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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #विमर्श #article

अमरकांत का यह उपन्यास सन 1942 के आंदोलन में पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की घटनाओं पर केंद्रित है जहाँ आम जनता ने इस दौरान लगभग एक हफ़्ते तक अंग्रेजी शासन को मिटाकर अपना राज स्थापित किया था लेकिन आज़ादी के बाद की भी घटनाओं को भी शामिल करता है ताकि आज़ादी के लिए लड़ने वाली जनता तथा कांग्रेस पार्टी के रिश्तों के सामने आज़ादी के बाद सत्तानशीन कांग्रेस के साथ जनता के रिश्तों को रखकर इस त्रासदी को समझा जा सके कि आखिर दुनिया के सबसे परिपक्व स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी परिणति क्यों हुई ।

पढ़िए गोपाल प्रधान की किताब 'उपन्यास की शक्ल में उपनिवेशवाद विरोधी-विमर्श'
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=dj8Wa5hb
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_जिंदगी_है #नीलम_कुलश्रेष्‍ठ #नारी_सम्बंध#स्त्री_विमर्श #लेखों

वड़ोदरा के कड़क बाजार के शुरू होते ही मेरी चौकन्नी आँखें कुछ तलाशने लगीं। एक अस्पष्ट-सी छाया मस्तिष्क में अंकित थी जिसे वह ढूँढने निकली थी। साड़ी के सीधे आँचल में लिपटी पतली-छरहरी देह, रंग बादामी, चेहरे के नाक-नक्‍श गुजरात की अन्य लड़कियों की भाँति खूबसूरत, मशीन के नल से तत्परता से पाँच-पाँच पैसे में गिलास में पानी भरते हुए हाथ। बहुत पहले उसकी तरफ पैसे बढ़ाते हुए मैंने उसके व्यक्तित्व के सरल आकर्षण को महसूस किया था। यही आकर्षण था जो मशीन का ठंडा पानी बेचकर उसके चार पैसे कमाने में भी आड़े आ गया।

पढ़िए 'फुटपाथ पर काम करने वाली स्त्रियाँ'
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=thZUFZJ2
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #उपन्यास #चंद्रकान्‍ता

काली-सफेद चिंदियों-जड़े शामियाने-से आसमान में बादलों के कई-कई आकार उभर रहे हैं। धुनकी रूई के पहाड़ों बीच विभिन्न चेहरे बनते-बिगड़ते, क्षण-क्षण में रूपांतरित हो रहे हैं। अभी-अभी पंत के मृगशावक लुका-छिपी खेल रहे थे, अभी किसी अजाने देश आश्रय लेने चले गए। पूर्व की ओर काली चट्टानों के पीछे दो उत्सुक चेहरे चुंबन की मुद्रा में जुड़कर एकाकार हो गए। कम्‍मो को देखते-देखते यह विलीनीकरण विराट वितान से धुल-पुछ गया। गहराते मेघखंड तीतरपंखी बदलियों में छिटकने लगे और बुहारी लगे कोने में पीले फ्रेम में जड़ा चांद बीमार-सी रोशनी फेंकने लगा।
''फॉर यू....फॉर यूऽऽऽ।''

https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=lHkxS2V0
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी है #यकृत #liver #स्कन्द_शुक्ला #biology #science

लेटने के बाद कभी तुमने अपने दाहिने हाथ से दाहिनी ओर की पसलियों पर हाथ फिराया है? आज फिराना। जहाँ हमारी दाहिनी ओर की पसलियाँ नीचे को समाप्त होती हैं और पेट का इलाक़ा शुरू होता है, वहाँ कुदरत ने भी हमारे शरीर में एक तिकोनी चॉकलेट लगायी है। एक ऐसा अंग जिसे तुम्हारे अध्यापकों ने कक्षा में शायद तुम्हें पढ़ाया भी होगा। लाल-भूरे रंग की यह संरचना हमारे शरीर का सबसे बड़ा अन्दरूनी अंग है।
यह यकृत है। जिसे तुम अँगरेज़ी में लिवर और उर्दू में जिगर के नाम से भी पुकार सकते हो। गाढ़े भूरे-लाल-चॉकलेटी रंग का यह अंग हमारे शरीर का सबसे बड़ा भीतरी अंग और सबसे बड़ी ग्रन्थि है। जानते हो ग्रन्थि किसे कहते हैं? वह जो अपने भीतर तमाम ऐसे रसायनों का निर्माण करे और फिर उन्हें आसपास या दूर के अन्य अंगों के लिए बाहर छोड़ दे, ग्रन्थि या ग्लैंड कहलाती है।

