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surendrapal singh
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यह आज भी एक गुथ्थी है जिस पर दिन प्रतिदिन कोई न कोई एक नई ख़बर नज़र में आ ही जाती है कि मध्य एशिया या सुदूर पश्चिम से जो लोग लगभग पाँच हज़ार साल पहले इस भू भाग में आए जिसे दुनिया आज इंडियन सब कॉन्टिनेंट के नाम से जानती हैं और उन्होंने, एक नई सभ्यता को जिसे बाद में वैदिक सभ्यता का नाम दिया गया, को जन्म दिया लेकिन हर कोई इस बात पर चुप्पी साध लेता है कि जो लोग यहाँ के रहने वाले थे वे लोग कब और किस काल से यहाँ राह रहे थे जिन्होंने वग़ैर किसी विरोध या प्रतिरोध किये बिना आर्यों को अपने पाँव जमाने दिए।

जो लोग बाहर से आये थे वे सभी एक देश या प्रांत के नहीं थे इसलिए उन्होंने अपनी पहचान आर्यों के रूप में स्थापित की। जैसे-जैसे आर्यों का वर्चस्व इस भू भाग में स्थापित होने लगा तो यहाँ के मूल निवासी अपना स्थान छोड़कर दक्षिण की ओर चलते गए जो कालांतर में दक्षिणी भारतवासी कहलाए। कहा जाता है है कि जो दक्षिण की ओर चले गए वे उस काल में भी संस्कृत भाषा भाषी थे और शिव की पूजा अर्चना करते थे। आर्यों ने भी संस्कृत भाषा को अपनाया ही नहीं बल्कि प्रश्रय भी दिया जिस कारण से वे लोग इस भू भाग के निवासियों की भांति लगने लगे। आर्यों ने धीरे-धीरे स्वयं को संगठित किया और चूँकि वे मुख्यतः हिन्दूकुश नामक स्थान पर आकर बसे थे इसलिए उन्होंने स्वयं को हिंदू कहना प्रारंभ कर दिया। वेदों की रचना की और अपने लिए सामाजिक न्याय और व्यवस्था के लिए मनुस्मृति की परिपाटी डाली। कुछ ज्ञानियों ने पुराण की गाथाएं लिखीं जिससे कि लोगों की आस्था बने और क्लोग धर्मभीरु बनें।

कालचक्र कब रुकता है जैसे-जैसे सभ्यता का विकास हुआ वैसे-वैसे ही नए विचार तथा सनातन पूजा पद्धति का चलन पड़ा। इसी पद्धति के अनुसार इस भूमंडल के क्रियाकलापों को सतयुग, द्वापर युग, त्रेतायुग तथा कलयुग का नाम दिया गया। विभिन्न-विभिन्न समय और काल में कई महापुरुष पैदा हुए और उनके पुनीत कर्मों के कारण उन्हें आम बोलचाल की भाषा में भगवान का अवतार माना गया तथा उन्हें धार्मिक पुस्तकों तथा इतिहास में उचित स्थान मिला। इनके साथ शुरू हुआ गुरु एवं शिष्य परंपरा तथा कुल, वर्ण इत्यादि।

जो लोग ग्यानी ध्यानी थे और जिन्हें वेद पुराण का ज्ञान था वे ब्राम्हण कहलाये, जो समाज की रक्षा में लगे वे क्षत्रिय कहलाये, जो व्यपार में लगे वे वैश्य कहलाये तथा जो समाज की सेवा में लगे वे शूद्र कहलाये।

कालांतर में जैसे-जैसे ये लोग पूर्वी क्षेत्र की ओर बढ़ने लगे और इनका सामना वर्तमान के पाकिस्तान तथा भारत के पंजाब प्रांत की महानद तथा उत्तर प्रदेश में गंगा और यमुना जैसी विशाल नदियाँ और वन क्षेत्रों से हुआ। समतल और उपजाऊ जमीन देख कर जहाँ इन्होंने अपने खाने पीने तथा जीवनयापन के लिए खेती बाड़ी करना शुरू किया।

भगवान महावीर जैन धर्म के चौंबीसवें (२४वें) तीर्थंकर है। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था।
जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला प्राचीन धर्म और दर्शन है। जैन अर्थात् कर्मों का नाश करनेवाले 'जिन भगवान' के अनुयायी। सिन्धु घाटी से मिले जैन अवशेष जैन धर्म को सबसे प्राचीन धर्म का दर्जा देते है।

बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और महान दर्शन है। इसा पूर्व 6 वीं शताब्धी में बौद्ध धर्म की स्थापना हुई है। बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध हुए।

भारत में इस्लाम का आगमन करीब 7वीं शताब्दी में अरब के व्यापारियों के आने से हुआ था (629 ईसवी सन्‌) और तब से यह भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का एक अभिन्न अंग बन गया है।

