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Snigdha Ghosh Roy
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A nut case trying forever to make sense of actions committed out of pure impulse!
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इक ख़ामोश नुमाईश
कालिख़ स्याही की थी उन काग़ज़ों पर या की काला काजल कुछ लिख रहा था पन्नों पर वो पानी की नमी थी या फिर नमक था आँसुओं का उस बहाव में कुछ गल गया कुछ फट गया कुछ आग पर सेंका सहेजा और कुछ जल गया तपिश में पककर जो काग़ज़ सूखा था आज भी दामन में कहीं बांधे रखा है कभी उस पु...

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Eiko Ojala's illustrations incorporate cut paper textures and shadows.
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What's the rush?
We rush, rush to get up before the maid rings the bell. We
rush, rush to get the breakfast on the table. We rush, rush to pack up the
lunch. We rush, rush to get dressed. We rush… We rush, rush to get fatter bank accounts. We rush, rush to
complete the chec...

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मेरी आदत हो तुम...
हाँ तुम मेरी आदत हो ... पर हर आदत बुरी तो नहीं हुआ करती ! मेरी सुबह होती ही है तुम्हारे आने की आस से ... उठने का सबब हो मकसद हो अब तुम ... हाँ मेरी आदत हो तुम ... जब तवा चढ़ाती हूँ gas पर , तुम्हारी भी तीन रोटियाँ साथ गिनती हूँ , चाहे तुम घर पर खाओ के न ही ख...

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ताँती का ताँत, जुलाहे का करघा. ऊपर नीचे करते, इधर उधर खट खट करते   आपस में कुछ बातें सी किया करते हैं... क्या तेरा ताँती तेरे मोह में दिनभर काम किया करता है? क्यों रे? तेरा भी जुलाहा तो ऊँघते ऊँघते तेरा ही नाम जपता है   ताँत शर्मा कर लाल हुआ और करघा बड़ी शान...

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झीना झीना ताना बाना, जुलाहा यूँ ही बुनता रहा रंगों संग बतियाता रहा और तागे संग इश्क़ लड़ाता रहा अपने ही छुटपन के किस्से रंगों में उड़ेंल दिए रस सब अपने जीवन के तागों में थे बुन दिए कोई था सूती, कोई खादी और कोई था रेशम  इक अलग एहसास, इक अलग आस इन सबसे थी बस हरद...

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The Feminist in me is uncomfortable today...
What does feminism mean to you? Has it taken a weird
connotation today where it is simply a misdirected, misguided aggression? I am
a married woman, working from home and I love to take care of my home and do my
share of chores while passing on a big chunk ...

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एक जोड़ा पंखों का
एक जोड़ा जो पंखों का मुझे भी दिया होता... जब मन होता उड़ जाती... उड़ान मन की भर पाती... अपने मन को टोह पाती... आधा सा जो मन लेके जीती हूँ ... बाकी का आधा भी ढूंढ पाती.. मन मेरा आधा ही है मेरे पास... आधा मन तो मायके में छोड़ आई हूँ... घिरते हैं जब उदासी के बादल....

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बंद मुट्ठियों के बेमाने पल...
बचपन में कभी सुना था की बंद सीपियों में मोती मिला करते हैं... गहरे समंदर में डुबकी लगाकर गोताखोर इन्हें ढूंढ कर लाया करते हैं... तबसे हर चीज़ को मुट्ठी में भींच कर उसकी कीमत बढ़ाने की कोशिश में हूँ... वक़्त को भींचा था एक बार, खोला तो यादें बन कर उड़ गया... रुक...
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