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sweta sinha
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अब मेरी हथेलियों मे ही सूरज उगा करते है... श्वेता🍁
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अन्तर्मन के आसमान में
रंग बिरंगे पंख लगाकर
उड़ते फिरते सोच के पाखी
अनवरत अविराम निरंतर
मन में मन से बातें करते
मन के सूनेपन को भरते
शब्दों से परे सोच के पाखी

कभी नील गगन में उड़ जाते
सागर की लहरों में बलखाते
छूकर सूरज की किरणों को
बादल में रोज नहाकर कर आते
बारिश में भींगते सोच के पाती

चंदा के आँगन में उतरकर
सितारों की ओढ़नी डालकर
जुगनू को बनाकर दीपक
परियों के देश का रस्ता पूछे
ख्वाब में खोये सोच के पाखी

नीम से कड़वी नश्तर सी चुभती
मीठी तीखी शमशीर सी पड़ती
कभी टूटे टुकडों से विकल होते
खुद ही समेट कर सजल होते
जीना सिखाये सोच के पाखी

जाने अनजाने चेहरों को गुनके
जाल रेशमी बातों का बुनके
तप्त हृदय के सूने तट पर मौन
सतरंगी तितली बन अधरों को छू
कुछ बूँदे रस अमृत की दे जाते
खुशबू से भर जाते सोच के पाखी

     #श्वेता🍁
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दिसम्बर
दिसम्बर
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दिसम्बर
(१)
गुनगुनी किरणों का
बिछाकर जाल
उतार कुहरीले रजत
धुँध के पाश
चम्पई पुष्पों की ओढ़ चुनर
दिसम्बर मुस्कुराया

शीत बयार
सिहराये पोर-पोर
धरती को छू-छूकर
जगाये कलियों में खुमार
बेचैन भँवरों की फरियाद सुन
दिसम्बर मुस्कुराया

चाँदनी शबनमी
निशा आँचल में झरती
बर्फीला चाँद पूछे
रेशमी प्रीत की कहानी
मोरपंखी एहसास जगाकर
दिसम्बर मुस्कुराया

आग की तपिश में
मिठास घुली भाने लगी
गुड़ की चासनी में पगकर
ठंड गुलाब -सी मदमाने लगी
लिहाफ़ में सुगबुगाकर हौले से
दिसम्बर मुस्कुराया

(२)

भोर धुँँध में
लपेटकर फटी चादर
ठंड़ी हवा के
कंटीले झोंकों से लड़कर
थरथराये पैरों को
पैडल पर जमाता
मंज़िल तक पहुँचाते
पेट की आग बुझाने को लाचार
पथराई आँखों में
जमती सर्दियाँ देखकर
सोचती हूँ मन ही मन
दिसम्बर तुम यूँ न क़हर बरपाया करो

वो भी अपनी माँ की
आँखों का तारा होगा
अपने पिता का राजदुलारा
फटे स्वेटर में कँपकँपाते हुए
बर्फीली हवाओं की चुभन
करता नज़रअंदाज़
काँच के गिलासों में
डालकर खौलती चाय
उड़ती भाप की लच्छियों से
बुनता गरम ख़्वाब
उसके मासूम गाल पर उभरी
मौसम की खुरदरी लकीर
देखकर सोचती हूँ
दिसम्बर तुम यूँ न क़हर बरपाया करो

बेदर्द रात के
क़हर से सहमे थरथराते
सीले,नम चीथड़ों के
ओढ़न-बिछावन में
करवट बदलते
सूरज का इंतज़ार करते
बेरहम चाँद की पहरेदारी में
बुझते अलाव की गरमाहट
भरकर स्मृतियों में
काटते रात के पहर
खाँसते बेदम बेबसों को
देखकर सोचती हूँ
दिसम्बर यूँ न क़हर बरपाया करो

-श्वेता सिन्हा
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दिसम्बर
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एक पुरानी कहावत है
"किताबें मानव की सच्ची मित्र है।"

पर शायद आज के दौर में ऐसे बहुमूल्य वाक्य मात्र ऐतिहासिक उक्ति बनकर रह गये हैं ऐसा प्रतीत होने लगा है।  डिजिटल क्रांति के इस युग में किताब स्कूल- कॉलेज की पढ़ाई से संबंधित ज्ञान में सिमटकर रह गया है । पाठ्यक्रम  में अक्सर बदलाव होते रहते हैं ,