उसके बाद द्वितीय दशक की शुरुआत में पठानों, मुग़लों और बाद में अंग्रेजों के भेष में आक्रांता बन कर आए। गंगा-यमुना की जिस सरजमीं और भरपूर पानी को देखकर सभी विदेशी और फिर अंग्रेजों को छोड़कर बाकी अधिकतर यहीं के होकर रह गए। जल की कमी के शायद अब कोई इधर का रुख न करे।

एक लंबा अरसे से दक्षिण के लोगों की यह मनोकामना रही कि एक दिन भारत के इतिहास में वह दिन भी आएगा जिस दिन गंगा का कावेरी से मिलन होगा और यह उम्मीद बनी थी कि जिस दिन इन दो महान नदियों का मिलाप होगा वह दिन भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिवस होगा। डॉ के एल राव के मंत्रित्व काल में 1970 के आसपास सिंचाई तथा ऊर्जा विभाग ने एक महत्वाकांक्षी योजना की रूपरेखा बनाई जिसके अंतर्गत गंगा के जल को और कावेरी नदी तक पँहुचाने कि व्यस्तता थी। अगर यह योजना कार्यन्वित हो गई होती तो सम्पूर्ण भारत के जल स्रोतों के रख रखाव को एक बहुत लंबी छलांग लगाने का अवसर प्राप्त होता। लेकिन संसाधनों की कमी के कारण यह संभव हो न सका।

मेरे विचार में हर सरकार ने ऐसी योजनाओं पर काम करने का मन बनाया लेकिन इसके कार्यन्वयन में आती हैं अड़चनों को देखकर किसी ने भी इस महत्वाकांक्षी योजना पर कभी कार्य शुरू नहीं किया।

अपार जनसमूह और बढती हुई आबादी के करण जल संपदा का जिस तरह दोहन किया जा रहा है यह चिंता का विषय है तथा
आने वाले दिनों में जल संकट एक विशाल त्रासदी बनकर आने वाला है। अगर यही हालात चलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जबकि भारत की जनता के लिए पीने के पानी का संकट तो खड़ा हो ही जायेगा साथ ही साथ यह कृषि और कृषि से सम्बंधित सभी क्रियाकलापों को भी ले डूबेगा। समय रहते किसी विक्लप पर यह काम करना होगा और लांग टर्म प्लांनिग को ध्यान में रख कर कुछ योजनाओं पर काम करना होगा।

एस पी सिंह
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Caution: This post is meant for only those who loved Nehru.

बहुत रिसर्च करी कि वह कारण पता लगे कि अपने गाँव के प्रधान जी पंचायत में बैठ कर अड्ड-बड्ड क्यों बोल जाते हैं तो गहन अध्ययन के बाद पता लगा कि यह उनकी आदत में शुमार नहीं है फिर भी वह अपना inferiority complex दूर करने के लिए यह सब अंट-शंट बोला करते हैं।

उन्हें लगता है कि उनका जन्म 1947 से पहले क्यों नहीं हुआ, जबकि भारत परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ ब्रिटेन का एक उपनिवेश वाद का एक हिस्सा था। भारत अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति की लड़ाई लड़ रहा था, काश वे पहले पैदा हुए होते तो भारत को स्वतंत्रता उन्ही के प्रयास फल स्वरूप प्राप्त होती और वह भी आज एक गुजराती होने के कारण गाँधी जी के समकक्ष माने जाते। देश विदेश से आये राजनायिक और विशिष्टगण राजघाट पर लोग उन्हें श्रद्धा के सुमन अर्पित करने आते। उन्हें राष्ट्रपिता का दर्ज़ा हासिल होता।

हाय री क़िस्मत, यह हो हो न सका।

नेहरू जी गाँधी और पटेल के आशीर्वाद से प्रधानमंत्री बने और देश के गौरव कह लाये। उन्होंने जो पन्द्रह अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को "Tyrst with Destiny" जो भाषण दिया वह भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया और प्रधान जी से यह अवसर भी छूट गया।

"Long years ago , we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeem our pledge, not wholly or in full measure, but very substantially. At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom. A moment comes, which comes but rarely in history, when we step out from the old to the new, when an age ends, and when the soul of a nation, long suppressed, finds utterance. It is fitting that at this solemn moment we take the pledge of dedication to the service of India and her people and to the still larger cause of humanity.

At the dawn of history India started on her unending quest, and trackless centuries are filled with her striving and the grandeur of her success and her failures. Through good and ill fortune alike she has never lost sight of that quest or forgotten the ideals which gave her strength. We end today a period of ill fortune and India discovers herself again. The achievement we celebrate today is but a step, an opening of opportunity, to the greater triumphs and achievements that await us. Are we brave enough and wise enough to grasp this opportunity and accept the challenge of the future?

Freedom and power bring responsibility. The responsibility rests upon this Assembly, a sovereign body representing the sovereign people of India. Before the birth of freedom we have endured all the pains of labour and our hearts are heavy with the memory of this sorrow. Some of those pains continue even now. Nevertheless, the past is over and it is the future that beckons to us now.

