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Vikram Singh
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Vikram Singh

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नया चित्र तू बना चितेरे शून्य श्याम नव अंकित करना  अणु विहीन आलोकित  करना सृष्टि और सृष्टा दोने के,भेद मिटाना आज चितेरे नया चित्र तू बना चितेरे अहम् और त्वम् नहीं दिखाना पथिक  पंथ दोनों  बन  जाना जीवन मरण संधि रेखा ही...
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झील का निर्जन किनारा मौन   होकर    बैठ   जायें तपिस मन की कुछ बुझायें  एक क्षण ऐसा लगा क्यूँ,अब यही मेरा सहारा झील का निर्जन किनारा टूटती हर साँस  ले  मै                                              मे कुछ अधूरी आश ...
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मौन हो कितने मुखर हम हो गए
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मौन हो कितने मुखर हम हो गए शब्द मेरे भाव तेरे हो गए इस अनोखे मेल में हम खो गए नव रचित इस गीत में होकर मगन,प्राण संज्ञा शून्य करके सो गए मौन

नया चित्र तू बना चितेरे
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नया चित्र तू बना चितेरे शून्य श्याम नव अंकित करना अणु विहीन आलोकित करना सृष्टि और सृष्टा दोने के,भेद मिटाना आज चितेरे नया चित्र तू बना चितेर

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आप इतना यहाँ पर न इतराइये
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आप इतना यहाँ पर न इतराइये चंद सासों की राहें सभल जाइये अज़नबी मान करके कहाँ जा रहे आपको भी यहाँ हमसफर चाहिये जख्म लेकर यहाँ मै तो जीता रहा ज

स्वागत नूतन वर्ष तुम्हारा
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स्वागत नूतन वर्ष तुम्हारा नये रूप में तुम भी आये स्वप्न सुनहरे कितने लाये समय चक्र के गलियारे में,ओंस-कणों सा साथ हमारा स्वागत नूतन वर्ष तुम

सूनापन कितना खलता है
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सूनापन कितना खलता है आँखों से दर्द टपकता है होंठों से हँसना पड़ता है दोनों की बाहें थाम यहाँ,जीवन भर चलना पड़ता है सूनापन कितना खलता है मजधार

आ,साथी नव दीप जलाएँ
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आ,साथी नव दीप जलाएँ दूर घ्रणा का करें अँधेरा प्रेम राग का रहे बसेरा युग-युग की वेदना मिटा दे,ऎसी कोई राह बनाएँ आ,साथी नव दीप जलाएँ देवगगन मे

वर्षा-बूँदों की . . . . . . . . .
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वर्षा-बूँदों की ये लोरी पावस रातों की ये छोरी तन्हाँ-तन्हाँ कोरी-कोरी मेरे मन आँगन बरस-बरस,क्यूँ छेड़ रही श्यामल गोरी वर्षा-बूँदों की ये लोर

साथी याद तुम्हारी आये.. . . . ...
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साथी याद तुम्हारी आये सिंदूरी संध्या जब आये ले मुझको अतीत में जाये रुक सूनी राहों में तेरा ,वह बतियाना भुला न पाये साथी याद तुम्हारी आये मधु

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न दैन्यं न पलायनम्: रघुबीरजी की कथा
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रघुबीरजी अपनी पत्नी के साथ अपने घर की बॉलकनी में बैठकर चाय की चुस्कियों का आनन्द ले रहे हैं, घर सोसाइटी की तीसरी मंजिल में है और रघुबीरजी है

Wish you merry merry ''CHRISTMAS''
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वह फिर भी ..................
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वह फिर भी अबला कहलाती रचना अविराम जो करती जीवन पथ आलोकित करती रख नयनों में नीर ,रक्त से अपने,जग को जन है देती निर्बल को जो बल है देती ममता द

वह फिर भी अबला कहलाती......
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वह फिर भी अबला कहलाती रचना अविराम जो करती जीवन पथ आलोकित करती रख नयनों में नीर ,रक्त से अपने,जग को जन है देती वह फिर भी अबला कहलाती निर्बल क

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