बच्चों का ज्ञान तो वैसे भी कोर्स तक सिमटकर रह 
गया है। नैतिक शिक्षा,पौराणिक कथा,व्यवहारिक 
ज्ञान तो बहुत दूर की बात है बच्चे तो एक ही 
विषय की अलग -अलग पुस्तक भी कहाँ पढ़ना 
चाहते हैं? बस रैंक आ जाये उतना भर ही।  सोच रही हूँ  अगर बस्ते का बोझ हल्का करने के नाम पर विदेशी विद्यालयोंं के तर्ज़ पर छात्रों के हाथ में टैब पकड़ा दिया जाये तो पुस्तकों के वजूद का क्या होगा?

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एहसास जब दिल में दर्द बो जाते हैं
तड़पता देख के पत्थर भी रो जाते हैं


ऐसा अक्सर होता है तन्हाई के मौसम में
पलकों से गिर के ख़्वाब कहीं ख़ो जाते हैं


तुम होते हो तो हर मंज़र हंसीं होता है
जाते ही तुम्हारे रंग सारे फीके हो जाते हैं


उनींदी आँख़ों के ख़्वाब जागते है रातभर
फ़लक पे चाँद-तारे जब थक के सो जाते हैं


जाने किसका ख़्याल आबाद है ज़हन में
क्यूँ हम ख़ुद के लिए अज़नबी हो जाते हैं


बीत चुका है मौसम इश्क़ का फिर भी
याद के बादल कब्र पे आकर रो जाते हैं


वक़्त का आईना मेरे सवाल पर चुप है
दिल क्यों नहीं चेहरों-सा बेपर्दा हो जाते हैं


-श्वेता सिन्हा


एहसास जब.....
एहसास जब.....
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एहसास जब दिल में दर्द बो जाते हैं
तड़पता देख के पत्थर भी रो जाते हैं

ऐसा अक्सर होता है तन्हाई के मौसम में
पलकों से गिर के ख़्वाब कहीं ख़ो जाते हैं

तुम होते हो तो हर मंज़र हंसीं होता है
जाते ही तुम्हारे रंग सारे फीके हो जाते हैं

उनींदी आँख़ों के ख़्वाब जागते है रातभर
फ़लक पे चाँद-तारे जब थक के सो जाते हैं

जाने किसका ख़्याल आबाद है ज़हन में
क्यूँ हम ख़ुद के लिए अज़नबी हो जाते हैं

बीत चुका है मौसम इश्क़ का फिर भी
याद के बादल कब्र पे आकर रो जाते हैं

वक़्त का आईना मेरे सवाल पर चुप है
दिल क्यों नहीं चेहरों-सा बेपर्दा हो जाते हैं

-श्वेता सिन्हा

एहसास जब...
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तन्हाइयों में गुम ख़ामोशियों की
बन के आवाज़ गुनगुनाऊँ 
ज़िंदगी की थाप पर नाचती साँसें
लय टूटने से पहले जी जाऊँ 


दरबार में ठुमरियाँ हैं सर झुकाये
सहमी-सी हवायें शायरी कैसे सुनायें
बेहिस क़लम में भरुँ स्याही बेखौफ़ 
तोड़कर बंदिश लबों की, गीत गाऊँ


गुम फ़िजायें गूँजती बारुदी पायल
गुल खिले चुपचाप बुलबुल हैं घायल
मंदिर,मस्जिद की हद से निकलकर
छिड़क इत्र सौहार्द के,नग्में सुनाऊँ


हादसों के सदमे से सहमा शहर
बेआवाज़ चल रही हैं ज़िंदगानी
धुँध की चादर जो आँख़ों में पड़ी
खींच दूँ नयी एक सुबह जगाऊँ


बंद दरवाज़े,सोये हुये है लोग बहरे
आम क़त्लेआम, हँसी पर हज़ार पहरे
चीर सन्नाटों को रचा बाज़ीगरी कोई
खुलवा खिडकियाँ आईना दिखाऊँ


काश आदमियत ही जात हो जाये
दिलों से मानवता की बात हो जाये
कूची कोई जादू भरी मुझको मिले
स्वप्न सत्य कर, ऐसी तस्वीर बनाऊँ


-श्वेता सिन्हा



बेहिस-लाचार

स्वप्न
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स्वप्न
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