

नवलक्ष्य भरती 'अमृता', नवप्रेरणा 'ईशा' यहां 

    'मीनू ','शालू' गर्विताा,सच्ची लगन 'जूली' यहां

'पूजा','नीलम','अलका'सुचेता,स्वावलंबन की आस्था 

  " श्वेता','शिखा',बिन्दु','सीमा',अनुराग की आभा यहां

'दीप्ति 'के तेज मे हौसला,उत्साह है 

       'रेनू','सोमा','निशा',यहां पर गर्व का एहसास हैं

दीपिका,ज्योति,यहां,अपराजिता,सविता यहां

     नारी रूप मे शक्ति का,हर रूप परिलक्षित यहां

महिला दिवस पर एक-दूसरे, से यही है कामना 

  ज्ञान के मन्दिर को हम श्रद्धासुमन अर्पित करें

'नवपुष्प 'को हम हौसला,उत्साह,और संकल्प दें

  खिल गए जो पुष्प इसमे,न कभी मुरझाएंं वो

जीवन का पथ कांटों भरा,चलने मे न घबरायें वो

राह मे जो गिर गए,तो क्या हुआ उठ जायें वो

गिरने न दें बस मन का बल,बाधाओं से टकरायें वो 

  संकल्प लें हम मिलकर ये, आभा को हम फैलायेंगे

'नवपुष्प' को दें ऐसा पथ ,उन्हे लक्ष्य तक ले जाये जो 

     

    "Happy  women's day"

                                                                 अनिशा सिंह

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अबला नही,तू सबला है


सर्वस्व लुटा कर हे नारी,इस धरा पे तूने क्या पाया 

सम्मान किया सबका तूने,पर खुद अपमान ही क्यों पाया 


कबतक दुख-दर्द सहेगी तू,खूंटी की गइया रहेगी तू

ताना,अपमान,पिटाई का,घर बाहर शोषण सहेगी तू


आंसू को छिपाकर कर कोरों मे,औरों के लिए तू हंसती है

दुख-दर्द भरा जीवन तेरा,आंचल से कबतक ढकेगी तू 


ज्यादा दहेज के लालच मे,अपनो ने जिन्दा जला दिया 

बाहर है दरिंदों की बस्ती,जहां चीरहरण तेरा सदा हुआ 


आंसू से नही अंगारों से,तू अपनी आंख का नेह बढ़ा 

कबतक सबसे यूं डरेगी तू,अबला से अब सबला बन जा 


मत कह की  जन्म हुआ तेरा ,हिंसा और पीड़ा सहने को

मत खुद को मौत के गले लगा,खींचे जो आंचल सबक सिखा


कन्या रूप मे जन्म लिया,मत सोच के तू शर्मिन्दा हो 

हिम्मत,संकल्प,हौसलों से,अपने कुल की बाती बन जा


अंधी,गूंगी,बहरी बनकर,हिंसा ताने मत सहती जा 

अस्मत पर हाथ उठे कोई ,जगदम्बा रूप मे तू आ जा


कबतक दुनिया से डरेगी तू,घर बाहर पीड़ा सहेगी तू

पायेगी जग मे मान तभी,जब अपनी रक्षा करेगी तू


संघर्ष तुझे करना होगा,दुनिया से अब लड़ना होगा 

कमजोर नही महिमा तेरी,तुझे खुद को नमन करना होगा 


मेंहदी,चूड़ी संग हाथों का,हथियारों से श्रंगार तू कर

अपना शील बचाने को,रणचंडी बन कर रण मे उतर


करुणा,ममता की देवी तू,कोई छेड़े तब तू काली बन

फूलों सा कोमल तन-मन है,जब झुलसे तू चिंगारी बन


बदलेगी रीति तभी जग की,जब सोच तू अपनी बदलेगी 

दुख सहना प्रेम की परिभाषा,भ्रम मौन का जब तू तोड़ेगी 


करूणा,ममता की धारा तू,तुझमे ही सृजन की शक्ति है  निर्मम जग के उत्पीड़न से,तुझको ही अब लड़ना होगा 

अस्मत पर जब संकट आये,संहार तुझे करना होगा 

पहचान स्वयं को हे नारी,तुझसे ही बनी ये सृष्टि है 

जग करेगा तुझको झुक प्रणाम,जब मानेगी तू शक्ति है ।


अनिशा सिंह 
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आधी आबादी है नारी,आधी संसद मे आने दो

