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Manoj Kumar Mishra
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An English Language teacher in Navodaya Vidyalaya Durg since last 20 years
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Manoj Kumar's posts

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न हम किसी के हो सके न कोई हमारा हुआ
थक गये रिश्ते चलकर बहुत? उन्हें आराम दे दो वासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है। ख्वाहिशें जलती रहीं सुनसान दर पर इस तरह न हम किसी के हो सके न कोई हमारा हुआ। लड़ लिया खुद से बहुत अब और ना हो फासला जीत कर ही खो दिया सब, हारने का क्या गिला। साफगोई कभी ऐसी ...

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बारिश
बारिश ! तुम्हारी बरसती बूंदों ने देखो ये क्या कर दिया ! चिड़ियों का घोसला उनका पंख, उनकी चोंच गीला कर दिया उनके पेट पर पत्थर रख दिया कीट-पतंगों को निःशक्त बना दिया चीटियों को ऐसे बहा ले रहे हो मानों ताल में निर्वाध तैरती है कागज़ की छोटी नाव ! गलियों में, घरो...

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कहाँ सज्दे में सर झुके तुम्ही कह दो तो अच्छा है
मेरी आंखे तो झुकती हैं हर नम आंखों को देखकर।

तेरे रूखसार की रोज बंदगी मेरे शय में अब भी शामिल है
जिस हाल में हों मुस्कराया तेरी नूर-ए-रहमत देखकर ।

बहुत ही मुश्किल है जनाजा उठाकर फिर सुला देना
आसां नहीं होता दामन बचाना खैराती हंसी देखकर ।

कैसे शहर से लिपट कर सो जाऊँ जमीर अपनी टांगकर
क्या गुजरेगी उन फकीरों पर हमको नशे में देखकर ।

बिखर के जीना औ' जी कर बिखरना आसां नहीं है मन्नू
तंज कसते हैं बेवजह लोग मुफलिसी रूखाई देखकर ।

समेट लाता हूँ अपने दामन में उधर की कुछ बची नज्में
कल हों न हों कह नहीं सकते हालात-ए-मंज़र देखकर ।

बहुत जी लिया यहाँ रफ़्तार-ए-नब्ज गिन-गिन कर
कि मर भी नहीं सकते खुदाया आहट तेरी देखकर ।

मिला है खाक में नफरत अदब से दरिया और दरख्तों का
साहिल को किनारे जाने दो लहरों का कलंदर देखकर ।

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आज स्थिर है शैव बनकर

तपती दोपहरी में
बादल के किसी कोने से
स्पशॆ की स्पंदित बूँदे
अनायास ही
रोम रोम गीला करता है।
उच्छवास
तरंगित जीवन गाथा का
एकांत गीत से
झंकृत है।
तन का मोह
मन की माया
सब तुम्हारी
दहलीज पर
रखकर खाली हाथ
लौट आया।
इसे सम्मान से
समेटकर कहीं
बंद कोठरी मे
कल के लिए
सहेज लेना
जीवंतता की
धरोहर होगी।
कौन जानता है?
आज का बीज
कल अंकुरित होकर
वृक्ष बन जाय!
कौन जानता है?
सुवासित कन्दराओं में
पत्थरो का सीना चीरकर
किंचित कोई फूल
हँस दे!
आँख की बूँदों का भार
नदी में बहती रेत है;
तल में चुपचाप
सरकती जाती है।
मौन तृष्णा भटक कर
संवाद में अथॆ की
परिभाषा तलाशने
लगती है।
हम कल की तस्वीरों में
रंग भर रहे हैं;
आज स्थिर हैं
शैव बनकर
शीतल शिलाओं पर
गहराती संवेदनाओं में
धमॆ का ममॆ
समेटे हुए।

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जीवन अगर क्षितिज होता
सार मिलन का तय करते
चन्द्र वलय-सा पुलकित हर्षित
चारू विनय कुसुम खिलते ।
मोहक प्रभा विहंगम तान
निशा हिमकर का प्रेम वितान
सरपट ढलता पहर पलक-सा
एक भूल नित-नित अज्ञान ।
तुम चित्र बना रंग भरती जाती
एक स्वप्नलोक की रचना जैसी
परम प्रासाद लोक में अविरल
धवल दिव्य प्रवंचना जैसी ।
हम धरा धाम के हैं वासी
कोई मधुर गीत ना गा पायें
आओ अनन्त में कल्पना का
एक नवल सुकोमल नीड़ बनायें ।
कौन जानता चंचल जीवन
किस बीहड़ में मोड़ेगा
कल की सांसें आज ही गिन लें
समय कहाँ कब छोड़ेगा ?

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जीवन अगर क्षितिज होता

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चाँद! तुम तरल हो रहे हो

चाँद !
तुम रुई-सी मुलायम
और पानी-सा
तरल हो रहे हो
गीली मिट्टी जैसे
धीरे धीरे सरकना
सीख लिया है ।
उष्ण रातों में
मंद मीठी पछुआ वयार की नाईं
शीतल सिलवटी गालों पर
एक सुखद एहसास की
नजरें फेर देते हो ।
धुप का धुआं जैसे
दीपक की लौ से लिपटकर
अपना अस्तित्व बोध
खोने लगता है
मेरा मृदुल शुन्य
तुम्हारे विराट में
शनैः शनैः घुलने लगा है ।

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ये तेरे आँखों का जादू है कि वो बादल-सा बरस गया   
वरना कब आँखों को अपना आसमां बनाता है धुआँ

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हाय रे मानव ! तुम्हारी भी अजब कहानी है
मरते हो तो आँखें मूंदकर
और मरते हो तो विद्रोह से ।
एक वो था जिसने जान दे दी
अपनी माँ के लिए ।
और एक तुम निकले
जिसने बेच दिया उसको
सिर्फ दो कौर मांस के लिए ?

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बासी रोटी पर 
लगा नमक तेल-सा
आज मन लगता है 
किसी के लिए खुराक
किसी के लिए उपवास 
बनकर घूमता हूँ 
अपने ही शहर में !

सांसों की जद्दोजहद 
सर्द रातों में बंद नाक-सी 
होती जा रही है !
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