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Ravishankar Shrivastava
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टैक्नोक्रेट, सॉफ़्टवेयर स्थानीयकरण विशेषज्ञ, संपादक, लेखक। Software Localization Expert, Writer, Editor, Ex-Technocrat, Freelance Translator, Technical Consultant,
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रचनाकार.ऑर्ग लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन वर्ष 2019

कुल पुरस्कार रु. 21,000 नक़द तथा उपहार स्वरूप रु. 5 हजार से अधिक मूल्य की पुस्तकें.

अपनी लघुकथाएँ यथाशीघ्र भेजें.

रचनाएँ अंतिम तिथि - 31 जनवरी 2019 तक प्रेषित की जा सकती हैं, परंतु अंतिम तिथि का इंतजार न करें और जल्द ही अपनी लघुकथाएँ इस पुरस्कार आयोजन हेतु भेजें.

आयोजन की नियमावली आदि संबंधी अधिक जानकारी के लिए यहाँ जाएँ - http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html

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महान जासूसी लेखक ओमप्रकाश शर्मा की अपनी अलग पहचान थी - ज़नप्रिय लेखक! यह शत-प्रतिशत सही है कि ओमप्रकाश जन-जन का लेखक था. वह केवल भारतीय पाठकों का ही नहीं था बल्कि चीनी पाठक भी उसके बेशुमार थे. मैं जब मेरठ स्थित उसके घर गया तो देखा कि हज़ारों पाठकों के प्रेम, सम्मान, प्रश्न भरे पत्र उसके आस-पास बिखरे थे. इतनी ज़बरदस्त लोकप्रियता प्राप्त करने के बाद भी उसमें वही सादगी और सरलता थी.
मेरी मित्रता उससे बहुत पुरानी थी. जब ओमप्रकाश दिल्ली के पहाड़ी धीरज के एक मकान में किराए पर रहता था और दिल्ली क्लॉथ मिल में कामगार था. मैंने उससे पूछा था कि तुम्हें लेखन की प्रेरणा कैसे मिली? उसके पास भारी भरकम साहित्यिक उत्तर नहीं था. उसका संकेत आत्मप्रेरित-सा ही था. मुझे लगा कि तब भी उसकी संगत बुध्दिजीवियों से थी. जवाहर चौधरी उसका विशेष दोस्त था. चौधरीजी कुशल संपादक, श्रेष्ठ प्रकाशक और लेखक भी थे. चौधरी, चौधरी ज़रूर थे पर उनका रहन-सहन अभिजात वर्ग का था. बात के पक्के थे. उन्होंने एक बार कहा था. ओमप्रकाश केवल जासूसी लेखक ही नहीं है अपितु उसमें विलक्षण प्रतिभा है और वह अध्ययनशील व्यक्ति है. वह श्रेष्ठ ऐतिहासिक व सामाजिक लेखक भी हैं.

ओमप्रकाश की मकान मालकिन बड़ा शोर मचाने वाली थी. किसी हवलदार की पत्नी थी. प्रेमपूर्वक बोलना उसके वश का रोग नहीं था. वैसे ओमप्रकाश की पत्नी में भी ग्रामीण सौंदर्य था पर बोलती वह भी अपने तरीके से. झटका देकर.

तब मैं देखता कि ओमप्रकाश डी.सी.एम. की नौकरी के अलावा जासूसी उपन्यास 'गुप्ता पुस्तक भंडार' खारी बावली के लिए लिखता

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जीएसटी आ गया है।

मत रोको, आज मुझे पश्चाताप करने दो। आज मेरे इतिहास के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं। तेरा आध्यात्मिक और भौतिक स्वरूप मेरे सामने दंगल फिल्म की तरह आ रहा है। इसी के साथ हृदय में बार-बार आघात हो रहा है।

जीएसटी आ गया है। घणों सारो टैक्स!

