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NotNul
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#NotNul #पढना_ही_ज़िंदगी_है #मीडिया

आयटम गीत की जरूरत और प्रासंगिकता पर नियमित सवाल उठते हैं। टीवी के पैनल डिस्कशन, पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीय व लेख और आम बहस-मुबाहिसों में ज्यादातर लोग इसकी निंदा करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि हिंदी फिल्मों ने जिस प्रकार से उत्पाद का रूप ले लिया है, उसमें दर्शकों को रिझाने और सिनेमाघरों में लाने के लिए आयटम गीत जैसे मसाले और पैकेजिंग की जरूरतें बढ़ गई हैं। निर्माताओं ने इसे फिल्म के प्रचार और आकर्षण का सटीक तत्व मान लिया है। दरअसल, आयटम गीत किसी भी फिल्म की दर्शकता बढ़ाने का आसान टूल है। कुछ दशकों पहले तक ज्यादातर फिल्मों में हेलन का डांस आयटम गीत की तरह ही आता था। फर्क इतना था कि उन डांस नंबर को फिल्म की कहानी का हिस्सा बना कर पेश किया जाता था। अब न तो वैसे लेखक हैं और न निर्देशकों के पास इतनी सृजनात्मक फुर्सत है। अब यह सिर्फ मिठाइयों के ऊपर चिपके वरक की तरह फिल्म की चमक बढ़ा देता है।

पढ़िए अजय ब्रह्मसत्‍मज की किताब '...चलेगी क्‍या?' में चिंतनीय है आयटम गीतों की लोकप्रियता पर लेख
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=D4OMJdnc

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#NotNul #पढना_ही_ज़िंदगी_है #हंस #जुलाई_अंक #पत्रिका

परछाइयों से फूल बनाता रहा हूं मैं.
फिर उनको शायरी में सजाता रहा हूं मैं.
इससे नहीं ग़रज़ कि मज़ा किसको क्या मिला
कूचे-गली में शोर मचाता रहा हूं मैं.
नगमें लिखे गए जो किसी के फ़िराक़ में
वो सब शब-ए-विसाल सुनाता रहा हूं मैं.
वो मुब्तला-ए-इश्क़ हुआ मेरा किसलिए
अपने तमाम ऐब गिनाता रहा हूं मैं.
जब दिल पे सोज़-ए-इश्क़ की दीवार आ गिरी
दिवारें कितनी घर में उठाता रहा हूं मैं.
आया था मेरे घर वो बड़े एहतमाम से
क्या देखता कि देख के जाता रहा हूं मैं.
उससे बिछड़ के रंग-ए-सुख़न क्या निखर गया
उससे बिछड़ के रंग जमाता रहा हूं मैं.

पढ़िए नसीम अजमल की ग़ज़लें पाकिस्तानी शायर जाॅन एलिया के नाम 'हंस' के इस अंक में
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=KfYSJbda

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NotNul #पढना_ही_ज़िंदगी_है #पाखी #जुलाई_अंक #पत्रिका

मैं इतिहास में ज्यादा रुचि नहीं ले पाता हूँ। क्योंकि आमतौर पर लोगों में इतिहास से सीखने के बदले उसका उत्सव मनाने का भाव रहता है। इतिहास सामाजिक जख़्मों को भवनों और घटनाओं के साथ ताजा रखता है। यादों की दुनिया में अच्छी बातें भी होती हैं, लेकिन उनकी यादें कम और दुःखों की यादें ज्यादा रहती हैं। आप चम्पारण को ही लें। ज्यादातर जिन बातों को याद किया जा रहा है, उसमें अँग्रेजों के द्वारा दिये गये कष्ट और सरकार के द्वारा उस ऐतिहासिक जगह की उपेक्षा है। अब सवाल है कि जिस देश का इतिहास पाँच हजार वर्षों का हो वहाँ यदि इन ऐतिहासिक धरोहरों को सँभालने में ही लगा जाए तो सरकार के पास धन की कमी हो जाएगी। सारी जमीन इसी में चली जाएगी। मनुष्य का असली धरोहर विचार है, जमीन या भवन नहीं। इसलिए चम्पारण भी एक जगह से ज्यादा एक विचार है और एक वैचारिक प्रयोग है।
चम्पारण का यह प्रयोग आज ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसलिए है कि आज किसान आत्महत्या कर रहा है, नील की खेती के कारण नहीं बल्कि कपास की खेती के कारण।

पढ़िए मणीन्द्र नाथ ठाकुर का लेख 'चम्पारण की विचार यात्रा' नीचे दिए लिंक से
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=ExQTA7vl

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NotNul #पढना_ही_ज़िंदगी_है #पत्रिका #लहक

कोई हिटलर अगर हमारे मुल्क में जन्मे तो
सनक में अपनी, लोगों का सुख - चैन चुरा ले तो।
अच्छे दिन आयेंगे, मीठे - मीठे जुमलों में
बिन पानी का बादल कोई हवा में गरजे तो ।
मजलूमों के चिथड़ों पर भी नजर गडाए हो
खुद परिधान रेशमी पल - पल बदल के निकले तो ।