दुनिया के पुरुषों मत समझो
     नारी हूं तो झुक जाउंगी 
समझौते,त्याग के पन्ने पर,मेरी जीवन गाथा लिखी गयी 
    जौहर मेरा ही सदा हुआ 
बन सती आग मे मै ही जली
   अग्निपरीक्षा अस्मत की,हर काल मे मेरी होती रही 
कहते हो स्वयं को' सर्वश्रेष्ठ'
      नारी को 'अबला' नाम दिया 
उसके प्रेम,समर्पण को,अपना अधिकार समझते हो 
    अस्तित्व नही समझा उसका 
ईश्वर का इच्छित फल समझा 
      सदियोंं का शोषण खतम हो रहा 
क्यों तुमको स्वीकार नही?
    क्यों बराबरी से डरते हो
क्या खुद पे तुम्हे विश्वास नही?
   गूंगी गुड़िया अब बोल रही 
क्यों शब्द तुम्हारे खत्म हुए?
   तैंतीस फीसदी नारी को,पद देने मे हिचकते हो 
आधा अधिकार वो मांग न ले
   कानून बदलते फिरते  हो 
नारी की लगन और मेहनत से 
     पुरुषों! इतना क्यों डरते हो?
नारी पा जाये ऊंचा पद,चरित्र टटोलने लगते हो 
    निन्दा का अवसर हाथ लगे,हर समय घात मे रहते हो 
नारी जिस सीढ़ी पर चढती है,उसे धीरे-धीरे हिलाते हो
      तुमसे आगे वह जा न सके,राहों मे कांटे बिछाते हो
नारी जब दौड़ लगाती है,पुरुषोंं तुम क्यों थक जाते  हो
   पत्नी,मां,बेटी कहते हो,अधिकार नही पर देते हो 
नारी शक्ति पर भाषण दे,तुम नारी को ही ठगते हो 
  पत्थर की नारी देवी है,कहकर शीश झुकाते हो 
हाड़-मांस की नारी से,पूजा खुद की करवाते हो
   युग बदला है,तुम भी बदलो,अस्तित्व को अब स्वीकार करो
तानो,अपमानों से इसको कमज़ोर बताना बन्द करो
  शिक्षा,रक्षा और अन्तरिक्ष मे,इसने बाजी मारी है 
बुध्दि,बल,सहनशीलता मे पुरुषों! तुम पर यह भारी है 
   अपने से कम इसे मत आंको,पंखों को इसके मत काटो
देवी का दर्जा नही इसे,बस' नारी'ही बन जाने दो
   देकर अधिकार सभी इसके,इसेआगे कदम बढाने दो 
लोकतंत्र के आंगन मे,नारी को दौड़ लगाने दो 
    सड़क से लेकर संसद तक,अवरोध बिना उसे जाने दो 
राज-काज मे नारी भी,सहभाग बने पुरषों की तरह 
    आधी आबादी है नारी,आधी संसद मे आने दो 
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शहीद का धर्म

हिन्दू न कहो मुस्लिम न कहो,पहचान मेरी मानव है
   न मैने पढी है गीता कभी,न मैंने रटी है आयत
न व्रत मंगल का मै रखूं,रमज़ान मे रखूं न रोजा
   धर्म है मेरा मानवता,करता मानव की सेवा 
गेरुआ वस्त्र पहनकर न माथे पर तिलक लगाऊं
   उजले वस्त्र पहनकर न पढ़ने अजान मै जाऊं
मै सैनिक हूं सीमा का,पूजा मै देश की करता
   देश की रक्षा को कहता,अपनी कुरान और गीता 
देश के दुश्मन घात लगाए,गली-गली बैठे हैं
   अन्धकार का लिए इरादा,द्वार के पार खड़े हैं
जाति नही मेरा धर्म नही,मै वतन को मजहब कहता
  मन्दिर मे नही मस्जिद मे नही,मुझे कण-कण मे रब दिखता 
नही है जीवन मोह मुझे,न मरने से डरता हूं
  देश की खातिर जीता हूं,तो सैनिक कहलाता हूं
सब कहते हैंं 'शहीद"मुझे,जब देश पे मर जाता हूं
  अभिमान देश का मुझसे है,ईमान को मै रखता हूं
देश की सीमा को ही मै,अब अपना घर कहता हूं
  नही मै जाता काशी मे,न काबा मे जाता हूं
चर्च और गुरुद्वारे के द्वारेे पर रह जाता हूं
  वतन की मिट्टी मे मुझको दिखता है अपना तीरथ
यीशु,अल्लाह,भगवान् नही,है वतन ही मेरा ईश्वर । 
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हार से ही जीत है