बिल कहो या बिजकी यह मेरी सात फेरोवाली पत्नि है। मैंने उसे अंधेरे में रखकर तुझे अपनाया। समाज में रिश्तो-सम्बन्धों में तो वह पत्नि है ही और तू व्यापारिक रिश्तों में प्रेमिका। बहीखातों में, बैंक अकाउंटों में भले ही वह रही हो, लेकिन तू तो मन के खातों में निरंतर रही। नहीं ऐसा नहीं कि मैं उसी को मान्यता देता रहा। दोनों ही मेरे सुख-दुख के साथी रहे हैं। अंततः एक छोटा, अधपका व्यापारी हूं।

जीएसटी आ गया है।

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आजकल देश में झूठ पकड़ने के पॉलिग्राफिक टेस्ट के बड़े हूल दिए जा रहे हैं। डराया जा रहा है कि कुछ छुपाया नहीं जा सकेगा। चाहे जिसको लेकर इस मशीन के सामने बैठा दिया जाता है कि बेटा सच बोल। सच का कैमिकल खोपड़े में जाकर खदबदाता नहीं है कि आदमी बोलना शुरू कर देता है, कम से कम सरकारी एजेंसियां तो मान के बैठती ही हैं कि जो बोला है वो सच ही होगा, क्योंकि पी के बोलने और सच ही बोलने के संदर्भ में सदियों से हम कन्विन्स हैं। हमारे यहां माना ही जाता है कि भले ही शपथ खाके झूठ बोल दें, लेकिन दो लोग पीके सच ही बोलते हैं। फिर तो इस गरीब को खुद सरकारी हाथों से ‘कैमिकल’ पिलाई जा रही है। महकमा सेवा-टहल में जुटा है। चढ़ेगी कैसे नहीं, रंग गहरा ही आएगा, फिर इस भावना से मुग्ध सामने वाला दनादन सच उगलने लगेगा। इस तरह चलता है पॉलिग्राफिक टेस्ट। फिर एक बात अपन समझ नहीं पा रहे हैं, किस की भावनाओं को काबू करके उससे सच बुलवाया जा रहा है, लेकिन भाया अगर भावनाएं होती तो क्या बनते वे दुर्दांत अपराधी। अच्छा फिर हौसला तो देखो किन्हें कैमिकल पिला रहे हैं, जो सैकड़ों बोतलें डकारें बैठे हैं सांस तक नहीं खींचते। कैमिकल-सेमिकल उनका क्या बिगाड़ लेगा, समझते नहीं हैं, लगता है कच्चे खिलाड़ी हैं। अच्छा फिर देखिए मशीन से चैक किया जा रहा है, भावनात्मक स्तर, झूठ बोलते समय बढ़ने वाली पसीने की मात्रा, जो बताएगी कि सामने वाला सच बोल रहा है कि नहीं। लोजी, इन आधारों पर दनादन बैठाए जा रहे हैं किसिम-किसम के ‘जीवों’ मशीन पर

