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Vinay Kumar Tiwari
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आखिर... मेरे होने का मतलब क्या है.....!
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20/07/2017
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योगा-वोगा


आज बहुत दिन बाद स्टेडियम की ओर टहलने निकला था... लगभग पौने पाँच बजे..! वैसे तो रोज ही टहलने का प्रयास कर लेता हूँ, लेकिन जब स्टेडियम जाने का मन नहीं होता, तो अपने आवासीय परिसर में ही कुएँ की मेढक की भाँति कई चक्कर काट लेता हूँ...

          आवास से निकलते ही पता चला कि देर रात बारिश भी हुई थी, क्योंकि परिसर पूरी तरह भींगा हुआ था। इस बारिश से मन को थोड़ी खुशी हुई... स्टेडियम की ओर जाते हुए मुझे दादुर के टर्राने की आवाज सुनाई पड़ रही थी...मैंने ध्यान दिया, एक खाली पड़े प्लाट की जमीन में, बारिश से हुए जलजमाव के बीच से यह आवाज आ रही थी...हाँ, याद आ गया...बचपन में ऐसे ही पहली बारिश के बाद छोटे-छोटे गड्ढों और तालाबों से मेंढकों के टर्राने की आवाजें खूब सुनाई दिया करती थी...बड़ा अद्भुत अहसास होता था...लगता था...इस धरती पर हमारे साथ कोई और भी है..! लेकिन धीरे-धीरे आज हम अकेले होते जा रहे हैं...हमारे कृत्यों से धरती पर यह जीवन सिमटता जा रहा है...जीवन के स्पेस कम हो रहे हैं, उस पर तुर्रा यह कि, हम ब्रह्मांड में जीवन खोज रहे हैं...! खैर...हमारे एक फेसबुक मित्र श्री Rakesh Kumar Pandey जी हैं.. प्रकृति के प्रति उनकी अनुभूतियाँ बहुत ही गहरी हैं...उन्हीं की रचनाएँ पढ़कर, हम भी बदलते मौसम या प्रकृति के आँगन में, गुजारे अपने बीते पलों की यादें ताजा कर लेते हैं... 

          हाँ तो, स्टेडियम पहुँच गए थे....यहाँ भी बगल के गड्ढों से वही मेंढकों के टर्राने की आवाजें आ रही थी...तथा..ऊपर आसमान में उड़ते हुए टिटहरी की "टी..टुट.टुट.." की आवाज सुनाई पड़ी...साथ में कुछ अन्य पक्षियों की चहकने की भी ध्वनियाँ सुनाई पड़ने लगी थी जो, सुबह के खुशनुमा अहसास को द्विगुणित किये दे रही थी...एक बात है..! योगा-वोगा तो करते रहिए, लेकिन जरा सुबह-सुबह निकल कर टहल भी लिया करिए...मजा आएगा...!! 

           टहल कर लौटे..चाय-वाय पीते हुए मोबाइल चेक कर रहे थे, तभी घर से फोन आ गया... मैंने तुरन्त रिस्पांस दिया...असल में सुबह फोन मैं बहुत कम उठा पाता हूँ, बाद में मिस्ड हुई काल देखकर फोन करना पड़ता है...तब डाट भी खानी पड़ती है...फिर उधर से पूँछा गया, "आज बड़ी जल्दी फोन उठ गया..!" मैंने मारे डर के यह नहीं बताया कि फेसबुक चेक कर रहा था, मैंने उन्हें यही बताया कि "एक हमारी दोनों बच्चों के साथ की बहुत पुरानी तस्वीर, हमें देखने को पहली बार मिली है...वही देख रहा था.." फिर उलट कर मैंने ही पूँछा, "वह तस्वीर कब की होगी..?" मुझे बताया गया कि "जब हमारा छोटा बच्चा एक माह का था, शायद तब खींची गई थी.." बेचारी ये महिलाएं..! इन्हें बड़ी आसानी से बरगलाया जा सकता है.. ये आसानी से भुलावे में भी आ जाती हैं.. खैर.. 

            घर से फिर बात होने लगी...उन्होंने कहा, "ये योग के चक्कर में यहाँ लखनऊ में करोड़ों रूपए बर्बाद कर दिए गए...बाद में इसकी भरपाई कहीं गैस के दाम बढ़ाकर करेंगे या अन्य टैक्स बढ़ा देंगे..ये सब ऐसे ही जनता की भावनाओं से खेलते हैं..! लेकिन, अब सब समझदार हो रहे हैं... बनारस की दशा वैसी ही है.. कोई खास सुधार नहीं...गाड़ियां वैसे ही सड़क पर हिचकोले ले लेकर आगे बढ़ रही थी... वहाँ घाट पर खड़ा वह लड़का कह रहा था...कि...अभी तक 2019 तक बनारस को ठीक कर देने की बात कही जा रही थी...अब 2024 की बात कही जाने लगी है...लेकिन..जनता इतनी बेवकूफ नहीं है" हाँ, श्रीमती जी बनारस, बाबा विश्वनाथ के दर्शन करके आई थी...वही बता रहीं थीं... वैसे, बेचारी इन औरतों को अपने चूल्हे-चक्के की कुछ ज्यादा ही चिन्ता होती है... खैर.. 

         इधर योग को भी एक सरकारी कार्यक्रम जैसा बना दिया गया...डर लगा, कहीं यह योग भी, कोई "योजना" न बन जाए...!! याद आया उस दिन योग कार्यक्रम में अंत में मुझे इसपर कुछ बोलने के लिए कहा गया... मैं ढंग से नहीं बोला था.. क्या बोलता.. अगर कहता "कर्म में कुशलता ही योग है" तो वहाँ उपस्थित तमाम "योगी-जन" अपने अब तक करते आए काम को, और कुशलता से करने लगेंगे..! और अगर कहता "योग चित्तवृत्तियों का निरोध है" तो ये "योगी-जन" अपने अन्दर की रही-सही, बाकी थोड़ी बहुत संवेदना के लिए भी निरोधात्मक उपाय करना शुरू कर देंगे, और भोगेगी बेचारी यह वियोगी जनता..!! इसीलिए, मैं योगोपरान्त दिए गए अपने वक्तव्य में ऊल-जुलूल ही बकता रहा...हाँ आज की सुबह इन्हीं बातों में गुजरी...लेकिन आप इन बातों को लेकर अपना मूड खराब मत करिए... अब धूप तेज हो चुकी है...अगर सुबह टहलने न निकले रहे हों तो, घर में बैठे-बैठे ही योगा-वोगा कर डालिए...बाकी सब चलता है... टेंशन काहे का.... 

क्रिकेट और बैटिंग

         उस दिन, मेरे वे अन्तरंग मित्र, जिनके साथ बचपन में क्रिकेट भी खेल चुका था, आते ही मुझसे पूँछ बैठे थे, "और क्या हाल-चाल है..बैटिंग-वैटिंग ठीक-ठाक चल रही है न..?" उनकी इस बात पर अचकचाते हुए मैं उन्हें देखने लगा। लगे हाथ वे कह बैठे थे, "भईया..पिच ठीक है, मौका मिला है..पीट लो.."  अब तक मैं उनका मंतव्य समझ गया था। मुस्कराते हुए बोला, "हाँ यार...लेकिन, आजकल आरटीआई, सीबीआई, इनकमटैक्स और नेतागीरी टाइप की फील्डिंग में कसावट थोड़ी ज्यादा ही होती है..बड़ा बच-बचाकर चलना पड़ रहा है..."  "अमां यार हम ये थोड़ी न कह रहे हैं कि हर बाल पर चौका-छक्का जड़ो..! वैसे भी तुम बैटिंग में कमजोर रहे हो...हाँ, एक-एक, दो-दो रन तो ले ही सकते हो..!" मेरे वे परम-मित्र अपनी इस सलाहियत के साथ मुस्कुराए भी।

           इधर मैं चिंतनशील हो उठा था..नौकरी तो ज्यादातर बॉलिंग टाइप करने में ही गुजार दी है। मतलब, गेंदबाजी का ही ज्यादा अभ्यास रहा है और बैटिंग का कम, इसलिए फूँक-फूँक कर, इस नई-नई मिली पिच पर कदम रख रहा था। शायद मेरी इस कमजोरी को ही लक्षित करके मित्र महोदय ने मेरी ऊपरी कमाई पर टांट कसा होगा और इक्का-दुक्का रन लेते रहने की सलाह दे दिया होगा...अभी मैं अपने इसी विचार में खोया था कि उन्हें फिर बोलते सुना-

            "देखो यार...घबड़ाना मत, सट्टेबाजी और फिक्सिंग का जमाना तो हईयै है...गेंदबाजी-फेंदबाजी तो चलती ही रहती है, इससे डरना क्या..! हाँ, थोड़ा-बहुत फिक्सिंग-विक्सिंग भी कर लिया करो।"

         इसके बाद फिर मित्र जी, मुझे हड़काते हुए बोले थे-

         "तुमने नाहक ही अब तक गेंदबाजी में समय नष्ट किया, आखिर कउन गेंदबाज टाटा-बिड़ला बन गया..? अपने सचिन को देखो, बैटिंग के कारण ही तो भारत रत्न ले उड़ा है..आम के आम और गुठलियों के दाम टाइप का पैसा और सम्मान दोनों झटक लिया...जबकि, वहीं गेंदबाज बेचारा पसीना बहाते-बहाते, पता नहीं कहाँ खो जाता है..! क्रिकेट हो या नौकरी, दोनों में बैटिंगइ का खेला होता है, बढ़िया पिच मिल जाए तो कायदे से ठोक लेना चाहिए और अगर तुम बढ़िया बैटर बन गए होते तो, तुम्हारी सात पीढ़ियाँ बैठ कर खाती, सम्मान ऊपर से मिलता। मैं तो कहता हूँ...इसीलिए अपने देश में बैटरों का ही जमाना है, जो जहाँ है वहीं जमे हुए बैटिंग कर रहे हैं..!!"

