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Anup Sethi
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धोंडी दगड़ू
संजय कुमार  मजदूर दिवस पर धोंडी दगड़ू ( मुंबई शहर में 26 जुलाई 2005 को आई बाढ़ के बाद) हमने उन्हें कोसा पानी नहीं बिजली नहीं हम पैदल चलकर आए थे मीलों बारिश में भीगते हुए मरकर पहुंचे ब्रेड तक नहीं सरकार निकम्मी कुछ करती नहीं n धोंडी दगड़ू ने कचरा भरा डंपर में च...

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एक भाषा की चीख
संजय कुमार एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ...

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एक भाषा की चीख
संजय कुमार एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ...

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एक भाषा की चीख
एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ठीक रहा। पर...

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एक भाषा की चीख
एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ठीक रहा। पर...

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मुद्रित शब्द के परे : आभासी संसार में उथल-पुथल
अक्‍तूबर 2016 में छपे चिंतनदिशा पत्रिका के  पत्रिका-परिक्रमा स्‍तंभ में पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर  मुनि मुक्तकंठ की टिप्‍पणी छपी है। दैनिक समाचार समाचारों को एक दिन बाद रद्दी में बदलता है लेेकिन  फेसबुक  दैनिक अखबारों  से भी ज्‍यादा तेजी से चलता है और दिन...

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मुद्रित शब्द के परे : आभासी संसार में उथल-पुथल
अक्‍तूबर 2016 में छपे चिंतनदिशा पत्रिका के  पत्रिका-परिक्रमा स्‍तंभ में पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर  मुनि मुक्तकंठ की टिप्‍पणी छपी है। दैनिक समाचार समाचारों को एक दिन बाद रद्दी में बदलता है लेेकिन  फेसबुक  दैनिक अखबारों  से भी ज्‍यादा तेजी से चलता है और दिन...

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भरम का सांप
कल फिर हिन्‍दी दिवस है, हर साल की तरह। भाषा अपनी जगह, भाषा का खेल अपनी जगह चल रहा हैै। यूटीआई की नौकरी छोड़ने के बाद डायरी और हिन्‍दी पर कुछ कविताएं पहल के पिछले दौर में छपी थीं।   कविताओं में से एक अब पढ़िए।     हो तो गया काम तमाम  अब क्या चाहिए खुला है द्...

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लोकनाट्य : अभिनेयता और संभावनाएँ
यह लेख मैंने शायद सन 1981 में लिखा था। मैं उन दिनों गुरु नानक देव विश्‍वविद्यालय अमृतसर में एम. फिल. में पढ़ रहा था। धर्मशाला कालेज के मेरे प्रोफैसर डॉ गौतम व्‍यथित लोक साहित्‍य के विशेषज्ञ थे और उन्‍होंने कांगड़ा लोक साहित्‍य परिषद भी बनाई थी जो काफी सक्रि...

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विजेताओं का आतंक
इतनी
जोर का शोर होता था कि खुशी की भी डर के मारे चीख निकल जाती थी   असल में वो खुशी का ही इजहार होता था जो शोर में बदल जाता था      खुशी को और विजय को पटाखों की पूंछ में पलीता लगा कर मनाने का
चलन था   सदियों से   ये सरहदों को रोंद कर दूसरे मुल्‍कों को फतह क...
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