That future is not one of ease or resting but of incessant striving so that we may fulfil the pledges we have so often taken and the one we shall take today. The service of India means the service of the millions who suffer. It means the ending of poverty, ignorance, disease and inequality of opportunity. The ambition of the greatest man of our generation has been to wipe every tear from every eye. That may be beyond us, but as long as there are tears and suffering, so long our work will not be over.

And so we have to labour and to work, and work hard, to give reality to our dreams. Those dreams are for India, but they are also for the world, for all the nations and peoples are too closely knit together today for any one of them to imagine that it can live apart Peace has been said to be indivisible; so is freedom, so is prosperity now, and so also is disaster in this One World that can no longer be split into isolated fragments.

To the people of India, whose representatives we are, we make an appeal to join us with faith and confidence in this great adventure. This is no time for petty and destructive criticism, no time for ill-will or blaming others. We have to build the noble mansion of free India where all her children may dwell.

The appointed day has come—the day appointed by destiny—and India stands forth again, after long slumber and struggle, awake, vital, free and independent. The past clings on to us still in some measure and we have to do much before we redeem the pledges we have so often taken. Yet the turning-point is past, and history begins anew for us, the history which we shall live and act and others will write about.

It is a fateful moment for us in India, for all Asia and for the world. A new star rises, the star of freedom in the East, a new hope comes into being, a vision long cherished materializes. May the star never set and that hope never be betrayed!

We rejoice in that freedom, even though clouds surround us, and many of our people are sorrow-stricken and difficult problems encompass us. But freedom brings responsibilities and burdens and we have to face them in the spirit of a free and disciplined people.

On this day our first thoughts go to the architect of this freedom, the Father of our Nation, who, embodying the old spirit of India, held aloft the torch of freedom and lighted up the darkness that surrounded us. We have often been unworthy followers of his and have strayed from his message, but not only we but succeeding generations will remember this message and bear the imprint in their hearts of this great son of India, magnificent in his faith and strength and courage and humility. We shall never allow that torch of freedom to be blown out, however high the wind or stormy the tempest.

Our next thoughts must be of the unknown volunteers and soldiers of freedom who, without praise or reward, have served India even unto death.

We think also of our brothers and sisters who have been cut off from us by political boundaries and who unhappily cannot share at present in the freedom that has come. They are of us and will remain of us whatever may happen, and we shall be sharers in their good [or] ill fortune alike.

The future beckons to us. Whither do we go and what shall be our endeavour? To bring freedom and opportunity to the common man, to the peasants and workers of India; to fight and end poverty and ignorance and disease; to build up a prosperous, democratic and progressive nation, and to create social, economic and political institutions which will ensure justice and fullness of life to every man and woman.

We have hard work ahead. There is no resting for any one of us till we redeem our pledge in full, till we make all the people of India what destiny intended them to be. We are citizens of a great country on the verge of bold advance, and we have to live up to that high standard. All of us, to whatever religion we may belong, are equally the children of India with equal rights, privileges and obligations. We cannot encourage communalism or narrow-mindedness, for no nation can be great whose people are narrow in thought or in action.

To the nations and peoples of the world we send greetings and pledge ourselves to cooperate with them in furthering peace, freedom and democracy.

And to India, our much-loved motherland, the ancient, the eternal and the ever-new, we pay our reverent homage and we bind ourselves afresh to her service.

JAI HIND."

मेरे व्यक्तिगति विचार में नेहरू जी अगर राजनीति में न आये होते तो वे शर्तिया ही एक लेखक के रूप में दुनिया में उनका अनूठा स्थान होता। उनकी भाषण की शैली आज के अपने प्रधान जी की टक्कर की नहीं थी पर वह जो भी कहते उनका कहने का अंदाज़ निराला था। इसी कारण लोगों ने उन्हें बेपनाह प्यार दिया और वे इस बात को मानते भी थे। अपनी वसीयत में उन्होंने इस बात का ज़िक़्र भी किया है:

1. I, Jawaharlal Nehru, of Anand Bhawan, Allahabad, am desirous of making my Will and indicating in it how I wish my property and assets to be disposed of after my death. The circumstances of my life have been and are so uncertain that I do not know if there will be anything at all to dispose of it at the time of my death. The assets which I had inherited from my father, and for which he had taken steps with loving foresight and care to protect for me, have been largely spent by me. The capital at my disposal has progressively diminished, in spite of my income from royalties, on books and other writings, which have been considerable. I have not had much of a property sense and the idea of adding to my possessions has almost seemed to me an addition to the burdens I had to carry. The kind of journey through life I had undertaken long ago required as few encumbrances as possible. Also, believing in my capacity to add to my income if I chose to do so, I was not interested in making financial provision for the future. For this reason also I did not at any time insure my life.