             अब तक वे इत्मीनान से बैठ चुके थे, हमारी बातचीत आगे बढ़ी। मैंने पूँछा-

            "यह किस बेस पर कह रहे हो कि, अपने देश में बैटरों का ही जमाना है..?"

            "देखो यार, सारे आर्थिक सुधार देश के बैटरों के लिए ही होते हैं, इन सुधारों ने बैटिंग करने लायक बढ़िया पिच भी तैयार कर रखा है...तो,बैटरों का जमाना होगा ही..! समझे?"

             आगे मेरी जिज्ञासु टाइप की चुप्पी देख वे फिर से छाँटना चालू किए -

              "यार.. वैसे भी ले देकर अपना देश, एक ही खेल खेलता है, वह है क्रिकेट, और वह भी, जानते हो क्यों..? क्योंकि, अपना देश आलसियों का देश रहा है...आराम से खड़े रहो और खेलते भी रहो..न हुचकी न धम-धम और खेल भी लिए..! और इसमें भी बैटिंग के क्या कहने, परम आलसी ही अच्छी बैटिंग कर पाता है। इसीलिए तो कहता हूँ, क्रिकेट ही इस देश के लिए सबसे मुफीद गेम है और आजकल, ऊपर से बढ़िया आर्थिक सुधार जैसे कार्यक्रम बैटिंग का माहौल बनाए हुए है..!!"

            यह सब सुनते हुए मैं मित्र को घूरे जा रहा था, इसे भांपकर उनने फिर कहा-

           "जानते हो अपना देश, भ्रष्टाचार में क्यों आगे है...?"

            "अरे यार अब इसमें भी क्रिकेट घुसेड़ रहे हो..?" मैंने कहा।

            "नहीं भाई, आलस..! अगर हम आलसी न होते तो, मेहनत करते, मेहनत की दो जून की रोटी खाते। दिनभर टीवी के सामने दीदे फाड़कर किरकट न देखते। खैर, तुम्हें अब अवसर मिला है..फालतू की बातों में न पड़ो..ढंग की बैटिंग कर लो..तुम्हारे जैसे सब इसी में लगे हैं..।"
          
          उनकी बात का मर्म में समझ रहा था। लेकिन मेरा ध्यान भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट-मैच पर अटका हुआ था। इनमें से कौन जीतेगा ? मुझे इस बारे में चिन्तित देख दार्शनिक टाइप से समझाते हुए वे बोले-

           "छोड़ यार! यह खेल नहीं धंधा है...फकत तीन घंटे का शो है...इससे ज्यादा कुछ नहीं..वही छक्का-चौका और वही बॉलिंग-फील्डिंग..! इससे ज्यादा कुछ नहीं...देशभक्ति की थोड़ी घुट्टी पिए होने के कारण उत्तेजना बढ़ जाती है...नहीं तो, बाकी और कुछ नहीं इस क्रिकेट के खेल में। टास होगा तो, चित या पट में से एक तो आएगा ही...क्रिकेट का मैदान मार लेने से देश महान थोड़ी न हो जाएगा..! उस पर ससुरे ये टीवी वाले उत्तेजना फैला-फैला कर विज्ञापन कमाते हैं... हमीं तुम हैं कि चियर लीडर बने फिरते हैं..!!"

           मित्र की बात अभी समाप्त ही हुई थी कि टीवी के स्क्रीन पर "खेल-भावना" की दुहाई देते हुए कोई ऐंकर कुछ कह रहा था.. मित्र जी यह सुनते ही बिफर पड़े-

           "देखा..! इन ससुरों को क्रिकेट मैच होने के पहले खेल-भावना याद नहीं आई..हारने पर अब खेल-भावना याद आ रही है...इनका धंधा जो हो चुका..!!"

            क्रिकेट का खेल अब तक खत्म भी हो चुका था और मित्र के चक्कर में पूरा खेल देख नहीं पाया था। खैर, इसलिए मेरी खेल-भावना भी बरकरार रही। इधर मित्र के जाने के बाद, नौकरी के पिच पर फील्डरों से बचने के लिए सफल बैटिंग के गुर पर चिंतन-मनन करने लगा था।

टापर

             टापर को अगर व्यंग्यियायें तो कैसे? क्योंकि टापर को व्यंग्यीयाना देश-द्रोह जैसा अपराध होगा यह किसी की देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने जैसा होगा। यह मेरे सामने एक गूढ़ प्रश्न है! सोचता हूँ, देश भर में आजादी के बाद से कितने टापर हो चुके होंगे? हिसाब तो लगाना ही पड़ेगा! हिसाब इसलिए कि देश की जी डी पी या कहिए इससे देश का इकोनामिकली ग्रोथ-रेट पता चलेगा। हमारे कुछ अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि अपने देश का ग्रोथ रेट काफी तेज है, जबकि कुछ इसपर असंतोष भी व्यक्त करते हैं। कहीं देश के ग्रोथ-रेट में यह दृष्टव्य उतार-चढ़ाव देश के टापरों से को-रिलेट तो नहीं करती..? यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। 

          वैसे इतना तो तय है, ये टापरों की संख्या ही देश की जी डी पी में वृद्धि का कारक होती है। क्योंकि ये टापर जी ही हैं, जो जी-जान से देश सेवा में सन्नद्ध होते हैं। बाकी तो सब लफंटूस बने घूमते हैं। कभी-कभी, मैं उनको महा बेवकूफ मानता हूँ, जो आजकल टापरों के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं। अरे भाई!  इन बेचारों को टापर होने का सुख तो लेने दो, तभी देश में भी सुखक्रांति आयेगी और गरीबों के चेहरों पर मुस्कान तैरेगी! टापरों को हतोत्साहित मत कीजिए। बल्कि इनके सुर-लय-ताल की तारीफ करिए। यही तो हैं, जो ताल में ताल मिलाकर, देश में लयबद्ध ढंग से विकास का काम कर रहे हैं।  ये टापर बखूबी बेसुरे राष्ट्र विरोधी तत्व को देश-सेवा जैसे महत्वपूर्ण काम से अलग कर देते हैं। मैं तो कहता हूँ इसीलिए देश को इन टापरों का ॠणी होना चाहिए।          हमको तो लगता है इन टापरों में, टापर होने के पहले और टापर होने के बाद टापरीय टाइप का अन्दरूनी समझौता होता है, और वह होता है देश-सेवा करने का समझौता..! तभी तो न, टाप करने के बाद इनके मुख से बस यही पहला लफ्ज़ निकलता है "हम देश की सेवा करना चाहते हैं।" हाँ भाई ये टापर लोग, आपस में मिल-बाँटकर देश-सेवा करते हैं...वास्तव में देश-सेवा का मूलाधिकार भी इन्हीं टापरों में ही निहित है।

           इधर कुछ लोग देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की शिकायत भी करने लग रहे थे। तथा कुछ देश की आर्थिक प्रगति की धीमी गति पर अपने वित्तमंत्री की खिंचाई करते भी देखे जा सकते हैं। तमाम अर्थवेत्ता अपने-अपने तईं देश के इस घटती अर्थव्यवस्था दर पर अपने कारण भी गिनाते जा रहे हैं...लेकिन, मुझे तो लगता है, इनके गिनाए कोई भी कारण सटीक नहीं है...आईए लगे हाथ मैं आपको कारण बताए दे रहा हूँ... वह भला हो बिहार के उस पत्रकार का, जिसने सोशल-मीडिया पर एक फोटो वायरल की थी! भाई लोग बिहार बोर्ड परीक्षा में बेसीढ़ी चौथे मंजिल की खिड़कियों पर भी लपक-लपक कर टापर बनाने का काम कर रहे थे। इसके बाद ही बिहार में लोग टापरों की खोजबीन में लगे और "प्रोडिकल-साइंस" विषय के टापर को खोजकर सामने धर दिए थे। तो भाई, सामने आ गया टापर-घोटाला! 

           अब आप तो समझ ही गए होंगे यह टापर-घोटाला ही देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर किए हुए है, और देश को घोटाले की ओर धकेल दे रहा है। मतलब, एकमात्र टापर-घोटाला ही, देश के विकास-दर की उठापटक और यहाँ के घोटालों की जड़ में है। हाँ, जो बेचारे अच्छे टापर होते हैं, देश, विकास की चढ़ाई उन्हीं के माथे कर रहा है। देश में विकास की कमी दिखाई देती है तो इसके पीछे इस टापर घोटाले को ही जिम्मेदार माना जाए। मेरी तो अपनी यह मान्यता है कि, जब तक पूरी तरह टापर रूपी देश के इस महा घोटाले की जड़ में न पहुँचा जाए तब तक आजादी के बाद से जो भी चाहे जिस परीक्षा में बैठा हो, उन सभी को टापर ही माना जाए..कम से कम इसी बहाने हमें भी टापर होने का सुख नसीब हो जाएगा...! बाकी देश-सेवा का काम जारी तो हईयै है...जय हो देश के टापर महराजों की..!! 

          अन्त में, चलते-चलते टापरों के व्यंग्यियाने के इस देश विरोधी लेख में 'टापर' और 'देश-सेवा' की खूब पुनरावृत्ति हुई है..! ऐसा इसलिए कि, टापर और देश-सेवा में बेशकीमती अन्योन्याश्रित संबंध होता है। 

खेती का परदूषण

            वो क्या है कि इधर मैं भी गाँव चला गया था। कुछ खेती-किसानी जैसी बातों पर ध्यान गया तो किसान-आन्दोलन को लेकर किसानी पर लिखने के लिए किसी खेतिहर के खेती करने जैसा मन तड़फड़ाने लगा था। लेकिन गाँव के हालत तो सबको पता ही होते हैं, वहाँ नेटवर्क की समस्या होती है, और गाहे-बगाहे नेटवर्क मिले भी तो, बेदर्दी मानसून की तरह यह कभी आया या कभी न आया। सो, लिखने से मन भी उचट गया था। ऐसे ही तो किसान का भी मन किसानी से उचट जाता है! 

