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Ashok Mishra
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लौह पुरुष के अंतिम सपने का बिखर जाना
अशोक मिश्र लौह पुरुष को रात भर नींद नहीं आई। उनकी पीड़ा का पारावार नहीं है। उन्हें आज पहली बार अपनी भलमनसाहत पर अफसोस हुआ। वट वृक्ष रूपी जो दल आज जब भारतीय राजनीति में अनंत शाखाएं फैलाए गर्वोन्नत खड़ा है, उसका बीजारोपण उन्होंने ही किया था। जब यह पौधा उगा था...

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‘हॉफ गर्लफ्रेंड’ के चक्कर में पिटे मुसद्दी लाल
अशोक मिश्र आज सुबह पड़ोसी मुसद्दी लाल फटे और बदरंग भीगे जूते जैसा मुंह सुजाये मेरे घर में नमूदार हुए। वे किसी सड़क हादसे का शिकार हुए वाहन की तरह टूटे-फूटे दिख रहे थे। उनका नेशनल हाईवे जैसा सुदर्शनी चेहरा किसी गिट्टी युक्त कच्ची सड़क जैसा हो गया था। आंखों औ...

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बीवी-बॉस के चक्कर में घनचक्कर पुरुष
अशोक मिश्र स्त्री जीवन भर तीन ‘प’ यानि पिता, पति और पुत्र नामक रिश्ते से मु क्त नहीं हो पाती। इनमें से एक न एक ‘प’ का दखल उसके जीवन में हमेशा बना ही रहा है। काल भले ही कोई रहा हो। सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग या वर्तमान कलयुग। चलिए थोड़ी देर के लिए मान लिय...

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‘लालबत्ती’ ने ‘हूटर’ को दिया जन्म
अशोक मिश्र जब देश आजाद हुआ और पहली सरकार बनी, तब सबसे विकट समस्या यह थी कि इस मुई ‘लालबत्ती’ का क्या किया जाए? ‘लालबत्ती’ का जन्म तो अंग्रेजों के समय में ही हो गया था, लेकिन तब उसके आशिक सिर्फ अंग्रेज ही हुआ करते थे। हां, भारतीय लोग बस दूर से ही ‘लालबत्ती’ ...

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गधे तो वाकई गधे होते हैं
अशोक मिश्र गधे तो वाकई गधे होते हैं। एकदम सीधे-सादे, मेहनती और संतोषी। गधे के यही तीन गुण उसको महान बना देते हैं। सीधा इतना कि मालिक बात-बेबात दो लट्ठ लगा भी दे, तो बिलबिलाकर ‘ढेंचू-ढेंच’ कर लेगा और फिर निरपेक्ष भाव से काम में लग जाएगा या चरने लगेगा। मेहनत ...

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फिर गए हवाई चप्पलों के दिन
-अशोक मिश्र ठीक उसी तरह ‘कि पहले अंडा आया कि मुर्गी’ की तरह यह सवाल भी मौजू है कि पहले जूते आए या चप्पल। जूते का ही संशोधित रूप चप्पल है या चप्पल की ही अगली पीढ़ी का नुमाइंदा है जूता। मेरा ख्याल है कि ऊंचे-नीचे, पथरीले-रेतीले रास्तों पर चलने से होने वाली दि...

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स्वर्ग जैसे ‘न्यू इंडिया’ में नंगे-अधनंगे किसान
अशोक मिश्र हमारे देश के मजदूर-किसान भी न..एकदम बौड़म हैं बौड़म। धेले भर की अकल नहीं और अकल के पीछे लट्ठ लिए बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। किसानों को गुमान है कि वे देश के अन्नदाता हैं। मजदूरों को वहम है कि वे भाग्यविधाता हैं। अरे! वह दिन गए, जब किसान अन्नदात...

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एक पोस्ट कीन्हें बिना
अशोक मिश्र इस देश में कभी हुआ करता था त्रेतायुग। अरे सतयुग के बाद आने वाला त्रेतायुग। उस त्रेतायुग में पैदा हुए थे शंकर सुवन केशरी नंदन। इस देवात्मा को हनुमान जी भी कहा जाता है। हनुमान जी ने अपनी आधी जिंदगी कैसे भी व्यतीत की हो, लेकिन जबसे उनका परिचय रामचंद...

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ज्यादा अंगरेजी न बूको, समझे
अशोक मिश्र राजमार्ग से थोड़ा हटकर खुले मदिरालय प्रांगण में परम विपरीत विचारधारा वाले दल के कर्मठ कार्यकर्ता मिले। दोनों परम मद्यप थे, परंतु पूर्व परिचित भी। दोनों ने एक दूसरे पर इतनी तीव्रता से दृष्टिपात किया कि एक बार लगा, दोनों के चक्षु अपने-अपने कोटरों स...

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अब पतियों पर भी गिरेगी गाज
अशोक मिश्र सुबह सोकर उठा ही था कि मुसद्दी लाल किसी आतंकवादी की तरह घर में घुस आए। आते ही बिना कोई दुआ-सलाम किए गोला-बारी करने लगे, ‘पंडी जी, अब तो जीने की तमन्ना ही नहीं रही। जब हुस्न पर ही पहरा हो, तो फिर जीने का क्या फायदा? आप किसी के हुस्न का ठीक से दीदा...
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