2. Because of this and other reasons, it is exceedingly difficult for me to make any detailed provision for the future. I did not think it even necessary to make any kind of a Will as I doubted that I would have anything to dispose of in this way. In the normal course, I thought, that my daughter Indira Priyadarshini Gandhi, would inherit such property or assets that I might leave, as she was my natural and obvious heir.

3. When I was in Ahmednagar Fort prison and had leisure to think about the future, it struck me that it would be desirable to make some kind of a Will. The news of the sudden death of my brother-in-law, Ranjit Sitaram Pandit came as a great shock to me and induced me to think again of making a Will. I could not take any formal steps in prison though in December 1943, while still in Ahmednagar, I made a draft of a Will and Testament.

4. I was released from prison in the summer of 1945 and since then have had little leisure to think of personal matters. So, the draft has remained with me for over ten years now. These ten years have seen many changes in my life and the old draft is out of date. As a matter of fact, such assets as I possessed even ten years ago have largely vanished during this period. Since I became Prime Minister, I have been unable to add to my income by any fresh writing and I have had to draw repeatedly on what capital I possessed because my salary as a Prime Minister was not adequate for my needs, limited as they were. Nevertheless, I consider it necessary to make this Will now and so dispose of a matter which has been at the back of my mind for a number of years.

5. My daughter and only child, Indira Priyadarshini, married to Feroze Gandhi, is my only heir, and I bequeath to her all my property, assets and belongings, subject to such provision as may be hereinafter provided for.

6. My property at present consists of my house, Anand Bhawan, in Allahabad, with the land and buildings attached to it, and the furniture, books and other appurtenants thereto. I have also books, papers and personal belongings at present in the Prime Minister's house, New Delhi. I own a few securities, investments and shares and some cash in current and fixed deposits accounts in banks, though most of these securities and investments have already been transferred in favor of my daughter or have been otherwise disposed of. I have an uncertain and varying income also from royalties on the old books I have written. All these assets, that is, the house, Anand Bhawan, with all that appertains to it, and all my securities, investments and shares, cash in current and fixed deposit accounts, wherever they might be, and income from royalties on books, and any other property or assets belonging to me not herein mentioned, will be inherited by, and will belong after my death to, my daughter, Indira Priyadarshini, and she shall have full authority over them and can deal with them in any manner she chooses.

7. In the event of my daughter, Indira Priyadarshini, pre- deceasing me, her two sons, my grand sons, Rajivratna Nehru Gandhi and Sanjay Nehru Gandhi, will be my heirs, and all my property and assets will be inherited by them absolutely in equal shares, which they may hold jointly or otherwise, as they choose.

8. In the course of a life which has had its share of trial and difficulty, the love and tender care for me of both my sisters, Vijaya Lakshmi Pandit and Krishna Hutheesing, have been of the greatest solace to me. I can give nothing to balance this except my own love and affection which they have in full measure.

9. Any of my father's or mother's personalia, still in my possession or in Anand Bhawan, will be given to my sisters for they will have a prior right to these than anyone else can have. They can share or divide these articles among themselves as they choose.

10. I have, by the above mentioned clauses, bequeathed Anand Bhawan, and such other property as I might possess, absolutely to my daughter and her children, as the case may be and she or they will have full proprietary rights over it, including rights of alienation and disposition of every kind. This house, Anand Bhawan, has become for us and others a symbol of much that we value in life. It is far more than a structure of brick and concrete, more than a private possession. It is connected intimately with our national struggle for freedom, and within its walls great events have happened and great decisions have been reached. It is my wish, and I am sure it is my daughter's wish also, that whoever lives in Anand Bhawan must always remember this and must not do anything contrary to that tradition. This wish of mine, as well as other wishes to which I refer in subsequent clauses, are not intended to be in any way a restriction on the proprietary rights conferred upon my daughter.

11. I should like my daughter, her husband Feroze Gandhi and their children to make Anand Bhawan their home, and, if owing to any reasons, they do not find it possible to do so, to visit Anand Bhawan frequently.

12. Our house, Anand Bhawan, in Allahabad, should always be open to my sisters, their children as well as my brother-in-law, Raja Hutheesing, and they should be made to feel that it continues to be their home where they are ever welcome. They can stay there whenever they like and for as long as they like. I should like them to pay periodic visits to the house and to keep fresh and strong the bonds that tie them to their old home.

13. Our house, Anand Bhawan, has drawn many people to it from all parts of the country during past years, when my father was alive and subsequently. More especially, poor folk, peasants and others, from the surrounding districts and from more distant parts of India have come there for advice and help or solace, in their life-long suffering. I hope the doors of Anand Bhawan will ever be open to these countrymen of ours and every courtesy will be shown to them. It is a matter of deep regret to me that because of my duties and responsibilities as Prime Minister, I have been unable to visit our home, except rarely.