         तो, खेती-किसानी और लेखन-वेखन को मैं एक ही तराजू पर तौलता हूँ। लेखक बेचारा लिख-लिख कर थक जाता है, मगर प्रकाशक भी है कि सरकार टाइप का बना रहता है, उसका मन पसीजता नहीं और लेखक के लेखन को किसी किसान के खेत की उपज टाइप का समझ लेता है। इसी तरह बेचारा किसान भी लेखक की तरह दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हो जाता है। 

        असल में क्या है कि सब कुछ नेटवर्क का ही खेल है, खेती भी नेटवर्क आधारित होती है। वैसे अच्छे नेटवर्क का मिलना हमारे देश में आज भी दैवयोग ही है और भारतीय खेती भी तो दैवयोग पर ही आधारित होती है! दैवयोग का मारा बेचारा यह किसान, एक अलग तरीके का नेटवर्क डेवलप करने के चक्कर में, खेत में पसीना बहाने के बजाय इसी में अपना पसीना बहाने लगता है। फिर अच्छा नेटवर्क मिल जाने पर औने-पौने अपना जोतबही उसी नेटवर्क को सौंपकर थक-हार कर घर लौट आता है। 

         एक बात और है...आज का किसान जन्म लेते ही इस नेटवर्क में स्वयं को जकड़ा हुआ पाता है। बचपन में मुझे याद है, खेती फायदे के लिए नहीं की जाती थी..इसका उद्देश्य पेट भरना हुआ करता था, लोग मजे से खेती किया करते थे और अपने लिए साल भर का अनाज पैदा करने पर ही संतुष्ट हो जाते थे। लेकिन अब क्या है कि आर्थिक लाभ का जमाना है, देश का पूरा सिस्टम इस लाभ के खेल में जकड़ा हुआ है और लाभ के सिस्टम का यह खेल किसानों पर भारी पड़ गया है। खेती तो व्यवसाय नहीं बन पाई, लेकिन उसके बच्चे को भी व्यवसायिक शिक्षा चाहिए, बेटी की शादी में वर पक्ष के लाभ की आकांक्षा में मोटा दहेज देना है...किसी से कमतर न दिखें इसके लिए स्टेटस भी मेंटेन करना है..और इन सब के बाद हारी-बीमारी से बचने के लिए इलाज की मँहगाई जैसे आर्थिक लाभ और जीवन यापन के बीच के अजीब से बन चुके नेटवर्क में उलझे किसान की खेती भी बंधक टाइप की हो चुकी है। लेकिन यह सब, खेती से कहाँ पूरा होगा..? खेती बेचारी कितनी बोझ सहेगी..? फिर तो, किसान को कर्ज में डूबना ही है..!

  देश का यही आर्थिक संजाल गाहे-बगाहे किसानों को भड़काता है, आंदोलित करता है। लेकिन स्वयं किसान आंदोलित होता है, इसपर मुझे सन्देह रहा है और है..! "दैवयोग" पर निर्भर किसान कभी आंन्दोलित हो ही नहीं सकता...यहाँ मैंने बुंदेलखंड में देखा है...लगातार सूखा पड़ने के बाद भी किसान टस से मस नहीं होता.. पानी बरसा तो ठीक नहीं तो, शहरों में भागकर मजदूरी करना ही है, और सरकार है कि आजतक यहाँ के किसानों को सिंचाई का कोई नेटवर्क नहीं दे पायी है। मुझे आश्चर्य है, यहाँ के किसान आन्दोलन क्यों नहीं करते..? कारण, जिनको आन्दोलन करना है वे "सेफ्टीवाल्व" की तरह हैं..किसान और किसानी पर हावी हैं और तमाम संसाधनों पर इन्हीं का कब्जा है। जब कभी ये असंतुष्ट होते हैं तो किसान और किसानी को जरूर मोहरा बना लेते हैं और फिर मतलब सध जाने के बाद चुप बैठ जाते हैं। यही नहीं यहाँ के खनिज-कर्म से बर्बाद होती खेती पर ये पसीजते तक नहीं, इनसे किसानों से कोई मतलब नहीं।

  असल में किसान-आन्दोलन और कुछ नहीं बिचौलियों का अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए छेड़ा गया संघर्ष है, जिससे किसानों का कोई लेना-देना नहीं होता। इनमें से जो तथाकथित किसान आन्दोलनरत दिखाई भी देते हैं उनके घरों में किसानी-कृत्य और कृषि-उपज को "परदूषण" की भाँति देखा जाता है। उस दिन खेती का हालचाल पूँछने पर मेरी चाची किसी ऐसे ही किसान के घर का हालचाल बता रही थी -

  "बेटवा आजकल खेती क हाल का बताएं...पहिले जइसे वाली बात अब नाहीं बा... अब नई बहू शहर से गाँव आवत हैं तो...अरहर दलते हुए छिलका देखि के अपनी सास से कहत हैं कि मां जी इहाँ घर में बहुत परदूषण फइला है, रहना मुश्किल है।"

    तो, भइया जिनके घरों में खेती "परदूषण" की तरह देखी जाती है वह किसान आंदोलन की अगुवाई करते हैं....बाकी हम जैसे लोग, हमारे ही इनकमटैक्स से खरीदी हुई सरकारी सम्पत्तियों को धूँ-धूँ जलते हुए देखने के लिए मजबूर होते हैं। 

    'बाईपास' का कल्चर!

              उस  दिन वे, जैसे किसी परेशानी में थे। मिलते ही बोले, "यार, वे सब मुझे बाईपास कर रहे हैं।" मतलब, उन्हें बाईपास किया जाना ही उनकी परेशानी का कारण था। नीचे से आती पत्रावलियाँ उनके टेबल को बाईपास करते हुए सीधे ऊपर वाली टेबल पर चली जा रही हैं। वे अपने होते इस दायित्व-क्षरण के कारण पत्रावलियों के गुण-दोष-अन्वेषण जनित लाभादि से वंचित हो रहे हैं। 

            यह पहला अवसर था जब 'बाईपास' शब्द मेरे जेहन में उमड़-घुमड़ मचाते हुए एक वीआईपी शब्द की तरह व्यवहार करने लगा था। उचकते हुए तब मैं उनसे बोला था, "यार..हमारी संस्कृति में 'बाईपास' वाला कल्चर तो वैसे है नहीं..!"  इसी कथन के साथ मेरा ध्यान बचपन के मेरे अपने कस्बे की ओर चला गया, जब पहली बार मैं किसी नयी-नयी बनी बाईपास-सड़क से रुबरु हुआ था। 

           बचपन में निर्मित उस सड़क के साथ ही 'बाईपास' शब्द से मेरा प्रथम परिचय भी हुआ। तब मैं सोचता, आखिर सूनसान और निर्जन स्थान से गुजरने वाली यह सड़क क्यों बनी ? फिर थोड़ी समझदारी आने पर इस बाईपास-सड़क के बनने का कारण मेरी समझ में आ गया था। 

           एक बार रोडवेज बस से मुझे अपने कस्बे मुँगरा बादशाहपुर से इलाहाबाद जाना हुआ था ; तब बीच में पड़ने वाले सहसों बाजार में भी एक नया-नया बाईपास बना था। लेकिन उस दिन बस ड्राइवर जल्दबाजी के चक्कर में बस को बाईपास सड़क से न ले जाकर सीधे सहसों बाजार के बीच से ले गया था। हड़बड़ी में बाजार की सँकरी सड़क से निकलते हुए बस एक खंभे से रगड़ खा गई और एक महिला का हाथ बुरी तरह चोटिल होकर लहूलुहान हो गया था। बाद में बस ड्राइवर और कंडक्टर की खूब लानत-मलानत हुई थी। इस एक घटना के बाद मुझे 'बाईपास' का महत्व समझ में आया था। शायद, उसी दिन बस ड्राइवर को भी 'बाईपास' की समझ हो गई होगी। 

             जेहन में उभर आए इन खयालों में खोए हुए ही मैं हलकी सी मुस्कुराहट के साथ बोला, "यार, तुम पत्रावलियों की गति में, बंद सँकरे बाजार की तरह अवरोध उत्पन्न करते होगे..इसीलिए तुम बाईपास किए जा रहे होगे...अब ओपन मार्केट का जमाना है, खुली सड़क से रास्ता तय किया करो..और चीजों को फर्राटा भरने दो...ट्रैफिक-पुलिस भी मत बनो"। खैर, मेरी इस बात पर ना-नुकुर करते हुए वे उठकर चल दिए थे। 

            इधर मैं, 'बाईपास' शब्द में खो गया। Bypass वैसे तो अंग्रेजी का शब्द है, लेकिन हिन्दी भाषा में इस शब्द का चलन किसी मौलिक शब्द की तरह ही होने लगा। वैसे भी, हिंदी में ढूंढने पर "उपमार्ग" के अलावा 'बाईपास' शब्द का कोई दूसरा समानार्थी शब्द भी नहीं मिलता। लेकिन bypass से जो अर्थ प्रतिध्वनित होता है, कम से कम "उपमार्ग" शब्द से वैसा अर्थ निकलता हुआ मुझे प्रतीत नहीं होता। "उपमार्ग" में आया हुआ उपसर्ग 'उप', 'उपमुख्यमंत्री' शब्द में आए 'उप' टाइप का ही है। जबकि 'बाईपास' स्वतंत्र वजूद वाले मुख्यमार्ग की तरह होता है, जिसे नजरंदाज करना समस्या को दावत देने जैसा हो सकता है, जैसा हमारी बस के साथ हुआ था। 

          एक बात और है, अपने सटीक अर्थ के कारण ही 'बाईपास' शब्द को आत्मसात किया गया है। इसीलिए मैं चाहता हूँ, यह शब्द हिन्दी शब्दकोश में भी स्थान पाए। 

            यहाँ उल्लेखनीय है कि किसी दूसरी भाषा का शब्द हम तभी आत्मसात करते हैं जब उससे अधिक सटीक शब्द हमें अपनी भाषा में नहीं मिलता। किसी भाषा और उसकी शब्दावली पर ध्यान देने पर यह बात स्पष्ट होती है कि भाषा और बोली पर संस्कृति का जबर्दस्त प्रभाव होता है। मतलब कोई भी भाषा-बोली अपने क्षेत्र की संस्कृति को भी अभिव्यक्त करती है।

            तो, आखिर हमारी हिन्दी शब्दावली में "बाईपास" का समानार्थी शब्द क्यों नहीं है? और "उपमार्ग" को इसका समानार्थी क्यों नहीं माना जा सकता?

