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Subhash Bhadauria
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इस बार तो गुजराती, नहीं हाथ में आने के.
ग़ज़ल अब भेष धरो लाखों, चुंगल में फँसाने
के. इस बार तो गुजराती, नहीं हाथ में
आने के. कभी गंगा बुलाती है, कभी बाबा
बुलाते हैं, आने को हैं दिन अब तो, धूनी के
रमाने के. झोले को सिला करके तैयार फकीरा
हो , सेल्फी की जगह आये, दिन चिमटा
बजाने के. हमने तो तुम्हें स...

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लोगों की लुगाई ने घर ऐसे संभाला है, शक्कर न मिली गुड़ की फिर चाय बनाली है.
ग़ज़ल ये कैसा उजाला है ये कैसी दिवाली है. सब्जी भी हुई गायब खाली मेरी थाली है. हमने तो कटोरी में डुबकी को लगा देखा, है दाल बहुत मंहगी और जेब भी खाली है. लोगों की लुगाई ने घर ऐसे संभाला है, शक्कर न मिली गुड़ की फिर चाय बनाली है. अब ताज संभालों तुम, मुश्किल ह...

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ट्रेन बुल्लट चलाने का वादा करें, पुल बनाने की जिनको न फ़ुर्सत मिली.
ग़ज़ल ट्रेन
बुल्लट चलाने का वादा करें,  पुल बनाने की जिनको न फ़ुर्सत मिली. हादसा
हो कहीं भी मेरे मुल्क में,  मुझको ऐसा लगे गाज़ मुझपे गिरी. आइनो
पे ना पत्थर उछालो बहुत,  वक्त है साब इनकी हिफाज़त करो, नोट
बंदी से पहले परेशान थे,  मर गये और जी.एस. टी है जब से...

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फेसबुक पर ही मिल लीजिये.
ग़ज़ल फेसबुक
पर ही मिल लीजिये. फूल बन
कर के खिल लीजिये. जान भी
देंगे फिर बाद में, पहले
टूटा सा दिल लीजिये. आँख से
सब समझ जायेंगे, आप
होटों को सिल लीजिये. रफ़्ता
रफ़्ता करीब आयेंगे, चाहे
जितने उछल लीजिये. ज़िन्दगी
तो संभलने को है, आज
थोड़ा मचल लीजिये. वो न
ब...

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अच्छे दिनों का हमको,कोई जवाब दे दो.
ग़ज़ल अच्छे दिनों का
हमको,कोई जवाब दे दो. नज़रें तरस रही
हैं, कुछ तो हिसाब दे दो. हम गदहे, कुत्ते,
बिल्ली, मुर्गें हैं आपके ही , हिस्से के कुछ
हमारे टुकड़े ही साब दे दो. ये क्या सितम की
लाठी, गोली है उनकी  किस्मत, बेटी के हाथ
तुमने कहा था किताब दे दो. सच को...

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बेटा विकास तुमने क्या काम कर दिया है.पापा का और चाचा का नाम कर दिया है.
ग़ज़ल बेटा विकास तुमने क्या काम कर दिया है. पापा का और चाचा का नाम कर दिया है. खेतों में लोटा ले के, जाते थे जो कभी वे, हगने का उनको घर में, आराम कर दिया है. पटरी के जो किनारे, आते थे जो नज़ारे, आँखों को अब हमारी, निष्काम कर दिया है. रोटी व दाल को भी , तरसे...

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गलियों में तेरी बुल्लट, अब ट्रेन चलायें क्या.
ग़ज़ल अब तू ही बता
तेरा ग़म ऐसे मिटायें क्या. तेरी ही सहेली
को, अब फिर से पटायें क्या. दीदार तेरे हमको
हों सुब्ह- शाम हरदम, गलियों में तेरी
बुल्लट, अब ट्रेन चलायें क्या. कोई ताज़ नया सर
पे आ जायें हमारे भी, वादों का कहो
चूरन हम सब को चटायें क्या. घर तेरे फि...

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लुच्चों ने मेरे मुल्क की चड्ड़ी उतार ली.
ग़ज़ल कभी इसने मार ली तो,  कभी उसने मार ली. लुच्चों ने मेरे मुल्क की चड्ड़ी उतार ली. हिन्दू या मुसलमान मरें उनको क्या पड़ी, गीधों ने भेड़ियों ने तो किस्मत संवार ली. मज़्बूरियां ना पूछ ओ, जीने की सितमगर, बच्चों की फीस बेंक से हमने उधार ली. तुम अपनी अपनी ख़ैर...

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खूँन के निशां मेरे, धोयेंगे भला किस तरह.
ग़ज़ल जिनमें
जान होती है, वो ही डूब जाते हैं. मुर्दे
बैठे साहिल पे,शोर ही मचाते हैं. खूँन
के निशां मेरे, धोयेंगे भला किस तरह, और भी
नज़र आयें, जितना वो छिपाते हैं. सच को
हमने कहने का, ये इनाम पाया है, लाश पर
मेरी देखो, गिद्ध मुश्कराते हैं. मौत की
करें परवाह...

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हमको गुरू घंट मिले ऐसे. अँधों को बटेर मिले जैसे.
गुरू महिमा. हमको गुरू घंट
मिले ऐसे. अँधों को बटेर मिले जैसे. हमको दुत्कारत थे
हर दम, वे प्रीत करत थे छोरिन ते. हम द्वार पे
ठाड़े राह तकें वे इश्क़ करे कुलबोरन ते. पंछी वे हमाये
उड़ाये सदा, फिर फाँसत थे बलजोरिन ते. हमको तलफत वे
छोड़ गये वे जाय फँसे हैं औरन त...
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