पढ़िए 'डी एम मिश्र' की गजलें लहक के इस अंक में
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=DW7MLXhj

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NotNul #पढना ही ज़िंदगी है #पाखी #जुलाई_अंक #पत्रिका

किसी ऐसे जंगली देश में रहना असंभव है जहां जनता की राजनीतिक कारणों से हत्या कर दी जाती हो।
-गाबरेल गारसिया मारखेज!
अंध्विश्वास और वास्तविकता!
यह एक नई और अनदेखी कल्पना थी कि मैं इन खंडरात में उन आवाजों को सुन सकता हूं जो सदियों की कैद के बाद बाहर आने को बेताब हैं। पुरातात्विक की खुदाई के दौरान जीवन में पेश आने वाली ऐसी घटनाओं की कोई कमी नहीं थी, जहां अचानक डराने वाले एहसास ने मुझे अपनी जकड़ में ले लिया हो। इस मामले में जिज्ञासा और नई खोज से निकलने वाले अजूबों का विचार न हो तो यह रहस्यमयी आवाजें आपको बीमार कर सकती हैं। मेरे युवा भिक्षु दोस्त का मानना था कि आवाज एक तरंग है। समय के किसी भी हिस्से में आवाजें कभी गुम नहीं होतीं, बल्कि धीरे - धीरे वीराने और खंडरात में अपनी जगह बना लेती हैं।’

पढ़िए मुशर्रफ आलम जौकी की कहानी 'प्राचीन आवाजों की कटिंग पेस्टिंग' नीचे दिए लिंक से
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=7gCFsrzV

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#पढ़ना_ही_जिंदगी_है #NotNul #Story #कहानी

शारदाबेन ने मुचड़ी धोती टाँगों के बीच से निकाली और उठ कर खड़ी हो गयी । नंगे गीले बच्चे को फटे कपड़े से लपेटा और तराज़ू की तरफ़ लपकी । आजकल यह उसका रोज़ का नियम था । बच्चा जनवाने पर उसे नहलाना तो खै़र ज़रूरी ठहरा, पर उसके बाद, माँ को उसका मुँह दिखलाने से पहले, वह तराज़ू पर, उसका तौल करने दौड़ती थी । मालिकों की नज़र में बच्चे जनवाने का महत्व कम, तराज़ू में तौलने का ज़्यादा था । सौ रुपया महीना की नौकरी थी उसकी, कोई मज़ाक नहीं ।
आज कुछ अलग उछाह था तराज़ू तक की लपक में । गोद में पड़ी छोरी, उसके जने और बालकों से फ़र्क़ थी । बहुत दिनों बाद, बच्चा उठाने पर लगा था, हाँ, कुछ है गोद में, चिथड़ों की पोटली के अलावा । एक दबाव महसूस हुआ था बाँहों में । वह तो भूल ही चली थी नन्ही हड्‌डियों के ढाँचे पर चढ़े माँस का वज़न क्या होता है ।

पढ़िए मृदुला गर्ग की कहानी 'तीन किलो की छोरी' नीचे दिए लिंक से
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=1RqEkwIj

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#पढ़ना_ही_जिंदगी_है #NotNul #लेख #article

हिन्दी साहित्य इतने किसिम-किसिम का है। भिन्न लोगों द्वारा रचा जा रहा है। भिन्न आर्थिक स्तर, लिंग भेद, भिन्न सामाजिक स्तर, भिन्न प्रादेशिकताके लोगों के द्वारा रचा जा रहा है। देश के भीतर और दुनिया के विभिन्न देशों में सृजित हो रहा है। ये सारा साहित्य एक जैसा नहीं हो सकता है और न ही इस सारे साहित्य को एक प्रकार की आलोचना की लाठी से हाँका जा सकता है। देश के भीतर रहे जा रहे हिन्दी साहित्य के लिए मार्क्सवादी विचारधारा एक बड़ा मुद्दा हो सकता है मगर इंग्लैंड या अमेरिका या कई अन्य देशों के रचनाकारों के लिए इस विचारधारा का वही मूल्य नहीं है। उनके लिए विचारधारा से अधिक अस्मिता और बिलॉन्गिंगनेस महत्वपूर्ण है। एक हाउस वाइफ़ और एक वर्किंग वूमन का लेखन एक जैसा नहीं हो सकता है। एक उच्च मध्यम वर्ग के सम्पन्न लेखक और निम्न मध्यम वर्ग के लेखक के अनुभव भिन्न होते हैं। एक ग्रामीण परिवेश के रचनाकार की दृष्टि में जो चीजें समाहित होती हैं शहरी लेखक की दृष्टि शायद ही उन बातों पर पड़े।