           इसके पीछे हमारे सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार हैं। स्पष्ट है कि, कण-कण में भगवान देखने वाले हम "बाईपास" जैसा शब्द ईजाद नहीं कर सकते! मतलब हमारे कल्चर में 'बाईपास' का कोई स्थान नहीं रहा है। वहीं पर हम किसी को छोटा-बड़ा जरूर बनाते रहे हैं और इसी चक्कर में हमने 'उप' ईजाद किया हुआ है। मतलब, 'उप' प्रकारांतर से फ्यूडलिज्म का पोषक है। आजकल यह 'उप' किसी विवाद के शांतिकारक तत्व के रूप में भी प्रयोग होता है। जैसे, किसी को "उप" घोषित करके भी विवाद को टाला जा सकता है। लेकिन बेचारे इस 'उप' को कभी 'मुख्य' होना नसीब होता है या नहीं, यह अलग से चिंतनीय विषय हो सकता है। फिर भी इस 'उप' को राहत इस बात से मिल सकती है कि यदि ज्यादा हुआ तो भविष्य के मार्गदर्शक-मंडल में सम्मिलित होकर यह शांति का जीवन व्यतीत कर सकता है। 

            वैसे तो हम कम या ज्यादा सभी को महत्व देते हैं। फिर भी, यह 'बाईपास' शब्द जहाँ से आया है, वहाँ के लोग हमसे ज्यादा विकसित और सभ्य क्यों दिखाई देते हैं?

           असल में, हमारे यहाँ 'उप' और 'मुख्य' का चक्कर कुछ ज्यादा ही है ! और 'मुख्य' को मुख्य बनाए रखने हेतु ही 'उप' का सृजन हुआ है। बेचारा यह 'उप', उपेक्षा टाइप की फीलिंग से बचने के लिए अपनी व्यर्थ की महत्ता दिखाता है और फिर, अपने अवरोधक टाइप के विहैव के कारण 'बाईपास' का शिकार होता है।

           वास्तव में हम ऊपर से लोकतांत्रिक लेकिन अन्दर से अलोकतांत्रिक ही होते हैं। वहीं "बाईपास" में लोकतांत्रिकता का पूरा तत्व होता है, जो किसी के 'बपौती' को जमींदोज करता है। इसी कारण पश्चिमी देश के लोगों में चीजों को बेहिचक बाईपास कर देने का गुण होता है, वे 'उप' या 'मुख्य' में नहीं उलझते ! वहाँ कोई भी 'बाईपास' से चलकर मुख्य हो जाने का लुत्फ उठा सकता है। ये पश्चिमी कल्चर वाले आगे बढ़ना जानते हैं। अगर हम आगे बढ़ना जानते होते तो, हम भी 'बाईपास' जैसा ही शब्द गढ़े होते ! 

             हाँ, हमने 'बाईपास' को आत्मसात तो किया, लेकिन हमारे लिए, आगे बढ़ाने की बजाय यह किसी की उपेक्षा करने में कुछ ज्यादा ही काम आता है। इस प्रकार अपने देश में 'बाईपास' के सौजन्य से, हम अपने तरीके से सुखी और दुखी हो लिया करते हैं। 

            ***
            

            

           

             

           

        

मेरे मानहानि का मामला!

उस दिन आफिस की डाक मार्क करते-करते अचानक एक शिकायतनुमा पत्र पर मेरी नजर ठहर गयी। एक ही झटके में या कहिए पूरा पत्र अपलक पढ़ गया था। पढ़ते ही दिमाग भन्ना गया था। घंटी दबाई और दबाता ही चला गया। हड़बड़ी में चपरासी सामने आ खड़ा हुआ, मैंने तत्काल कार्यालय सहायक को हाजिर कराने का फरमान सुनाया।

कुछ ही क्षणों में सामने की कुर्सी पर बैठे हुए अपने कार्यालयाधीक्षक को पत्र पकड़ाते हुए कहा-

“लीजिए जरा इसे पढ़िये तो..!”

“सर ! अभी तक तो उस प्रकरण पर कोई डिसीजन ही नहीं हुआ है…यह शिकायत तो फर्जी है…सरासर आपके मानहानि का मामला बनता है।”

मेरे ओ एस ने पत्र में अभिव्यक्त मेरी शिकायत की गंभीरता को आँकते हुए कहा था।

“मैं इस शिकायतकर्ता के विरुद्ध थाने में एफआईआर करके हाईकोर्ट में मानहानि का दावा करुँगा..!” मैं भन्नाए हुए स्वर में बोला था।

“देखिए सर, आप परेशान मत होइए, पहले शिकायतकर्ता को नोटिस भेजकर शिकायत के सम्बन्ध में साक्ष्य मांगते हैं, फिर उसके विरुद्ध विधिक कार्यवाही की जाए..!”

मेरे ओ एस ने अपनी बात जारी रखते हुए मुझे बताया -

“वैसे सर, इस शिकायतकर्ता की यही आदत है…इसी तरह शिकायत कर यह लोगों को ब्लैकमेल करता है..! सूचना आयोग तक पहुँच जाता है।”

शायद बड़े बाबू ने अपने अनुभव के आधार पर कहा था।

“देखिए! जब ब्लैक होगा, तब न मेल होगा…! वैसे भी हम ब्लैकमेल में विश्वास नहीं करते..और न होते हैं..आप एक तगड़ी नोटिस बनाईए...मैं भी उसे बताउंगा कि किससे पाला पड़ा है..!!” मैंने लगभग गुस्से में कहा था।

इसके बाद शिकायतकर्ता को मैंने एक तगड़ी नोटिस जारी करा दिया था।

इधर अपने एक परिचित वकील-मित्र को फोन लगाया और हलो-फलो के बाद हमारी बातचीत शुरू हुई -
“देखो यार…एक मेरे मानहानि का मामला है...कोर्ट में केस फाइल करनी है..।” पूरी बात से अवगत कराते हुए मैंने कहा था।

“हूँ…..तो, कितने तक के मानहानि का दावा ठोंकें…?” उधर से वकील मित्र की आवाज थी।

“अरे यार वकील तुम हो कि मैं..! इस केस में जितने का दावा बनता हो उतना ठोक दो..वैसे तुम मेरे मित्र भी हो..मेरे मानहानि का आकलन तो कर ही सकते हो।” कुछ भन्नाहट में मैंने कहा।

“हाँ वकील तो मैं हूँ ही...लेकिन मानहानि तुम्हारी हुई है…तुम्हीं आँक सकते हो कि तुम्हारी कितने की मानहानि हुई है...एक बात और है, तुमसे तो मैं अपने वकालतनामे का फीस भी नहीं लुँगा…लेकिन मुंशी-उंशी रखने का कुछ खर्चा-वर्चा तो पड़ता ही है….तो, ऐसा करना जितने की मानहानि आँकना उसमें बीस हजार और जोड़कर बताना….उतनई का मानहानि-दावा कर देंगे…!”

इतना कह कर वकील मित्र ने फोन काट दिया था।

उधर फोन कटा और इधर मैं, मेरे मान को पहुँची क्षति का आकलन करने लगा था। इसी माथापच्ची में कुर्सी पर बैठे-बैठे ही न जाने कब मुझे नींद आ गई थी।

जज सहब के सामने गवाहों के कटघरे में मैं खड़ा था… जज साहब ने मुझसे पूँछा -

“हाँ तो मिस्टर….आपने, अपने मान की हुई हानि का यह आकलन कैसे किया...? किन सबूतों के आधार पर और किस तरीके से…?”

“मी लार्ड! मेरा मान है...मैं जन्म से मानिंद हूँ ….अपने मान के बल पर ही इस मान-दार पद को सुशोभित कर रहा हूँ…शिकायतकर्ता के आरोप पर पदच्युत होना पड़ सकता है और मेरा मान-दान जाता रहेगा….मेरी आय प्रभावित होगी…यही नहीं मी लार्ड! स्वयं को पुनर्स्थापित करने और ऊपर से नीचे तक पाक-साफ सिद्ध करने और कराने तक मुझे भारी वित्तीय क्षति उठानी पड़ेगी...इसी हर्जे-खर्चे को शिकायतकर्ता से दिलवाया जाए।”

जज को प्रभावित करने हेतु लगभग दीनता के भाव लाते हुए मैंने अपनी गवाही में कहा।

“मिस्टर..सो तो ठीक है…लेकिन आपके प्रस्तुत मानहानि के हिसाब में दावे में बीस हजार अधिक क्यों है? उसके बारे में आपने कुछ नहीं बताया ..!!”