14. I should not like the house to be rented out to strangers. If my daughter or her children do not find it convenient to maintain Anand Bhawan as a family residence, they should use it or dedicate it for a public purpose. This may be in connection with the Kamala Nehru Memorial Hospital or the proposed Children's Home that is likely to be put up nearby or any like purpose.

15. I have collected a considerable number of papers and letters of national and historical interest. Many of these connected with various phases of our national struggle for freedom were unfortunately destroyed or mislaid during the long years when we were in prison. Still some remain. There are other papers and documents as well as letters relating to the subsequent period after I took office, which have also considerable historical value. All such important papers and documents and letters should be offered to the national Library or the National Archives.

16. I have from time to time given various articles, which had been presented to me, to public museums. I shall continue to do so. In case any remain, which are worthy of public display, these should be presented to the National Museum. Some of them may be kept in the Prime Minister's house which itself is a public building.

17. I have received so much love and affection from the Indian people that nothing that I can do can repay even a small fraction of it, and indeed there can be no repayment of so precious a thing as affection. Many have been admired, some have been revered, but the affection of all classes of the Indian people has come to me in such abundant measure that I have been overwhelmed by it. I can only express the hope that in the remaining years I may live, I shall not be unworthy of my people and their affection.

18. To my innumerable comrades and colleagues, I owe an even deeper debt of gratitude. We have been joint partners in great undertakings and have shared the triumphs and sorrows which inevitably accompany them.

19. Many of those who served my father or me faithfully and with affection have passed away. A few remain. They have been parts of our household and I should like them to be considered as such so long as they are alive. I cannot mention them all here, but I should particularly like to mention Shiv Dutt Upadhyaya, M.O. Mathai and Harilal.

20. I wish to declare with all earnestness that I do not want any religious ceremonies performed for me after my death. I do not believe in any such ceremonies and to submit to them, even as a matter of form, would be hypocrisy and an attempt to delude ourselves and others.

21. When I die, I should like my body to be cremated. If I die in a foreign country, my body should be cremated there and my ashes sent to Allahabad. A small handful of these ashes should be thrown in the Ganga and the major portion of them disposed of in the manner indicated below. No part of these ashes should be retained or preserved.

22. My desire to have a handful of my ashes thrown in the Ganga at Allahabad has no religious significance, so far as I am concerned. I have no religious sentiment in the matter. I have been attached to the Ganga and the Jumna rivers in Allahabad ever since my childhood and, as I have grown older, this attachment has also grown. I have watched their varying moods as the seasons changed, and have often thought of the history and myth and tradition and song and story that have become attached to them through the long ages and become part of the flowing waters. The Ganga, especially, is the river of India, beloved of her people, round which are intertwined her racial memories, her hopes and fears, her songs of triumph, her victories and her defeats. She has been a symbol of India's age-long culture and civilization, ever-changing, ever-flowing and ever the same Ganga. She reminds me of the snow-covered peaks and the deep valleys of the Himalayas, which I have loved so much, and of the rich and vast plains below, where my life and work have been cast. Smiling and dancing in the morning sunlight, and dark and gloomy and full of mystery as the evening shadows fall; a narrow, slow and graceful stream in winter, and a vast roaring thing during the monsoon, broad-bosomed almost as the sea, and with something of the sea's power to destroy, the Ganga has been to me a symbol and a memory of the past of India, running into the present, and flowing on to the great ocean of the future. And though I have discarded much of past tradition and custom, and am anxious that India should rid herself of all shackles that bind and constrain her and divide her people, and suppress vast numbers of them, and prevent the free development of the body and the spirit; though I seek all this, yet I do not wish to cut myself off from that past completely. I am proud of that great inheritance that has been, and is, ours, and I am conscious that I too, like all of us, am a link in that unbroken chain which goes back in the dawn of history in the immemorial past of India. That chain I would not break, for I treasure it and seek inspiration from it. And, as witness of this desire of mine and as my last homage to the great ocean that washes India's shores.

23. The major portion of my ashes should, however, be disposed of otherwise. I want these to be carried high up into the air in an aeroplane and scattered from that height over the fields where the peasants of India toil, so that they might mingle with the dust and soil of India and become an indistinguishable part of India.

I have written this Will and Testament in New Delhi on the twenty-first day of June in the year Nineteen Hundred and Fifty-four.

Signed/ Jawaharlal Nehru 21 June, 1954 Attestor 1: Kailas Nath Katju Attestor 2: N.R. Pillai"

....और तो और नेहरू जी ने स्वयं को राष्ट्र का प्रधानमंत्री न होकर सेवक बता दिया और यह अवसर भी निकल गया।

"New Delhi, Aug 21: The nation was touched when Prime Minister Narendra Modi said in his maiden Independence Day speech this year that he is ready to put in more hours of work than that of the common man for he is not the prime minister but the prime sevak (main servant) of the country.

Many were moved by the fact, thinking it is the first time a prime minister has spoken in such manner from on the Independence Day but if we look back at the history of the I-Day speeches, the country's first prime minister, Jawaharlal Nehru, had also made a similar speech on August 15, 1947."

