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Manjusha pandey
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एक दिन जिंदगी...
दिन जलता है  और रात आहें भरती है  मालूम भी हो कि जिंदगी किस वक्त जीनी है  थोड़ा थोड़ा ही सही  आंगन का दरख़्त हर रोज झड़ता है  आसमान को मुट्ठियों में लपेटे हुए  टहनियों से अनाम चेहरे उतर आते हैं  धूल की सतह तक   आखिरी सफर एक उम्मीद तक  जो रहता ही नहीं  रह जा...

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राम की मैं सीता थी
                                    तुम मुझे देवी का दर्जा ना दो   तुम मेरी महिमा का बखान ना करो ना ही मेरी ममता करुणा वात्सल्य जैसी भावनाओं का ढोंग रचाओ  देह का सौंदर्य और प्रेम का गुणगान किसी कविता में ना करो  मेरे त्याग और बलिदान को जग से ना कहो मुझे गृह...

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हमें नहीं आता हाथ पकड़ना
                             हमें नहीं आता हाथ पकड़ना  साथ बैठना  रास्ता दिखाना  किसी के आंसू पौंछना जब हो रही हो कठोर दर कठोर जिंदगी  पार कर रहे पहाड़ जैसे अनुभव  पराधीनता से लैस बर्चस्व  दरारों के जैसे प्रयास  सूख रहें हो जलप्रपात  अपनी ही मिटटी अपने हाथो...

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रंगों के माध्यम से एक प्रयास भर ...


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"धुंधला गयी शक़्ल"
                                                              मन के आंगन में हुई कुछ अजीब हलचल तेरी आहटों ने छेड़ी है शायद कोई ग़ज़ल तेरे इन्तजार का शिकवा करें ये अबसार   बड़े बियावान से हुए गली चौबारे महल   जिक्र तेरा ख्वाब तेरे है तेरा ही तसब्बुर   सरगोशि...

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नागफणी और मैं
                                     समय की रेत में तपती  नागफणी और मैं  क्या अभयदान के जैसा जीवनदान होगा  हम दोनों का पीड़ा की अनेक गाथाएं रची जा रही हैं   मेघों की पहली बूंद से फूटती तुम   दर्द की कविता सी फलती मैं कांटों का  नुकीलापन अंतर्द्वंद्वों का सं...

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समीक्षा .."आधी रात के रंग"
साहित्य का हर एक क्षण अनमोल है , कवि विजेंद्र जी से मेरी मुलाकात फेसबुक पर ही हुई उनको हाल फिलहाल में कई साहित्यिक पत्रिकाओं में पढ़ा सो उनको पहचानने में देर नहीं लगी | वे एक वरिष्ठ परिष्ठित कवि हैं ये बात भला कौन नहीं जानता मगर यहां आज बात रंगों की है कैनव...

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सयुंक्त काव्य संकलन " सारांश समय का " से मेरी कविताएं...
"डाल से गिरा पतझड़"   तुम आओ एक बार   दे जाओ मुझे मुट्ठी भर आकाश     अदृश्य स्वपन   प्रेम चिन्ह   अमर साहित्य   नरगिसी फूल ताकि देख सकूं एक उजाले   को बढ़ते अपनी ओर देख सकूं भविष्य की धरा पर   पहले बसंत को   गूँथ सकूं एक साथ कई प्रेम लताएं   ताकि रच सकूं कु...

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जूते नहीं जानते
जूते नहीं जानते   रास्ता अपने घर का  जंगल का  दुनिया का वे जानते हैं सिर्फ पता  वे घर परिवार में रहते हैं दुनिया में और युद्ध के मैदान में भी किसी सेवक की तरह  अछूत की तरह  गुलाम की तरह वे किसी फिसलन से नहीं घबराते ना ऐंठते हैं   घबराये हुए लोग नाक ऊंची किय...

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"एक लम्हा कर्ज".. शीर्षक "कहानी"
सुबह के नौ बज रहे थे गौतम का आज फिर यूनिवर्सिटी जाने का मन नहीं था, इसलिए फ़ोन कर के छुट्टी ले ली मगर ऐसा कब तक चलने वाला था,  चेहरे पर एक अजीब ख़ामोशी पसरी थी और पलंग पर लेटे लेटे बड़ी देर से उस पंखे को लगातार देखे जा रहा था, देख तो पंखे को रहा था पर मन कह...
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