तीखी नजरों से घूरते हुए न्यायमूर्ति ने मुझसे पूँछा।

माननीय न्यायमूर्ति (जिनका मान अक्षुण्ण रहता है, वही माननीय होते हैं) की इस पृच्छा पर मैं थोड़ा हड़बड़ाया तो जरूर लेकिन अगले ही पल सँभलते हुए बोला -

“मी लार्ड…! मेरे मानहानि में प्लस यह बीस हजार रूपया हमारे बेचारे वकील साहब के आफिस के सेटअप का है…जिसे मैं वकील साहब को दे दुँगा…वेैसे वे संकोचवश हमसे फीस नहीं लेते..!”

मेरी इस गवाही पर जज साहब नाखुश से हो गए और मेरे वकील-मित्र से मुखातिब होते हुए कहा -

“वकील साहब! आप और आपके ये मुवक्किल दोनों काले धन के सृजन में लगे हुए प्रतीत होते हैं…वादी ने अपने शपथपत्र में मानहानि से एक्सेस बीस हजार रूपए का हिसाब छिपाया है…ऐसी स्थितियों में क्या पता वादी मुकदमा जीतने के बाद आपको यह रूपया न दे और यदि दे भी तो इस धन को आप अपना काला-धन बना लें…! दोनों ही स्थितियों में यह काले-धन का मामला बनता है…. फिर क्यों न आप और आपके मुवक्किल यानि कि वादी, दोनों के अर्जित सम्पत्ति की ईडी और इनकमटैक्स विभाग से जाँच करा ली जाए…? इस जाँच के बाद ही कोर्ट वादी के मानहानि आकलन के सही निष्कर्ष पर पहुँचेगा…इसी के साथ आज का कोर्ट एड्जर्न किया जाता है।”

जज साहब के इस निर्णय पर भौंचक हो मेरे वकील-मित्र अपना दलील पेश करने लगे थे -

“मी लार्ड…. मी लार्ड…! जरा मेरी भी सुनिए… मेरे मुवक्किल ने कोर्ट के समक्ष मानहानि का झूँठा शपथ-पत्र प्रस्तुत किया है…इसके लिए मेरे मुवक्किल को जेल भेजा जाए….न कि मेरे सम्पत्ति की ईडी और इनकमटैक्स विभाग से जाँच करायी जाये…! यह काले-धन का नहीं स्वयं वादी के झूठ बोलने का मामला है।”

लेकिन, जज साहब जा चुके थे…वकील मित्र ने दौड़कर मेरा कालर पकड़ लिया था। मैं मित्र से अपने गवाही पर माफी मांगते हुए कहे जा रहा था -

“यार हम भी तो ईडी और इनकमटैक्स के जाँच में नहीं फंसना चाहता… इसके बदले झूँठा हलफनामा देने के आरोप में जेल जाने के लिए तैयार हूँ… तैयार हूँ…”

मेरा फालोवर मेरे कुर्सी का तौलिया ठीक करते हुए से कह रहा था “ फिर चलिए साहब, छह भी बज गये हैं आफिस से सभी जा चुके हैं…” न जाने कब आफिस की एसी में कुर्सी पर बैठे-बैठे ही मुझे नींद आ गई थी।

एक दिन आफिस सुपरिंटेंडेंट मेरे समक्ष स्वयं हाजिर हुए और कुर्सी पर बैठते हुए बोले थे -

“साहब, शिकायतकर्ता ने नोटिस का जवाब दे दिया है अपने आरोपों के संबंध में उसने कोई साक्ष्य नहीं दिया है, बस गोल-गोल बाते ही लिखा है…मानहानि के बारे में किसी वकील से बात कर लिया है न..?”

“अरे बड़े बाबू! छोड़िए…जनहित में मानहानि का दावा हम नहीं करेंगे…शिकायतें होती रहें, इसी में शिकायतकर्ता से लेकर हम सब का लाभ है..!”

मैंने अब तक अपने मानहानि के दावे का हिसाब लगा लिया था। मुझे दावे करने में ही हानि ज्यादा नजर आया था और इसके मुकाबले मेरे मान में हानि नहीं हुई थी। इसीलिए दबी हुई मुस्कुराहटों के साथ प्रकरण को समाप्त करने के उद्देश्य से मैंने लाभ की बात कही।

बिना शीर्षक का व्यंग्य बे-कालर जैसा!

“फलाने! तुम सुन लो, मैं तुम्हारा कालर पकड़ कर घसीटते फला जगह हुए ले जाऊँगा..” इस वाक्य को सुनकर मुझे पक्का यकीन हो चला कि किसी के हाथ किसी के गिरेबान तक या तो पहुँच चुके हैं या फिर पहुँचने वाले हैं...मतलब गिरेबान पर निगहबान हैं आँखें..! टाइप का कोई देश-भक्ति से लबरेज हाथ ही कालर की ओर रुख कर सकता है।

इस कथन के वाकिये से जूनियर क्लास में पढ़ते समय का एक वाकया मुझे याद हो आया। तब हम दो सहपाठी बच्चे एक दूसरे का कालर पकड़े हुए काफी देर तक हिलाते-डुलाते रहे थे। वो तो मास्साब के डर से हम एक दूसरे का कालर छोड़ कालर-वालर ठीक करते हुए क्लास रूम में फिर घुस गए थे, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो…! खैर..

एक बात तो तय है, कालर पकड़म-पकड़ाई के खेल में कालर में थोड़ा सिकुड़न जरूर आ जाता है लेकिन इसे तानतूनकर फिर से खड़ा किया जा सकता है। मतलब इससे एक तरह का हड़काने जैसा विरोध प्रदर्शन वाला काम तो हो सकता है, लेकिन कालर का कोई खास हर्जा-खर्चा नहीं होता, सिवा फिर से बटन टाँकने (यदि कालर पकड़ने से बटन-वटन टूटा हो तो) के! कुल मिलाकर इस्त्री फिराई के साथ दो-चार रूपए के खर्च में ही कालर फिर से खड़ा हो जाता है।

वैसे एक बात तो है, असली नेता सचमुच के समझदार होते हैं..! ये व्यर्थ की कालर वाली चुनौती में पड़कर दो-चार रूपए भी नहीं खरचना चाहते इसीलिए अपनी वेशभूषा में बिना कालर का कुर्ता शुमार किये हुए हैं, अब कोई क्या पकड़ कर घसीटेगा! अपने इस ड्रेसकोड के साथ ये नेता पूर्णरूपेण सुरक्षित होकर बिन्दास घूमते हैं।

लेकिन कुछ नौसिखिया टाइप के नए-नए भए नेता भी होते हैं। जो बे-कालर वाले कुर्ते की बारीकी नहीं समझते और एकदम से आम आदमी वाले फैशन में कालर वाली शर्ट पहनकर बोल-बोलकर अपने ऊँचे कालर की ओर इशारा करते रहते हैं। लेकिन जमाना बड़ा खराब है, अगर ऐसी ही शर्ट पहनना ही है तो मौनी बाबाओं से सीख लेते हुए मौन रहना ही श्रेयस्कर होता है, अन्यथा चिढ़न में किसी का भी हाथ गिरेबान तक पहुँच सकता है और फिर घसीटे जाने का खतरा मँडराता ही रहेगा!

तो, बिना शीर्षक के व्यंग्य टाइप का बे-कालर बने रहना ही ठीक रहेगा, लोग खिंचाई नहीं कर पाएँगे।

एक जामग्रस्त देश का दार्शनिक व्यू!

     उधर बेचारी भारतीय सेना सीमा पर पाकिस्तानी बंकर को तबाह करने में लगी है और इधर भारत के अंदरखाने में हम या तो जाम लगाए बैठे हैं या जाम में फँसे भये पड़े हैं।

     अभी उस दिन पाँच बजे सुबह यह सोचते हुए घर से निकला था कि साढ़े तीन या फिर चार घंटे में अपने कार्य स्थल पर पहुँच ही जाएँगे। लेकिन हाईवे पर करीब आधे घंटे की ड्राइव के बाद जाम से सामना हो ही गया। मेरे आगे-पीछे वाहनों की लम्बी आड़ी-तिरछी कतारें लग चुकी थी। यूँ ही जाम में फंसे-फंसे वहीं एक स्थानीय व्यक्ति से मैं जाम का कारण पूँछ बैठा था-

   “भईया सबेरे-सबेरे यहाँ जाम लगने की कोई संभावना तो होती नहीं फिर काहे यह जाम लगा है?”