पढ़िए 'यकृत : सामान्य अंग-परिचय' डॉ. स्‍कन्‍द की किताब में
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=masvKAxl
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #कहानी

ललमुनिया पहुँच गई है । बिना नागा रोज सुबह बर्तन –भासा करने पहुँच जाती है । एक दो साल छोटी होगी पर मेरे उतरन कपड़े उस पर फिट हो जाते हैं । माँ जब भी आतीं नए कपड़े के साथ कुछ पुराने कपड़े भी ले आतीं । वह खुश हो जाती। उनके लिए मटर के साग तोड़ लाती, भूंजा बनवा लाती । मेरी लिए इमली तोड़ लाती। इमली पेड़ के भूतो से नहीं डरती । उसे पढ़ाना चाहती पर उसका मन नहीं होता । जितनी तेजी से घर के काम करती उतनी ही देर से स्‍लेट-पैंसिल पकड़ती । हँसती, का दिदिया, ई का पकड़ाती हो? का करेंगे पड़के’। चाची भी भिड़क देतीं, का बबूनी, ईको पढ़ा-लिखा कर मस्‍टरनी बनाओ गीत् बर्त्‍तन भासा के करेगा ।’ क्षुब्‍ध हो मैंने प्रयास करना छोड़ दिया। महीने भर की छुट्टी में नाम लिखना, जोड़ना-घटाना सिखा सकती थी । बिना माँ की बची, इधर-उधर काम करके दादी के साथ जी रही है । बात होते हुए भी नहीं है, दूसरा घर बसा लिया है । दादी दुखी, परेशान रहती है ।

पढ़िए शीला त्रिपाठी की कहानी 'ललमुनिया'
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=K7nB0IO1
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #अनूदित_कविता_संग्रह

ढूँढ़ रहा हूँ चरणधूलि
उस महात्मा की
जिसने विरोधों के जरिए
दिया नया जीवन दलितों को
और खोज रहा हूँ शब्‍द
जिन शब्‍दों धर्ममार्तण्डों को
रख दिया था झकझोर के
उन शब्दों की पकड़कर उंगली
हम बने साक्षर
उन्‍हीं की परम्परा
चलानी है आगे

पढ़िए कविता 'खोज' डॉ. पद्मा पाटील की अनूदित कविता संग्रह 'दस्‍यु का घोड़ा' में
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=G3fCsH47
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #कहानी

उस छोटे-से गांव में जाड़े की रात अलग तरह से गिरती थी. अंधेरे में कूदने से पहले बहुत देर तक, वह गांव शाम की आखिरी ललछौंही में डूबा रहता. उस वक्त उसके चारों ओर उगी छोटी-छोटी पहाड़ियों के कंधों पर घना कुहासा सफेद कबूतरों की तरह बैठा होता... फिर अचानक एकदम से वे कबूतर उड़ते और गांव के कच्चे मकानों खेतों और कब्रों पर बैठ जाते. रात शुरू हो जाती. मैं तब अपने कमरे से बाहर निकलता और रेलवे स्टेशन की ओर चल देता. पिछले चार महीनों से मैं ऐसा ही कर रहा था. खाना खाने के बाद स्टेशन तक जाना. वहां कुछ देर बैठता फिर चला आता. छोटे रेलवे स्टेशन मुझे हमेशा रहस्यमयी तरीके से आकर्षित करते हैं... खासतौर से अपनी शांत उदासी के साथ.

