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Harsha Trivedi
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follow ur heart but within the limits of ethics
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मानवीय अन्तर्जगत्
प्रायः हम लोगों को विभिन्न दिशाओं में विभिन्न लक्ष्यों की और दौड़ते हुए से
देखते हैं। प्रश्न हो सकता है कि अनवरत चलते रहने वाले भरम या निरन्तर बनी रहने वाली इस विकलता का कारण क्या हैं ? यदि उन प्रयत्नों का लक्ष्य जीवन रक्षा और निर्वाह की व्यवस्था भर जुटाना है तो कहा जा सकता है कि वह तो बहुत ही सहजता और सरलतापूर्वक जुटाई जा सकती हैं। मनुष्येतर अन्य जीव-जन्तु भी बड़ी सुविधापूर्वक अपने लिये भोजन और आवास की व्यवस्था जुटा लेते हैं। उन्हें न तो किसी वस्तु विशेष को प्राप्त करने के लिये व्याकुलता रहती है और न अपनी निर्वाह आवश्यकताओं को छोड़कर अन्य किन्हीं विषयों में बैचेनी होती हैं ; परन्तु मनुष्य की अनिवार्य, सामान्य और विलासितापूर्ण आवश्यकताएँ भी बड़ी सरलतापूर्वक पूरी होने के बाद भी उसे दु:खी और अवसादग्रस्त देखा जा सकता हैं।
यह बात उन लोगों के लिये कहीं जा रही है, जो सामान्यत: समझते हैं कि समृद्ध और साधन सम्पन्न होने से सभी प्रकार के दुखों और अभावों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। इस सबंध में मेरे विचार से दु:ख एक आन्तरिक अभावात्मक धारणा है। वह अंतस से संबंधित एक रिक्त अनुभूति है। उस रिक्तता को बाहरी उपादानों से नहीं भरा जा सकता । संभवतः यही कारण है कि जो लोग संपन्न ,समृद्ध और हॄष्ट पुष्ट देखें जाते हैं, वे भी दु:ख और पीड़ाओं से ग्रस्त रहते हैं।
फिर प्रश्न उठता है कि जब साधन संपन्नता और बाहृ वैभव विभूतियाँ सुख नहीं हैं तो आखिर सुख है क्या ? यहाँ निकोलाई अमोसोव की पक्तियों का जिक्र करना चाहूँगी-" सुख व्यक्ति के मानसिक चैन का एक
कमोबेश स्तर है,जिससे वह कुल मिलाकर जीवन से संतुष्ट रहता है।"
इसे इस तरह समझा जा सकता है कि संतुष्टि एक भावनात्मक अनुभूति है जो उपलब्ध को पर्याप्त मानने से जन्मती है और अभीष्ट को प्राप्त करने के लिये प्रचुर सामर्थ्य और पर्याप्त साहस प्रदान करती है। सुख का अर्थ है - उपलब्ध में संतुष्ट रहने और अनुपलब्ध के लिये आकुल-व्याकुल न होने की स्थिति।इस स्थिति में रहते हुए ही कोई व्यक्ति अपने अभीष्ट को प्राप्त करने के लिये सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकता हैं,अन्यथा अंसतोष,अतृप्ति,घृणा और आतुरता जैसी निषेधात्मक प्रवृतियँा मनुष्य के मानसिक संतुलन को छिन्न-भिन्न कर देती हैं। अत:वास्तविक सुख की प्राप्ति हेतु अपनी भावनाओं को प्रशिक्षित किया जाना अधिक आवश्यक प्रतीत होता हैं; क्योंकि सुख एक भावनात्मक उपलब्धि है और इस उपलब्धि को अर्जित करने या स्थर रखने के लिये भावनाओं का संतुलन,परिष्कार और परिमार्जन ही अधिक सफल और कारगर तरीका हो सकता हैं।

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