      उस बेचारे ने कहा -

    “अरे..वही पुलिस वालों की वसूली-फसूली के चक्कर में ये ट्रक वाले आड़े-तिरछे निकलने के चक्कर में जाम लगा बैठते हैं...हाँ, वैसे यहाँ जाम लगने का कोई कारण नहीं होता…”

        खैर, पुलिस वाली बात को कोई तवज्जो न देते हुए मैं जाम का कारण तलाशता रहा, क्योंकि लोग इन बेचारे पुलिसवालों के पीछे नाहक ही हाथ धोकर पड़े रहते हैं। फिलहाल आधे घंटे बाद सरकना चालू हुआ और सरकते-सरकते दस मिनट बाद जब जाम से फारिग हुआ, तो जाम लगने का कोई कारण नजर नहीं आया।

      हाँ, जाम ने हमें एक नए दार्शनिक ज्ञान की अनुभूति कराई! वह यह कि, हमारे भारतीय दर्शन में आया कार्य-कारण सिद्धांत एकदम से झूँठा है। मेरे नवाअर्जित इस ज्ञान के अनुसार, बिना कारण के ही कार्य घटित होता रहता है तथा कार्य और कारण दोनों एक दूसरे से अलग, स्वतंत्र और चिरस्थायी तत्व होते हैं। इसीलिए यहाँ सदैव कार्य और कारण दोनों समानांतर विद्यमान रहते हैं तथा हमारे देश के लोग अपने-अपने तईं इस कारण और  कार्य की भोगानुभूति में मशगूल रहते हैं।

      तो, इसप्रकार समस्या चिरस्थायी टाइप का एक कार्य ही है। खैर, बिना कारण के घटित कार्य का सामना करते हुए चालीस मिनट विलंब से मैं अपने गंतव्य पर पहुँचा था।

        इसी तरह कल भी जाम जैसे एक चिरस्थायी कार्य के बीच मैं फँस गया था। इस बेमतलब के जाम में मेरा घंटे भर का समय चला गया और इसमें फँसे-फँसे मैंने सुना, कोई कह रहा था -

       “इस समय पुलिस वालों की ड्यूटी बदलती है.. चौराहे पर ट्रैफिक को नियंत्रण करने वाला कोई नहीं होगा…पुलिसवालों के आने पर ही जाम खुल पाएगा।”

      मतलब यह देश बड़ा रहस्यमयी टाइप का है! जहाँ पुलिसवाले हों वहाँ जाम...और...जहाँ पुलिसवाले न हों वहाँ भी जाम...!! इस देश में, किसी का कहीं होना या न होना सब बराबर ही होता है।

         एक बात और, अपने देश में ड्यूटी बदलने का समय सबसे क्रूसियल टाइम होता है। अभी एक वायरल वीडियो में दिखाई पड़ा कि किसी रेल टिकट खिड़की पर एक महिला कर्मचारी लाइन में लगे लोगों को टिकट देने के बजाय नोटों के बंडलिंग में मशगूल है…यात्रियों के हो-हल्ले पर वह बोलती है -

         “यह ड्यूटी बदलने का समय है”

      अब किसी की ट्रेन छूटे तो छूटे उसका क्या जाता है! उसकी ड्यूटी बदलने का समय हो चुका है। यही नहीं ड्यूटी बदलने के समय ही यहाँ आतंकी हमला भी हो जाता है। आशय यह कि अव्यवस्था वाले टाईम में व्यवस्थित होना हम नहीं सीख पाये हैं।

         अब कल वाले जाम को ही लीजिए…इसकी तह में जाने पर मुझे दो बातों की स्पष्टानुभूति हुई…एक तो हम स्वयं व्यवस्थित नहीं होते, दूसरे किसी और के लिए कोई स्पेस भी नहीं छोड़ना चाहते। उस जाम में, एक ट्रक वाला मेरे कार के दायीं ओर से आकर सामने की छूटी थोड़ी सी खाली जगह में ही अपने ट्रक को आड़े-तिरछे घुसेड़ने का प्रयास करने लगा था, बल्कि इस चक्कर में उसने दूसरों का भी रास्ता अवरुद्ध कर दिया। जब मैंने उसे टोकते हुए कहा -

     “ट्रक को स्कूटी बना लिए हो का” तो खींसें निपोर मुस्कुराते हुए वह बोला था -

    “थोड़ा आगे बढ़ा लें..पीछे जाम लग रहा है।”                

       मतलब, यहाँ हर कोई समस्या का कारण अपने से आगेवाले पर ही थोपने का आदी है। खैर…

       अपना देश एक जामग्रस्त और स्पेसविहीन देश बन चला है। कहते हैं, कोई चौराहा हो या चार लोग हों, ये मिलकर आगे की राह के विकल्प सुझाते हैं और  रास्ता खोलते हैं। लेकिन यहाँ अपने देश में किसी चौराहे पर चार लोग इकट्ठा हुए नहीं कि जाम लगा बैठते हैं..! छोटे-बड़े सभी टाइप के बौद्धिक फितूर वाले ड्राइवर आड़े-तिरछे होकर आगे निकलने की होड़ में किसी भी खाली स्पेस पर कब्जा जमा कर लोगों का आगे बढ़ना ही मुश्किल कर देते हैं।

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मेरी गार्दनिक तन्यता!

          वाकई, बेचारा यह दिल, दिल ही तो है, जो पता नहीं कब किस बात के लिए हुड़कने लगे! जैसे, आजकल यह किसी सम्मान-मंच से सम्मानित होने के लिए हुड़क रहा है। हुआ यूँ कि, एक मेरे स्नेही सज्जन कुर्सी पर बैठने के समय के मेरे कामों की मुझसे जबर्दस्त प्रशंसा कर गए थे..! और तब फूलकर मैं ऐसे कुप्पा हुए जा रहा था कि जैसे उन महाशय ने प्रशंसा के पम्प से मुझमें गौरवबोध का हवा भर दिया हो।

     एक बात है, प्रशंसित मनुष्य का दिमाग गौरवबोध की हवा से फूलकर उड़ते गुब्बारे की भाँति उर्ध्वगामी हो जाता है। इस उड़ते हुए दिमाग के कारण ही प्रशंसित मनुष्य की गर्दन कभी-कभी तन कर अकड़ जाती है। खैर, इसी तरह कुछ और प्रशंसाओं के बाद दिमाग में भर चुके गौरवबोध के प्रेशर में मेरी भी गर्दन तन कर अकड़ने लगी थी। एकबारगी तो, मेरा गौरवबोध मुझे डरावना लगा, क्योंकि गौरवबोध के प्रभाव में उठी मुंडी से मेरे गर्दन के शुतुरमुर्गी हो जाने का खतरा मुझे जान पड़ा।

       लेकिन इस खतरे के आभास के साथ ही मेरा ध्यान सम्मान-मंचों पर सम्मानित होती शख्शियतों की गर्दनों पर भी चला गया। अकसर ऐसे मंचों पर सम्मान-लब्धता के दौरान इन शख्शियतों की गर्दनें पुष्प-मालाओं के लिए छोटी पड़ जाती हैं, और तब ये महानुभाव अपनी माल्यार्पित गर्दनों से पुष्प-मालाओं के जखीरे को स्वयं उतारते हुए देखे जा सकते हैं, ताकि कोई बचा-खुचा सम्मानकर्ता भी माल्यार्पण कर अपनी भड़ास पूरी कर सके। इस तरह ये बेचारी महान शख्शियतें सम्मान-कर्ताओं के सम्मान का सम्मानपूर्वक खयाल भी रखती हैं। यदि मैं सम्मानाकांक्षी के रेस में न होता, तो माल्यार्पित गर्दन वाले सम्मान-लब्ध शख्स द्वारा मेरी पुष्प-माला के साथ ऐसे किसी भी दुर्व्यवहार पर, मैं अवश्य अपमानित महसूस करता। क्योंकि, मेरी यही कामना रहेगी कि सम्मानित महानुभाव के गर्दनार्पित मेरी पुष्प-माला मेरे ही समक्ष न उतारी जाए। इसके लिए सम्मानार्जन करने वाले की गर्दन लंबी होनी चाहिए, इसीलिए मेरी प्रशंसा पाने की भूख बढ़ गई है और मैं हाथ जोड़कर विनम्र भाव से अपने प्रशंसकों को “हमको लिख्यौ है कहा, हमको लिख्यौ है कहा” की भाँति से खोजता फिरता हूँ। मेरे लिए तो वही भगवान है जो मेरी प्रशंसा करे, सो मैंने मन ही मन ठान लिया कि प्रशंसित होता हुआ मैं गौरवबोध के प्रेशर में गर्दन को अकड़ने दुंगा क्योंकि, इसके प्रभाव में मेरी तनी हुई गर्दन पुष्प-मालाओं के जखीरे को धारण करने में समर्थ होगी और बेचारे माल्यार्पण करने वालों का भी सम्मान बरकरार रहेगा। आखिर दूसरों को मान देने से ही तो अपना भी मान बढ़ता है..! यही मानार्जन का सीधा सा फंडा भी होता है। सम्मानदाताओं के प्रति इस सहृदयता पर मेरा गौरवबोध और भी मचल उठा था। बल्कि सारा ध्यान गर्दन की लंबाई पर चले जाने से मेरे पैरों का संतुलन भी थोड़ा गड़बड़ाया और मैं गिरते-गिरते बचा। खैर...

            जब मुझे अपनी तनी गर्दन की प्रतीति हुयी तो मेरा प्रखर व्यक्तित्व मुझे पहली बार आभासित हुआ और अब मैं स्वयं किसी भी सम्मान-समारोह-मंच के लायक सर्वथा योग्य हो चुका था। आखिर गौरवबोध से गौरवान्वित होने का मतलब भी यही है कि सिर ऊँचा हो और इस वजह से तन्यता को प्राप्त गर्दन माल्यार्पण से सुशोभित हो। वह तो फांसी है जिससे बचने के लिए गर्दन न रहे तो ठीक है। अब मैं इस जुगत में रहने लगा कि मेरे काम के लिए मेरा सम्मान किसी मंच पर समारोह पूर्वक होना ही चाहिए।

        आखिर में, मैंने अपनी बलवती होती सम्मानाकंक्षा अपने एक परिचित मुँहलगे के समक्ष जाहिर कर ही दिया,

      "आजकल अच्छे कामों की कोई पूँछ नहीं..ऐसे कामों की तो कहीं चर्चा ही नहीं होती!”  

     खैर, मेरे हित-चिंतकनुमा उन मुँहलगे ने मेरी सम्मानाकंक्षा का उत्साहवर्धन करते हुए समर्थन किया

       “बात है, तो बात दूर तलक जानी चाहिए..आखिर ऊपरवाले भी तो कुछ समझें!"