पढ़िए प्रियंवद की कहानी 'केंचुल'
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=0IRUJJgm
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #इस्लाम #इतिहास

यह इस्लाम की बड़ी ख़ूबी है कि क़ुरान इस मज़हब की अकेली और आख़िरी किताब है। इस लिए क़ुरान की मूल भावना, उद्देश्य और मक़सद (intent, purpose and spirit) से अलग और इसके विपरीत इस्लाम के राजनैतिक इतिहास के दौर में विकसित सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था, विधि-विधान, विचार धारा और आचार संहिता की कोई बाध्यता किसी मुस्लिम के लिए नहीं है।
632 ई में पैग़ंबर की वफ़ात के समय तक पूरे अरब में इस्लाम क़बूल हो गया था और सभी क़बीलों ने पैग़ंबर के लिए बैयत (वफ़ादारी की क़सम) कर ली थी। इस्लाम की यह मक़बूलियत सिर्फ़ फ़ौजी ताकत की वजह से नहीं अपितु पैग़ंबर की अपनी अज़ीम शख़्सियत, नैतिक ऊँचाई, मिसाली इंसानियत और मज़हब-ए-इस्लाम के रौशन उसूलों की वजह से भी हुई थी ।

पढ़िए 'पैग़म्बर का इस्लाम और उनकी राजनीति' राकेश मिश्र की किताब 'इस्‍लाम का इति‍हास' में

https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=EbmUMmYY
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #Turner_Syndrome

जी करता है कि कुछ देर बाहर हो आऊँ। विश्वास-खण्ड (गोमती नगर, लखनऊ) का वह बड़ा हरियाला पार्क फन-मॉल की वह कॉफी-शॉप हजरतगंज का वह बुक-स्टोर। कहीं तो उचटन थमेगी। कहीं तो खलबली शांत होगी। कहीं तो नब्ज का दौड़ता घोड़ा सुस्ताएगा। पर नहीं। मैं श्मशान जाऊँगी। बैकुण्ठ धाम। जहाँ काकी को अंगारों की सेज पर लेटा आयी थी। अस्थि-कलश में सब कुछ अवशिष्ट नहीं भरा जा सकता। कुछ कोमल अभस्म मेरा अब भी वहाँ रह छूटा है, जो जलेगा नहीं क्योंकि आग उसे हाथ भी नहीं लगाएगी।
''आग कभी मैली नहीं हो सकती रुचिका बेबी कभी नहीं'' तुम कहा करती थीं। ''पानी-हवा से उसकी फितरत बड़ी अलग है। कूड़े के ढेर को भस्म करती उसकी देह इतनी पवित्र होती है कि गंगाजल और सबा-ए-गुलमर्ग लजा जाएँ।

पढ़िए स्‍कन्‍द शुक्‍ल का उपन्यास 'अधूरी औरत'
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=rOV4O1kz
Adhuri Aurat
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#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #कहानी

पिछले कई दिनों से उसके बदन का मौसम बदल रहा है । त्वचा मुलायम हो गयी है और चेहरे पर कुछ ऐसा निखार आया है जिसमें बुलावा छुपा हुआ है । आँखें फूल-पत्तियों, हवा-बादलों पर से गुज़रती हुई जाने किसे ढूँढ़ रही हैं । मन बहका-बहका-सा अपने ही तन का चक्कर काट रहा है । याद करने की कोशिश करता है कि उसने आख़िरी बार इश्‍क़बाज़ी कब की थी ? याद नहीं आता । मगर वैसा ही अनुभव फिर दोहराने का मन कर रहा है । मगर किसके साथ ? फूलों से भरे इस अहसास का भागीदार उसे कहाँ मिलेगा ? यह धीरे-धीरे बढ़ता बुख़ार फौरी किसी स्पर्श से एकाएक उतारा नहीं जा सकता, बल्कि उसके मन-आँगन में जो उत्सव उतर आया है, उसको वह भरपूर तरीके़ से मनाना चाहता है, ताकि जब वह इस तपिश से मुक्ति पाए तो उसका वजूद ऐसी आज़ादी से लबरेज हो उठे कि वह फिर मासूम बन जाए और ताज़ादम हो इस बूढ़ी दुनिया को दोहराने का हौसला पा सके । मगर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा ?

पढ़िए नासिरा शर्मा की कहानी 'जोड़ा'
https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?ShortCode=wbHJlQrl
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