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smt. Ajit Gupta
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smt. Ajit's posts

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हमारी फरियाद है जमाने से
कोई कहता है कि मुझसे मेरा बचपन छीन लिया गया
कोई कहता है कि मुझसे मेरा यौवन छीन लिया गया लेकिन क्या कभी आपने सुना है कि किसी
ने कहा हो कि मुझसे मेरा बुढ़ापा छीन लिया गया है। लेकिन मैं आज कह रही हूँ कि
मुझसे मेरा बुढ़ापा छीन लिया गया है। सबकुछ छिन गया फिर भी ...

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नरेन्द्र से विवेकानन्द की भूमि को नमन
जिस धरती ने विवेकानन्द को जन्म दिया वह धरती
तो सदैव वन्दनीय ही रहेगी। हम भी अब नरेन्द्र ( विवेकानन्द के संन्यास पूर्व का
नाम) की भूमि को, उनके घर को नमन करना चाह रहे थे। हम जीना चाह रहे थे उस युग में
जहाँ नरेन्द्र के पिता विश्वनाथ दत्त थे, उनकी माता भुवनेश्...

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नदी के मुहानों पर बसा सुन्दरबन
कोलकाता या वेस्ट-बंगाल के ट्यूरिज्म को
खोजेंगे तो सर्वाधिक एजेंट सुन्दरबन के लिये ही मिलेंगे, हमारी खोज ने भी हमें
सुन्दरबन के लिये आकर्षित किया और एजेंट से बातचीत का सिलसिला चालू  हुआ। अधिकतर पेकेज दो या तीन दिन के थे। हमारे
लिये एकदम नया अनुभव था तो एकाध ...

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ठाकुर जी को भोग
कोलकाता यात्रा में कुछ यादगार पल भी आए, लेकिन
सोचा था कि इन्हें अंत में लिखूंगी लेकिन ऐसा कुछ घटित हो गया कि उन पलों को आज ही
जीने का मन कर गया। गंगासागर से वापस लौटते समय शाम का भोजन मेरी एक मित्र के यहाँ
निश्चित हुआ था, लेकिन हम दो बजे ही वापसी कर रहे थे ...

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गंगासागर एक बार – सारे तीर्थ बार-बार
कोलकाता की यदि जन-जन में पहचान है तो वह
गंगासागर के कारण है। गंगोत्री से निकलकर गंगा यहाँ आकर सागर में समा जाती है।
गंगासागर की यात्रा कठिन यात्राओं में से एक है। लेकिन जैसै-जैसे आवागमन के साधनों
में वृद्धि हुई है, वैसे-वैसे यात्रा सुगम होने लगी है। लेकिन फ...

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शान्तिनिकेतन – प्रकृति से शिक्षण
जब हम बचपन में तारों के नीचे अपनी चारपाई लेकर
सोते थे तो तारों को समझने में बहुत समय लगाते थे। तब कोई शिक्षक नहीं होता था
लेकिन हम प्रकृति से ही खगोल शास्त्र को समझने लगे थे। प्रकृति हमें बहुत कुछ
सिखाती है, बस हमें प्रकृति से तादात्म्य बिठाना पड़ता है। कलक...

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कोलकाता मन का और देखन का
युवा होते – होते और साहित्य को पढ़ते-पढ़ते कब
कलकत्ता मन में बस गया और विमल मित्र, आशापूर्णा देवी, शरतचन्द्र, बंकिमचन्द्र,
रवीन्द्रनाथ आदि के काल्पनिक पात्रों ने कलकत्ता के प्रति प्रेम उत्पन्न कर दिया इस
बात का पता ही नहीं चला। मन करता था कि वहाँ की गली-कूं...

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काश हम विशेष नहीं होते
सामान्य और विशेष का अन्तर सभी को पता है। जब
हम सामान्य होते हैं तो विशेष बनने के लिये लालायित रहते हैं और जब विशेष बन जाते
हैं तब साँप-छछून्दर की दशा हो जाती है, ना छछून्दर को छोड़े बनता है और ना ही
निगलते बनता है। आपके जीवन का बिंदासपन खत्म हो जाता है। जब ...

शून्य से साक्षात्कार
आज शून्य से कुछ प्राप्त करना चाहती हूँ, कोई उथल-पुथल नहीं है, एकदम मन शान्त है। कोशिश कर रही हूँ कि केवल स्वयं पर केन्द्रित हो जाऊँ। क्यों चिन्ता करूँ देश की, क्यों सोचूं समाज और परिवार के लिये? क्या मैं एक कण नहीं हूँ इस संसार का? यदि स्वयं का चिंतन होगा तो समस्त सृष्टि का चिंतन नहीं होगा? मेरा कोई भी कार्य – अच्छा या बुरा से, सम्पूर्ण विश्व प्रभावित नहीं होगा? बस अपने लिये कार्य करती रहूँ तो सभी के लिये कार्य सिद्ध हो जाँएगा। लेकिन अपने लिये तो ईमानदार बनूं। लेकिन यदि बेईमान बनने का मन है तो फिर सभी बेईमान बनने की प्रक्रिया में आ जाएंगे। यह नहीं हो सकता कि मैं बेईमान बनूं और दूसरे ईमानदार बन जाएंगे।
मेरा शून्य मुझे कहता है कि अपना कुछ मत रखो, सब में विलीन कर दो। अपना परिचय भी भूल जाओ, फिर देखो दुनिया कैसी लगती है? शायद सब में खो जाने की प्रक्रिया का नाम ही संन्यास था। वन गमन और वहाँ स्वयं को प्रकृति में साथ आत्मसात कर लेना। दूसरों के लिये जीना, बहुत जी चुके अब, क्या स्वयं के लिये जी सकते हैं? यदि स्वयं के लिये जीना प्रारम्भ करेंगे, तो क्या यह दूसरों के लिये जीना नहीं कहलाएगा? हम दूसरों के सुख-दुख को पकड़े हुए हैं, बस उनसे विरक्त होना ही उन्हें मुक्त करना है। जब हम किसी को मुक्त करते हैं तो उसे नवीन जीवन देते हैं। सभी को मुक्त करना और स्वयं में आसक्त होना ही जीवन की परिभाषा बनाना चाह रही हूँ।
शून्य में लिखते हुए इतना लिखा गया, शायद लोग इसे प्रलाप समझेंगे, इसलिये शून्य से साक्षात्कार यहीं तक।


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छोटे डर का डेरा
आप यदि विचारक है या चिंतक हैं तो सच मानिये
आपको रोज ही जहर पीना पड़ता है। आपके आसपास रोज ऐसी घटनायें घटती हैं कि आपकी नींद
उड़ा देती हैं लेकिन शेष समाज या तो उस ओर ध्यान देता नहीं या देता भी है तो सोचता
नहीं। बस दुखी होने के लिये केवल आप  हैं।
ऐसी घटनायें ख...
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