      यहाँ पर उनने “ऊपरवाले” शब्द का ऐसे उल्लेख किया जैसे यह “ऊपरवाला” लेखक का कोई हितचिन्तकनुमा प्रकाशक हो! खैर, बात आगे बढ़ी और मेरे लिए सम्मान-मंच के प्रबंधन की जिम्मेदारी मेरे उन मुँहलगे परिचित ने संभाल ली।

         वैसे तो, किसी सम्मान-मंच से घोषित रूप से सम्मानित होने के अपने खतरे भी होते हैं, क्योंकि सम्मानित हुए व्यक्ति की बाद में टाँग खिंचाई शुरू हो जाती है! इसीलिए मेरा मानना है कि खूब जी कड़ा करके सम्मानित होने के लिए सम्मान-मंच पर जाना चाहिए और सम्मानोपरांत की सभी अच्छी या खराब परिस्थितियों के लिए योग्य हो लेना चाहिए, तभी सम्मान धारण करने में गनीमत है। अन्यथा, मैंने ऐसे तमाम सम्मानधारकों को फ्रस्ट्रेशन में यह सोचते हुए देखा है

     "बेकार में सम्मानित हुए इससे अच्छा तो अ-सम्मान की ही अवस्था थी।"

    फिर भी, अपनी कुर्सी के बल पर उसके परिक्षेत्र में आल-इन-आल टाइप के लोगों को सम्मानित हो लेने में कोई समस्या नहीं होती क्योंकि इनके लिए सम्मानित हो लेना रोजमर्रा का काम होता है। ये ऊँची कुर्सियों पर बैठने वाले लोग होते हैं, जो हर जगह खपने और हर चीज को खपाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। सम्मान इनके लिए बाईप्राडक्ट की तरह होता है, जिसका ये बखूबी इस्तेमाल भी करना जानते हैं।

         आखिर एक दिन मेरे वे मुँहलगे अपने साथ एक व्यक्ति को लेकर टपक ही पड़े! वैसे उस व्यक्ति से मैं पहले भी मिल चुका था। मित्र टपके नहीं थे बल्कि उनका आगमन हुआ था। आगमन उनका होता है जिनके आने की हमें प्रतीक्षा रहती है। खैर, प्रतीक्षा तो मैं कर ही रहा था क्योंकि, मेरे लिए एक अदद सम्मान-मंच के जुगाड़ की जो बात थी! मेरे उन मुँहलगे परिचित ने साथ वाले का परिचय देते हुए कहा

      “ये महाशय, सम्मान-समारोह आयोजित कर सम्मानजनक काम करने वाले को सम्मानित करने का काम करते हैं, इस तरह के काम के लिए इनकी स्वयंसेवी संस्था ‘जन-जागृति’ सरकार द्वारा पुरस्कृत होकर सम्मानित भी हो चुकी है…आपका सम्मान-समारोह आयोजित करा लेने के बाद इनकी संस्था के जनजागरण संबंधी कार्यक्रम का वार्षिक लक्ष्य भी पूरा हो जाएगा .!”

         इसके बाद मेरे उन मित्र ने आगे कहा,

      “ऐसा है, इस सम्मान-समारोह के आयोजन से लगे हाथ दो काम होगा, एक  तो आप सम्मानित होंगे और दूसरे इनकी संस्था का टारगेट भी पूरा हो जाएगा..और हाँ..सम्मान-समारोह का सारा खर्च यही उठाएंगे...बस आपको उस समारोहित-जनजागरण कार्य का एक प्रमाण-पत्र भर इस्यू करना होगा।”

       परिचित की इस मुँहलगई पर मैं अपने नेत्र बंद कर विचार-निमग्न हो “प्रमाण-पत्र भर इस्यू करने” तथा अपने “सम्मानित होने” के बीच के तुलनात्मक भारीपने को हिये-तराजू पर रखकर तौलने लगा था। अाकस्मात् बेचैनी में मेरी आँखें खुली और सीधे मित्र जी के चेहरे पर फोकस्ड हुई, सकपकाते हुए से उन्होंने साथ आए व्यक्ति की ओर देखकर कहा -

      “देखिए!  मुझे तो मंच पर ही आपके सम्मान में ज्यादा लाभ नजर आ रहा है, इससे आपकी पॉपुलैरिटी मैं इज़ाफा भी होगा और जिसका लाभ भविष्य में किसी राजनीतिक दल से टिकट मिलने पर मिल सकता है...चुनाव भी जीत सकते हैं..! बाकी मंच की साज-सज्जा और अन्य बातों पर इस बेचारे का खर्च भी तो होगा, ऐसे में प्रमाण-पत्र इस्यू करना कोई घाटे का  सौदा नहीं है...बाकी, यदि कोई बात होगी तो कहीं से “मीट आउट” कर लिया जाएगा।”

        मित्र टाइप मुँहलगे की इस बात पर उनके साथ आया व्यक्ति भी सहमति के अन्दाज में अपना सिर जोरदार तरीके से हिलाने लगा था! उसे इस तरह मुंडी हिलाते देख मैंने मन ही मन सोचा -

     “पता नहीं...यह बेवकूफ ‘मीट आउट’ का मतलब समझ भी रहा है या नहीं..।”

       खैर, अगले दिन “जनजागृति” संस्था द्वारा किए जाने वाले जनजागरण कार्यक्रम की प्रस्ताव संबंधी पत्रावली मेरे समक्ष अनुमोदनार्थ प्रस्तुत की गई। मैंने पत्रावली का त्वरित निस्तारण करते हुए, इस पर अपनी सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दिया और जनजागरण कार्यक्रम के तत्काल सफल आयोजन हेतु त्वरित ढंग से कार्यवाही करते हुए इसका अविलंब आयोजन सुनिश्चित कराने के निर्देश सबंधी पत्रालेख पर भी हस्ताक्षर कर दिए।

         पत्रालेख पर हस्ताक्षर कर लेने के बाद अपनी तनी हुई गर्दन पर ध्यान देते हुए सोचा -

       “अब सब कुछ त्वरित-त्वरित ही होगा..! लेकिन..देखे-सुने से तो अब तक ‘जगत गति टारे नहिं टरी’ टाइप के चिरकालिक सत्य की ही प्रतीति हुई है...फिर आखिर, किस बेवकूफ ने किस उद्देश्य से तत्काल, अविलंब, सुनिश्चित करें, जैसे शब्दों को गढा़ होगा.?”

    खैर, ऐसे शब्दों को शासकीय धत्कर्मों में सहयोगात्मक शब्द मानकर इन शब्दों के गढ़ने वाले को मैंने मन ही मन धन्यवाद भी ज्ञापित किया और इन शब्दों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।

       जो भी हो, कुछ दिनों बाद मेरे लिए सम्मान-समारोह के आयोजन की घड़ी आ ही गई! उस दिन सधे हुए कदमों से गरिमामयी अंदाज में, मैं उस सम्मान-समारोह-मंच पर पहुँचा था। मंच की साज-सज्जा देखकर सोचा…

     “लगे हाथ इस सम्मान-मंच को सजाने वाले को भी सम्मानित कर देना चाहिए।”

      “वाकई, यह खूबसूरत मंच मेरे लिए ही सजा था!” मेरे लिए यह गौरवबोध का विषय था, इस अहसास ने मेरी गार्दनिक तन्यता की रही-सही कसर भी पूरी कर दी।

       मंच की सीढ़ियों पर बूट पड़ते ही मेरी निगाह मंच की कुर्सियों के पीछे लगे बड़े से फ्लैक्सी पर अटक गई, जिस पर “जनजागृति” संस्था के “जनजागरण अभियान” में मेरे “सहयोग” के लिए इस संस्था के “तत्वाधान में” मेरे “सम्मान-समारोह” की बात लिखी गई थी...इसे पढ़ते ही मन खट्टा हो गया और सोचा -

      “अभी इस फ्लैक्सी को नुचवा कर फेंकवा दें! मतलब, मेरे “अभियान” को इस संस्था वाले ने हाईजैक कर अपना अभियान बना लिया और बदले में मुझे “सहयोग” का झुनझुना थमा दिया..! वाह भाई, मेरे लिए सम्मान-मंच मुहैया कराने की इतनी बड़ी कीमत वसूलेंगे ये संस्था वाले!!”

      यही सोचते-साचते मुस्कुराहटों के पीछे अपना गुस्सा छिपाने लग गया था। इधर मंच के कोने में दुबके खड़े मेरे तथाकथित मित्र महोदय मेरे अन्दर के भाव को न जाने कैसे मेरी किस भंगिमा से ताड़ गए और कुरसी पर विराजते ही मेरे पास आकर मेरे कान में बुदबुदाने लगे थे -

        “देखिए आप परेशान न हों, चीजों को मैंने मीट आउट करा लिया है, अब थोड़ी-बहुत छूट तो देनी ही होगी, चीजें बैलेंस्ड हो जायेंगी!”

         खैर, मुँहलगई जैसी इस बुदबुदाहट को मैंने सीरियसली नहीं लिया, लेकिन मन ही मन तय किया कि -

       “बेटा! इस कार्यक्रम के बाद देखता हूँ...तुम्हारा बैलेंस्ड..! अन्यथा, तुमको हांडी में संजोए रख धूप दिखाते रहने से क्या फायदा!!”