दरअसल मुझे कभी-कभी लगता ह कि प्रधान जी मुँह से कहें कुछ भी लेकिन वह नेहरू को बेइंतिहा चाहते हैं अपनी हक़ीक़ी ज़िंदगी में किसी हद तक उनके आदर्शों को अपनाने की कोशिश भी करते हैं और यही कारण है कि नेहरू रह-रह कर उनके ख्यालों में आ जाते हैं। प्रधान जी सही मायने में नेहरू को emalute करते हैं बस फ़र्क इतना है कि नेहरू जी जो भी करते थे खुले आम करते थे और अपने प्रधान जी एक मुखौटा लगाकर करते हैं। नेहरू के दिल में लेडी माउंटबेटन के लिए मन में कभी प्यार भी उमड़ा हो तो उसे छुपाया नहीं। वह कभी-कभी सिगरेट पीते थे वह भी सरे आम। उन्होंने पहले प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ इस पद को गौरवान्वित ही नहीं किया बल्कि इसे एक नई पहचान भी प्रदान की। उपरोक्त वसीयत में नेहरू जी साफ़ लिखते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी आय में कोई इज़ाफ़ा नहीं हुआ और न ही वह आंनद भवन, जो कि उनके पिता मोतीलाल जी से विरासत में मिला था, उसके अलावा उन्होंने कोई और एसेट ही बनाया।

नेहरू जी शेरवानी पहना करते थे और जैकेट। जैकेट कालांतर में नेहरू कट के नाम से इतनी पॉपुलर हुई कि वह ब्रांड भी बिक गया। हालांकि यह भी एक अकाट सत्य है कि रंग बिरंगी नेहरू कट पहन कर प्रधान जी ने भी एक नया ब्रांड स्थापित किया है। नेहरू जी की ही तरह प्रधान जी को अच्छे-अच्छे और साफ सुथरे लिवास पहनने का शौक़ था। इस विषय में मैं कई अन्य व्यक्तियों की उन टिप्पणियों को छोटे दिमाग़ की सोच ही कहूँगा जिन्होंने प्रधान जी के पहनावे को लेकर यदाकदा निम्न स्तर की बकबास की है।

प्रधान जी को नेहरू की यादों ने सबसे अधिक सताया है इसलिए यह सब रास न आया इसलिये वे अपने गुरु जी के पास गए और उनसे यह पूछा, "गुरु जी बताइये कि मैं क्या करूँ कि जब मैं नेहरू के समकक्ष खड़ा होऊँ तो मेरा कद उनसे बड़ा लगे"

गुरु जी तो गुरु जी उन्होंने प्रधान जी को आशीर्वाद देते हुए कहा, "तुम नेहरू के हर काम को नकारने का अनवरत प्रयास करते रहो बाद बाकी घृणा फैलाने का काम मैं अपने शिष्यों और आईटी एक्सपर्ट्स की टीम के माध्यम से करा दूँगा"

प्रधान जी ने अपने गुरु जी की यह बात गाँठ मार ली तबसे आये गवाहे प्रधान जी अंट शंट बोलने लगे। अब जब भी उन्हें मौक़ा मिलता है और उनके सामने केसरिया रंग की टोपीधारी बैठे दिखाई देते हैं तो उनके सामने वह जोर शोर से नेहरू जी के हर काम को ऐतिहासिक गलती बताते हुए पूछते हैं, "भाइयों और बहनों, बताइये कि नेहरू ने ये किया था या वो किया था। क्या यह या क्या वह सही था? वगैरह वगैरह....

Mesmerized गाँव के लोग प्रधान जी की हाँ में हाँ मिलाते हुए बोलते हैं, "नहीं-नहीं"

अब तो हालत यह हो गई है कि प्रधान जी को नेहरू के नाम मात्र से भयंकर चिढ़ हो गई है और उनका पूरा प्रयास है कि इतिहास के पन्नो से नेहरू-गाँधी नाम की चिड़िया को वह सदैव के लिये मिटा दें। पर इतिहास बनाने वाले इतिहास बना कर चले जाते हैं और लोग उस पर टीका टिप्पणी करते रहते हैं। प्रधान जी का क्या कहना, वह यह जानबूझ कर इसलिये भी करते हैं कि विरोध पक्ष उन पर कोई व्यक्तिगति टिप्पणी कर दे और वह उसे ले उड़ लें और जैसे मणि शंकर की 'नीच' वाली टिप्पणी को उन्होंने गुजरात के चुनावी माहौल ख़ूब भुनाया। अभी हाल के कर्नाटक के चुनाव में तो प्रधान जी यह कहते तक सुने गए कि नेहरू या कोई भी अन्य कांग्रेसी नेता कभी जेल में शहीद सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त से मिलने नहीं गया। उनके इस कथन का जिस तरह मज़ाक सोशल मीडिया में बना वह अपने आप में मिसाल है।