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फिर छाये चुनाव के बादल

फिर आयेंगे पास तुम्‍हारे

उजली खादी वाले बगुले

भगवा रंग रंगे सियार फिर आयेंगे

वोट झटकने फिर आयेंगे

फिर देंगे झूठे आश्वासन

जातिवाद की, सम्‍प्रदाय की

कोमल रग पर हाथ धरेंगे

तुम्‍हें डरायेंगे इन पर

झूठे कपोल कल्‍पित खतरों से

रिश्ते की उलझी डोरी के

सिरे तलाशेंगे ये फिर से

बहिन बनायेंगे ये तेरी बेटी को

वोट डालने वाले दिन तक

फिर बोयेंगे

तेरी गलियों के पक्‍का होने का सपना

फिर नाली निर्माण और स्कूल खुलेंगे

फिर से अस्‍पताल में तुमको दवा मिलेगी

बिन पैसे के

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जीवन के तार फिर एक बार झंकृत हो उठे हैं। यह प्रकृति के परिवर्तन गति की सृजन लीला है। बारिशों में भीगकर नम हो चुकी धरा कल एक बार फिर असूज के महीने के खुले आसमान के तले सूरज का ताप लेगी। आकाश फिर उसी तरह धुला धुला, खिला खिला, निरभ्र नज़र आएगा। फिर वही नील पर्वत शिखर,फिर वही धुली धुली हवाएं, फिर वह विराट और वैविध्य रंगों वाला सूरज कण कण में भासमान होगा। एक और सावन बीत चला। उम्र के फलक पर एक और अंक बढा। परिवर्तन का यह क्षण मेरे विलास का काल है।

गर्म कपड़े छतों पर सूखते निकल आएंगे। सुबह मीठी नींद के झौंकों में ठंडी हवाएं हाथ-पैरों को सिकोड़ देंगीं। और सबसे बढ़कर तो वो धूप, जो पूरे साल में सिर्फ तीन महीने इतनी सुंदर लगती है, वो अलस धूप होगी। जगमगाता सूर्य होगा। और उन्मुक्त हृदय होगा। पशु पक्षी भी पर्व मनाएंगे और दूसरे मुल्कों के हमारे मेहमान (पक्षी) भी इस पर्व में साथ आएंगे।

सर्दियों का मौसम हवाओं में दशहरे की खुशबू लिए आयेगा। नवरात्रों की धूम होगी। प्रकृति के परावर्तन काल का प्रतीक - हरियाली, घर घर उगाई जाएगी। अगले नौ दिन सृष्टि की अदिरूपा, ज्योतिर्मय, शक्ति स्वरूपा, सृजन शक्ति का आह्वान होगा। उस विराट ईश्वरीय शक्ति के सृजन कर्म का उत्सव मनाया जायेगा।

इस पर्व में मिट्टी से जुड़ी हमारी ग्राम्य-संस्कृति सजीव हो उठेगी। बैलों के सींग ओंगाये जायेंगे और दशहरे का पर्व होगा - सृष्टि की नकारात्मक शक्तियों पर सृजनात्मक शक्तियों की विजय का प्रतीक। ऋतुओं का आवागमन यहां श्रद्धा से देखा जाता है। आखिर 'ऋत' ही तो धर्म का मूल है।

मौसम की यही खुमारी मेरे उत्सवधर्मी देश के आनन्द की वस्तु है। इसकी रग रग में त्यौहार बसे हैं।यहां प्रकृति के हर रंग में उत्सव का बहाना होता है।जीवन के पल पल को पूरी आत्मीयता के साथ जीना और प्रकृति के साथ सामंजस्य रखना ही हमारा जीवन दर्शन है जो इन पर्वों में झलकता है। जो बताता है कि कृषि, मिट्टी और मानव ही तो सभ्यता के आदि हैं, सूत्रधार हैं। इनकी पूजा ही धर्म है। और इस पर्याय में भी यदि राम हों तो कहना ही क्या! राम - जो प्रकृति की विनाशक शक्ति के आगे मानवीय साहस और गरिमा की विजय का प्रतीक हैं। जो प्रकृति की अराजकतामूलक कदाचार के बरअक्स मानवीय मूल्यों की स्थापना करें। अर्थात सृष्टि की अराजकता में 'ऋत' अर्थात धर्म की स्थापना का यत्न करे और फिर उसे सम्पोषित भी करे। राम - मेरे देश की सूक्ष्म सांकेतिक भाषा है। राम - वह प्रतीक शब्द है जिसमें मेरे देश का जनमानस खुद को व्यक्त करता है। इसीलिए यह करोड़ों लोगों की जनवाणी है। इसीलिए तो राम इस कृषिधर्मी संस्कृति के उत्स हैं और सीता (खेती) उनकी सहधर्मिणी। दोनों एक दूसरे के पूरक।

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