       मन में इस तरह का विनिश्चय करते ही मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई। मुझे इस तरह मुस्कुराते देख, मेरे विनिश्चय से अनजान कई लोग मुस्कुरा उठे थे, लेकिन इन मुस्कुराहटों के पीछे उन सब के अपने-अपने विनिश्चय भी रहे होंगे, जिससे मैं भी अनजान था।

          इधर, नजर फिराया तो कुर्सियों पर लकदक करते झकास सफेदी में बैठे सज्जन टाइप के दो-चार लोग भी दिखे, इन्हें देख मुझे इस बात की प्रतीति हुई कि सज्जनता सफेदी में निहित होती है। शहर में किसी भी सरकारी टाइप के सोशल ऐक्टिविटी मे सफेद परिधान में ये भाग लेते हुए देखे जा सकते हैं। इनके बिना ऐसा कोई भी कार्यक्रम या समारोह अधूरा माना जा सकता है। हाँ, इनसे मेरी नजरें मिली, नजरें मिलते ही परस्पर मुस्कुराहटों में हम खो गए। मने मुस्कुराहटों द्वारा हम परस्पर अभिवादित भी हो लिए थे। वैसे एक दूसरे को देखकर मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान भी एक प्रकार का अभिवादन ही होता है। खैर, अब तक विनिश्चय से उपजी अपनी मुस्कुराहट को मैंने अभिवादन-जनित मुस्कुराहट में रूपान्तरित कर लिया था। आखिर, मेरा सम्मान-समारोह था…इस बात का खयाल रखते हुए हमें अपनी भावभंगिमा निर्धारित करनी थी..!

         अब मंच पर मेरे अगल-बगल की समानान्तर कुर्सियों पर स्वयंसेवी संस्था के संयोजक के अलावा मेरे कुछ इने-गिने-चुने सहकर्मी भी विराजमान थे..एक-एक कर मैं इन पर कनखियों से निगाह फिराता जा रहा था..संस्था के संचालक को देखकर “प्रमाण-पत्र इस्यू” करने के साथ ही “मीट आउट” की बात याद आई..इन्हें बाद में देखेंगे...सोचकर दूसरी ओर निगाह फिराई…अलबत्ता, साथ में बैठे सहकर्मी मेरे सम्मान में बढ़ोतरी करते प्रतीत हो रहे थे..इनपर निगाह फेर कर सोचा

       “चलो..मेरे सम्मान के बहाने ये भी थोड़ा-बहुत सम्मानित हो लेंगे.. इसमें कोई हर्ज नहीं..।”

       खैर..कुछ ही क्षणों में मेरे स्वागत का दौर शुरू होने वाला था।

       अब मेरा माल्यार्पण शुरू हो गया था...एक-एक कर लोग अपनी-अपनी पुष्प-मालाएँ मेरे गर्दनार्पित करते जाते और बीच-बीच में गर्दन से उतारी गई वही पुष्प-माला पुनः मेरी गर्दन पर आ सवार हो जाती। यह चक्र कई बार चला। इस बीच मुझे यह अनुभव हुआ कि जैसे, लोग मिलकर मेरी गार्दनिक तन्यता का इलाज कर रहे हैं। लगभग सभी से माला पहनवा लेने के बाद मैं वापस अपनी कुर्सी पर विराजा।

       मंच के सामने सैकड़ों कुर्सियाँ लगी हुई थी। लगभग आधी कुर्सियों पर स्कूली बच्चे और शेष पर मेरे कुर्सी के परिक्षेत्र में आनेवाले मेरे मातहत टाइप के लोग बैठे थे। आगे की गद्दीदार कुर्सियों पर पत्रकार और कुछ वीआईपी जैसे लोग बैठे थे, इनमें से कुछ हमें देखकर मुस्कुराए और कुछ को हम देखकर मुस्कुराए या फिर मुस्कुराहटों के प्रतिउत्तर में हम मुस्कुराते गए। हमारी ये मुस्कुराहटें उपकार और उपकृत जैसी भावना से परिपूरित पवित्र मूक-हास्य टाइप की थी।

        अचानक मुझे, मेरे लिए आयोजित सम्मान-समारोह की यह व्यवस्था अलोकतांत्रिकनुमा लगी, क्योंकि इस समारोह में मुझे लोक-भागीदारी के दर्शन नहीं हो रहे थे। खैर, मंचीय-सम्मान-समारोह में लोकतांत्रिकता जैसे तत्व की गुंजाइश नामिनल ही होती है क्योंकि, अलोकतांत्रिकता मंचीय-सम्मानार्जन की पूर्वपीठिका होती है। सम्मान-समारोह में लोक-भागीदारी का अभाव देख मुझे अपने मुँहलगे परिचित और स्वयंसेवी संस्था के संचालक पर कोफ्त हुई और इनपर मेरा मन भड़ासित टाइप का होने लगा था और मैंने सोचा -

       “ये संस्था वाले ही क्यों, मेरी कुर्सीय परिधि में आनेवाले लोग भी तो मेरे सामने पलक-पाँवड़े बिछाये रहते हैं, बस मेरे कहने भर की देर होती और सजा-सजाया सम्मान-मंच जनभागीदारी के साथ मुझे उपलब्ध हो जाता...लेकिन...ये हमारे ही आदमी से हमें सम्मानित कराने निकल पड़े हैं! खैर..अब इस पर क्या किया जा सकता है...जब मंच पर चढ़ सम्मानित होने का शौक चर्राया हो, फिर तो सम्मान भी ऐसई होता है..!!”

         मित्रनुमा मुँहलगे के प्रति अब मेरी भृकुटी थोड़ी टेढ़ी हो चुकी थी..मैं उनकी मुँहलगई पर पश्चाताप करने लगा था। उनपर मैं भृकुटी थोड़ी और टेढ़ी करता कि उनकी “मीटआउट” बात के खयाल के साथ ही लड़कियों द्वारा कोमल स्वर में गाया जा रहा मेरा स्वागत-गान कानों में पड़ा..मित्र थोड़ा बच गए..! लड़कियों के इस सामूहिक स्वागत-गान में वह इंस्ट्रक्टर मुझे अजीब से मेकअप में लगी...पता नहीं यह मेकअप किस बात पर और क्योंकर था...खैर, यहाँ से ध्यान हटाकर मैंने अपनी तन्द्रा को अपने सम्मान पर फोकस कर लिया। इन बच्चियों ने अपने स्वागत-गान में मेरे स्वागत की पराकाष्ठा कर दी थी...इस स्वागत-गान में पता नहीं किन-किन महानताओं से मैं विभूषित होता रहा...अब मैं अपने पर विश्वास नहीं कर पा रहा था कि, मैं वही हूँ जो मैं हूँ..!!

        माल्यार्पण और स्वागत-गान वगैरह की औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी थी...अब वक्ताओं की बारी थी...सामने कुर्सियों पर बैठे लोगों पर धूप का भी प्रकोप साफ दिखाई दे रहा था। कड़ी धूप में चेहरे पर चुहचुहा आए पसीने को पोंछते हुए भी, ये मेरे सम्मान-समारोह में भागीदारी निभाकर धन्य से हो रहे थे। यही नहीं, जैसे चुनाव जीते किसी नेता के पीछे उनके ठेकेदार टाइप के फालोवर घूमते हैं, वैसे ही ये मुझे सम्मानदान देते हुए अपने ऊपर मेरी नजरों के इनायत होने की कामना करते जान पड़े। लेकिन, एक बात और है, मुझे, एक महान लेखक के शब्दों में, मेरा यह सम्मान “जिनके पैरों तले गर्दन दबी हो, उन पैरों को सहलाना ही श्रेयस्कर है” टाइप का प्रतीत हो रहा था ! शायद लोगों के वक्तव्यों द्वारा मैं इसीलिए सहलाया जा रहा था।

        पहले संस्था के ही पदाधिकारी को बोलने के लिए पुकारा गया..पदाधिकारी महोदय माइक के पास पहुँच कर भरपूर निगाहों से मुझे देखे..तत्पश्चात वक्तव्य देना प्रारम्भ किए..

        “मैंने आज तक इनकी कभी चापलूसी नहीं की..लेकिन आज इनके इस सम्मान-समारोह पर अपने को रोक नहीं पा रहा…” यह वाक्य पूरा करते-करते वक्ता नें मेरे ऊपर फिर निगाह डाली लेकिन उनसे निगाह मिलाने से मैं अब हिचक रहा था और इन्हें जियादा एडवांटेज देने के मूड में नहीं था। क्योंकि आगे इनसे सम्मान-समारोह का प्रमाण-पत्र इस्यू करने से लेकर “मीटआउट” होने तक का हिसाब होना बाकी था। जाते-जाते इनने मेरी शान में यह कसीदा पढ़ा -

        जब तक बिके न थे, कोई पूँछा था न हमें,
        जब से खरीदा आपने अनमोल हो गए।

      खूब तालियाँ बजी..लेकिन मैं ताली बजाना भूल दिमाग को, कौन किसको खरीदा..कौन बिका...कौन किसके लिए अनमोल हुआ, जैसी बातों पर चकरघिन्नी की तरह नचाने लगा था। इसके बाद अन्य वक्ताओं ने भी मेरीे शान में खूब कसीदे पढ़े...मैं कसीदों के आधार पर अपने लिए सम्मान की मात्रा का भी आकलन करता जा रहा था।

       इस प्रकार मेरे सम्मान समारोह का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ अपनी प्रशंसा के कसीदे दर कसीदे सुन एक अज्ञानी की भाँति आत्मविभोर हो चुका था। अब मैं भी एक सम्मानित शख्स था।

       अंत में मेरा भी भाषण हुआ। अपने भाषण में मैंने कसीदों की कीमत अदा की और एक ज्ञानी की भाँति यहाँ उपस्थित अपने मातहतों को अपने तरकश के तीरनुमा तत्काल, अविलंब, त्वरित ढंग से कार्य सुनिश्चित करने-कराने वाले शब्दों को, सम्मान के पीछे का छुपा हुआ एजेंडा बताते हुए जनहित में इन शब्दों को उचित ठहराया। एक तरह से यह इस बात की चेतावनी थी कि मेरे सम्मान का एजेंडा ऐसे ही चलता रहेगा। अगले दिन मेरे सम्मान-समारोह की खबरें अखबारों में छायी हुई थी, इन खबरों को पढ़कर अपने सम्मान की यह पूरी कहानी आपको बताने के लिए मैं प्रेरित हुआ।
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