कहना सर्वथा उचित होगा कि प्रधान जी ने देश को एक मर्यादित भाषा की उम्मीद थी लेकिन उनके आचरण से वह सभी आशाएं और आकांक्षाए धूमिल हो चुकी हैं। ठीक है विरोधियों की भाषा संयत और संस्कारी नहीं थी फिर भी प्रधान जी की भाषा उनके पद की गरिमानुसार होनी चाहिये यह राष्ट्र अपेक्षा रखता है। आज राजनीतिक बहस का स्तर इतना गिर गया है कि हमें एक सजग राष्ट्र के नागरिक होने के सम्मान से भी वंचित होना पड़ रहा है। मैं यहाँ यह भी स्पष्ट रूप में कहना चाहूँगा कि नेहरू जी की विरासत सम्हालने वाली पार्टी काँग्रेस का भी आचरण कोई बहुत अच्छा रहा है उन्होंने भी देश के आत्म सम्मान को निकृष्ट कार्य कर ठेस पहुँचाई है। अगर उन्होंने ही सत्ता प्रेम न दिखला कर जनता की सेवा की होती तो आज देश और जनता की हालत कुछ और ही होती।

इस सबके बाबजूद प्रधान जी का पद एक संवैधानिक पद होता है और एक मायने में देश की आवाज़ भी। प्रधान जी ने इस लिहाज़ में यहीं नहीं विदेशों में भी जाकर भारतीय राजनीति के इस गंदे मुखौटे का वर्णन कर ख़ुद के आत्म सम्मान तथा देश की गरिमानुसार पर भी कुठाराघात किया। जब वह गुजरात के मुखिया थे उनकी कथनी और करनी में जब अटल जी जैसे नेता को त्रुटि नज़र आई तो उन्हें भी कहना पड़ा, 'गुजरात सरकार राजधर्म का पालन करे'।

प्रधान जी ने पिछले आम चुनाव में करप्शन को मुख्य मुद्दा बनाया और मौसम बना कर तमाम उल्टे सीधे वायदे कर डाले यहाँ तक कि कि हर भारतवासी के बैंक एकाउंट में 15 लाख रुपए ब्लैक मनी के वापस आते ही डाल दिये जाएंगे। लेकिन सरकार में आते ही वे सबके सब नगण्य हो गए। भजपा के अध्यक्ष को यह तक कहना पड़ा कि वह एक चुनावी जुमला था। जब आप चुनाव में जाते हैं और वायदे तो करते हैं लेकिन कब वायदे पूरे नहीं होते हैं तो यह जान कर चलिये कि जनता जनार्दन आपको चुनाव के माध्यम से हटा भी सकती है। आजतक लोकपाल पद पर किसी योग्य व्यक्ति का चुनाव नहीं किया। संसद में ख़ुद के दिये बयान कि जो संसद सदस्य संदिग्ध चरित्र और जिनके ख़िलाफ़ फ़ौजदारी या कत्ल के मुकद्दमे चल रहे हैं उनके केस तुरत कार्यवाही कर निपटाए जाएंगे और जिनको सजा होनी है उन्हें जेल में डाला जाएगा। न तो यह हुआ न उनसे यह हुआ कि सरदार मनमोहन सिंह, उनके मंत्रिमंडल के अन्य मंत्रियों, सोनिया गांधी, सोनिया के दामाद, ये जी वो जी के खिलाफ मुकद्दमे दायर करके इन्हें जेल में डाल पाते। दूसरे इन्होंने यूपीए के कार्यकाल के समय के CAG को संसद की सदस्य्ता का वायदा कर ख़रीद लिया और उस बेबकूफ़ आदमी ने भी ऐसी रिपोर्ट बना दी जिसमें हज़ारों करोड़ नहीं लाखों करोड़ रुपये का अनुमानित नुकसान की फ़र्जी रिपोर्ट बना दी जो कि बाद में क़ानून के दायरे में आकर अभी तक सही सिद्ध न हो सकी। यह सरकार का काम होता है कि जिन्होंने ग़लत काम किया है उन्हें मुकद्दमा चला कर जेल में ठूँसे। वह भी इन प्रधान महोदय से पिछले चार साल के शासन काल में न हो सका।

अगर प्रधान जी सच्चे हैं तो और निष्ठापूर्वक इन सब पुनीत कार्य को पूरा करें जिन्होंने देश का नुकसान किया उन्हें जेल में भेजें। हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि पूरा हिंदुस्तान उनके पीछे खड़ा होगा और हम सभी अपने प्रधान जी के साथ पूर्ण सहयोग करने के लिए वचनबद्ध हैं।