पढ़िए डॉ. विजय शर्मा का लेख 'हिन्दी आलोचना का संकुचन और चुनौतियाँ' नीचे दिए लिंक से
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=fwaWRsWX

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#पढ़ना_ही_जिंदगी_है #NotNul

पहलवान को लगता है की इतनी पढाई लिखे करने और देश दुनिया घूमने के बाद भी गाँव का आदमी सामूहिक हित के काम के लिए एकमत होने के मुद्दे पर भी जाति - पाँति की भवन से उबर नहीं पता इसी तरह की बात उन्होंने एक बार अख़बार में पड़ी थी की जिनकी नीतियों और षडयन्त्रों के चलते किसान का जीना दूभर हो रहा है,उनसे लड़ना तो दूर, किसान को उनकी पहचान ही नहीं है । हमारी सरकार की नीतियाँ तो हवा हवाई हैं ही, वे बहार की कंपनियों के साथ भी ऐसी ऐसी एग्रीमेंट कर रही है जो सौ साल पहले गिरमिटिया मजदूरु के साथ हुए एग्रीमेंट से भी ज्यादा ख़तरनाक हैं और गाँव के लोग झबिया में बंद उन मुर्गो की तरह है जो बेचने के लिए सहर ले जाये जा रहे हैं । रत होते ही इन्हे किसिस न किसी मांसाहारी के पेट में समा जाना है । लेकिन इन्हे अपनी जान पर मंडराते इस खतरे का रंच मात्र एहसास नहीं है । छुरी तेज़ करके इन्तज़ार में बैठे कसाई के बारे में इन्होने कभी सुना ही नहीं है । झबिया के अंदर वर्णवाद और नस्लवाद का घमासान चल । लाल सुनहरे पंख वाले और लम्बी कलँगी वाले या उन्नत नेसल के मुर्गे, देसी, मटमैले या छोटी कलँगी के मुर्गो को हेय दृष्टि से देखते हुए उन पर अपनी शक्ति और श्रेस्ठता का रौब झाड़ रहे हैं । उनको लतिया रहे हैं । उनके लेखे झबिया के अंदर विजय मिल गयी तो समझो विश्व विजय कर लिया । एकदम अखबार ने । पहलवान सोचते हैं - जातिवादी अलगाव न होता तो कितनी मजबूती आ जाती गाँव में ! फुल्लड़ जैसी मजबूती ।

पढ़िए शिवमूर्ति की लम्बी कहानी 'आखिरी छलांग' नीचे दिए लिंक से
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=nTb03PdR9

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#पढ़ना_ही_जिंदगी_है #NotNul #lekh #लेख

‘मेरा कमरा’ शीर्षक ही मुझे असमंजस में डाल देता है, क्योकि मेरे साथ कभी ऐसा कुछ सम्भव नहीं हुआ, जिसे मैं अपना कमरा कह सकूँ। मेरा जन्म हदरोई ज़िले के एक छोटे-से गाँव छतनखेरा में हुआ जो मुश्किल से पन्द्रह घरों का गाँव है। ज़्यादातर परिवार खेती-किसानी और पशु-पालन कर गुज़र-बसर करते हैं। छोटी-छोटी ज़रूरत की चीज़ों के लिए लोग सात-आठ मील दूर कस्बे तक पैदल ही जाते हैं। कस्बे से गाँव को जोड़ने वाला गलियारा और पगडंडी है। बिजली तो गाँव में आज तक नहीं पहुँच पायी है।

संयुक्त परिवार होने से हम सभी भाई एक साथ घर से लगी चैपाल में सोते थे। मंझले भाई लखनऊ जाने पर कुछ पत्र-पत्रिकाएँ अपने पढ़ने के लिए लाते थे। कुछ किताबें थीं जो कपड़े में लिपटी हुई अलमारी में रखी थीं। जब-तब ‘स्वतंत्र भारत’ अखबार भी दिख जाता। सुबह वह खबरें फिलिप्स रेडियो से नियमित सुनते थे। उस समय हम बहुत छोटे थे। भाई को बुखार आ गया और वह बीस-बाइस दिन तक घटता-बढ़ता रहा। फिर एक दिन आधी रात में उनका देहान्त हो गया। माँ-बहिन रोती-कलपती थीं अपने एकान्त में, पर हमें और दूसरे भाई को देखकर चुप हो जातीं।

पढ़िए मजीद अहमद का लेख 'मेरा कमरा' नीचे दिए लिंक से
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=BoKeIAJZ

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#पढ़ना_ही_जिंदगी_है #NotNul #सबलोग #Magazine #पत्रिका

मनुष्य का असली धरोहर विचार है, जमीन या भवन नहीं। इसलिए चंपारण भी एक जगह से ज्यादा एक विचार है और एक वैचारिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों का या जनता का?

पढ़िए मणीन्द्र नाथ ठाकुर का लेख 'चंपारण की विचार यात्रा' सबलोग के इस अंक में नीचे दिए लिंक से
http://Notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=zo0uh7RF
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