कौन कहता है सफलता जिन्दगी का गीत है 

  असफल हुआ न जो कभी,मानव नही वह पूर्ण है

कौन कहता है कि जीवन खुशियों का संगीत है 

  गम नही जीवन मे जिसके,मानव वह अपूर्ण है 

गिर गए जो राह मे,तो क्या हुआ उठ जाओ तुम 

  जीवन का पथ कांटों भरा,कांटों से न घबराओ तुम 

छिप गया है आज सूरज,क्या हुआ निकलेगा कल

   कितनी भी काली रात हो,हर रात का है दिन ही हल

छोटा बहुत जीवन का पथ,न देख दुनिया को तू चल

  क्या चाहता है मन तेरा,तू पहले अपने मन को पढ़

एक छोटा सा कदम,मंजिल तलक ले जायेगा 

  जो चल दिए कांटों पर तुम,पथ खुद-ब-खुद बन जायेगा 

जिन्दगी ने जो दिया,हंसकर उसे स्वीकार लो

   मेहनत करो इतनी,तुम्हारे तन मे जितनी जान हो

माना कि मंजिल दूर है,इसे हौसलों से कम करो

 पक्के इरादे से सफर के विघ्न को तुम तोड़ दो

हार पर न तुम डिगो,असफलता पर न तुम  रुको

जो न मिला,हासिल उसे दुगने परिश्रम से करो

 संकल्प हो,एक लक्ष्य हो,मेहनत के संग-संग धैर्य हो

ये हो नही सकता रे मानव!भाग्य मे हलचल न हो

 लोगों का कहना काम है,न उनकी बातों मे पड़ो

क्या दिल तुम्हारा कह रहा,ठहरो,सुनो,वो ही करो

  भाग्य तो एक शब्द है,तुम कर्म से इसे अर्थ दो

हिम्मत,लगन,मेहनत से तुम,तकदीर अपनी खुद लिखो
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नोत बंदी पर कविता

भविष्य हूं भारत का कर रहा प्रार्थना
काले धन को जमा करें टैक्स चुकाएं
भ्रष्टाचार मिटा कर देश को स्वच्छ बनाएं
नही किसी के खाते में इसे जमा कराएं
जमा किया तो सजा मिलेगी उसे बतायें
जिसने कालाधन रखा है वह भी खुश है
पास नहीं जिसके एक पैसा ज्यादा खुश है
देशवासियों डरो नहीं घबराओ मत तुम
आने को है नया उजाला धैर्य रखो तुम
एक साथ हम सब को अब उठना ही होगा
छोड़ गुलामी कालेधन की लड़ना होगा
भ्रष्टाचार जमाखोरी है देश के दुश्मन
मिटेगा काला धन, इन को मिटना ही होगा
लाख विरोधी संसद में करते हैं बुराई
मन ही मन कर रहे फैसले की वो बढ़ाई
दस दस घंटे बैंक में लाइन, देश खड़ा है
कोई शिकायत है ना उनको कोई गिला है
मौन क्रांति जन गण की सब साथ चल रहे
बिन हिंसा बिन रक्त पात आजाद हो रहे
बैंक एटीएम लगते हैं अब तीरथ जैसे
नोट के पुण्य प्रसाद के लिए भक्त खड़े हैं
जाति, धर्म और ऊंच -नीच के भेद मिटे हैं
हिंदू ,मुस्लिम ,सिख ,इसाई साथ खड़े हैं
दिन पचास है पास तुम्हारे धैर्य रखो तुम
शासन और प्रशासन संग सहयोग करो तुम

By
Shauryavardhan Singh
Class 9
MPVM Allahabad

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एक था पोस्टकार्ड

मटमैला रंग ,अपनी सी सुगन्ध
बेवक्त, बिना सूचना के
भरी दोपहर फुर्सत सा
आ धमका है पोस्टकार्ड ,
डाकिया चाचा नही दिखे
ई-मेल के युग में
शायद ई-डाकिया लाया है।
शून्य सा तन-मन लिए
औंधा पड़ा नवजात सा,
खूंटी छुड़ा वापस लौटा
हांफता बछड़ा लगा।
रूखे -सूखे गैरों जैसे
दो-चार नये शब्द हैं,
स्वाद नही संवाद में
सपाट से अर्थ हैं ।
प्रिय,आदरणीय,प्रणाम के
श्रंगार से विहीन विधुर जैसा ,
गीत गा गूंगा हुआ
उद्वेलित ,फड़फड़ाता ,परिंदा लगा।
वैभव नही जिसका रहा
हारा हुआ सुकुमार है,
बिन किनारे से फटे
गमगीन शोक-पत्र सा।
अक्षरों में मौन हैं
इसे भूलने के उलाहने ,
अभ्यस्त था ये प्रेम का
उपेक्षा का शूल चुभ गया,
ई-पीढी के बीच मे
सकुचाया सा पुरखा जैसा।
हाथों में जीवनरेखा देख
समय की पगडंडी पर ,
चन्द शब्दों की लाठी के सहारे
औपचारिक अस्तित्व ढोता ,
आत्मीय "खत" नही
मितव्ययी पावती लगा।

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काश मेरी माँ लौट के आती.…।

गोद में तेरी बचपन बीता,
आई जवानी सबकुछ छूटा।

प्यार मेरा जितना था तुझसे,
उसमे से कुछ हिस्सा छूटा।

खाने और कमाने को माँ ,
घर और तुझसे नाता टूटा।

मिलना चाहूँ समय नहीं है ,
तुझे बुलाऊँ जगह नहीं है।

जीवन में सबकुछ मैंने पाया,
तेरी कमी को भर ना पाया।

रुपया -पैसा दिया बहुत सा,
प्यार तेरा लौटा ना पाया।

याद तेरी जब जब मुझे आती,
मंन को आहत करती जाती।

तड़प-तड़प कर कहता है मन,
काश मेरी माँ लौट के आती।


आपकी अपनी,
अनिशा

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