इसलिए मित्रों, जोर से बोलो, "भारतमाता की जय-प्रधान जी की जय'।

Note: नेहरू की "Tryst with Destiny" वाली speech एवं उनकी वसीयत नेट से Copy Paste की है जिससे आज के नवयुवक समझ सकें कि स्वतंत्रता के ठीक बाद देश के क्या हाल थे और क्या challenges थे। उन कठिनाइयों से कैसे उभरा गया। हो सकता है कहीं भयंकर भूल भी की हो। पर हक़ीक़त यही है देश की जनता ने नेहरू तथा उनके बाद के कांग्रेस को 60 साल तक सरकार में रखा। अगर कोई आज इस बात के लिये कांग्रेस की आलोचना करता है तो उसका सीधा मतलब है कि वह भारतीय जनमानस की सोच समझ पर ही सवाल उठा रहा है। लोकतंत्र में आखिरकार जनता का निर्णय अंतिम निर्णय होता है और हमें उसका सम्मान करना सीखना चाहिए। प्रधान जी भी तो आख़िर उन्ही के वोटों के सहारे सत्ता के शीर्ष तक पहुँच सके। लोकतंत्र में अगर आप विरोध को नहीं झेल सकते हैं तो यह मान कर चलिये कि आप राजनीति के लिए फिट नहीं हैं, इसी विचार के चलते अनेक साहित्यकार, लेखक, समाज सेवी ताजनीति से दूर भागते हैं।

धन्यवाद।
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तारों की बारात लिये
आई है ये रात...
एक इधर एक उधर
मेरा तारा है कहाँ?
ढूंढ रही हूँ...
इतनी देर से मैं...
न जाने कहाँ है जा छुपा
अपनी मम्मा के आँचल में...

Kuhu at Jim Corbett Park
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मित्रो,

चलिये इस प्रश्न का उत्तर ढूँढते हैं कि लोगों में अच्छा साहित्य पढ़ने की लालसा ख़त्म हो गई है या उनका जीवन इतना उलझाए हुए है कि उनके पास पढ़ने के लिए समय ही नहीं है। फिर मैं ताज़्जुब करता हूँ कि हिंदी भाषा भाषी क्षेत्र के लोगों में महँगे-महँगे दुशाला ओढ़ने की प्रवृत्ति तो इधर बड़ी है लेकिन पढ़ने की इच्छा शक्ति ख़त्म हो गई है। इसके ठीक विपरीत सुदूर प्रांतों जैसे कि बंगाल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात यहाँ तक कि केरल तक में हमारा साहित्य धूम मचा रहा है। मैं यहाँ अपने एक मित्र की टिप्पणी आपकी नजर करना चाहूँगा जो अपने आप में पूरी कहानी कहता है:

“आप की हर कहानी का अलग-अलग अंदाज है। अलग मिशन है। अपने आपमें स्वतन्त्र है। नए प्रेक्षापट विषय को सीमित आकार में साकार करने कि कला आप कि खूबी है। सामाजिक दकियानूसी के खिलाफ कलम आपकी आपमें माहिर हैं। यहां आप कि ख्याति बढ़ रही है। बंगाल बखूबी आपके पकड़ में है ‌। हम साग्रह आपका इन्तजार करते हैं”

बस अब और कुछ अधिक न कहते हुए यहाँ इतना ही दर्शाना है कि मेरी अन्य रचनाएं जिनमें प्रमुख हैं:

1 Indian Tiger Caged in Cupboard
2 Agony of migration
3 Touristque
4 Hi! Buddies
5 रिनीं खन्ना की कहानी
6 मैं उसकी ख़्वाहिश हूँ
7 एक थे चंद्रचूड़ सिंह
8 दो पाटों के बीच

उपरोक्त सभी उपन्यास Amazon के book Store पर उपलब्ध हैं या आप प्रकाशक

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13-A, Institutional Area,
Sector-62, ,Noida(UP), 201 301,
www.zephyr.co.in
Contact Person:Mr Dharmendra Kumar, Mob: +91963904222
Email Id: dharmendra.kumar@zephyr.co.in

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जिस दिन लोग मंदिरों में भीख माँगना छोड़ दें; उस दिन से समझियेगा कि हम अमीर हो गए।
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"दो पाटों के बीच......" अब आपके बीच।
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A book:- "एक थे चन्द्रचूड़ सिंह" Written by Mr.S.P Singh, President, Zephyr Limited. Price:Rs.125/= only Published By Zephyr Entertainment Private Limited, B-13A, Institutional Area, Sector-62, Noida (U.P.)-201301 www.zephyr.co.in To secure your copy please ...
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My meeting with ......God
My meeting with........God. मेरी यह मुलाक़ात उससे कुछ अजीबोगरीब से हालात में हुई थी।   मैं तो  Max Super speciality Hospital  के  CCU  की बेड पर  Dr Manoj Kumar  और उनकी टीम की देखभाल में था। मेरे चारों ओर केरल प्रदेश की वह देवियाँ थी जिनके आपस में मलयालम के...
My meeting with ......God
My meeting with ......God
spsinghamaur.blogspot.com
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