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Arohi Shrivastava
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डर
उड़ता हुआ परिंदा जब,गिरने से ना भय खाता है, सीमा पर खड़ा सिपाही जब, ना मरने से घबराता है, खेतों में खिलती फ़सलें जब, बेख़ौफ़ युँही बिछ जाती हैं, जब पतली सी टहनी पर चिड़िया,निर्भय हो नीड़ बनाती, मस्त चाल में जब नदियाँ ,लाँघ किनारे जाती है, और भूल के अपना मीठ...

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नशा
नशा है नशा है,नशा ही नशा है, हाँ माना है मैंने ,ये देता मज़ा है, यक़ीनन है फ़ुरसत ,ज़माने की ज़िद से, है देता जुनूँ भी, इरादों की हद से, जो आँखों में उतरे ,जुदा सारे ग़म है, है कमज़ोर राते, जवाँ सिर्फ़ हम हैं, बेख़ौफ़ है ये,न परवाह किसी की, बेबाकियों को, ये...

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रोक लेता
जो गर रोक पाता,तुझे रोक लेता, तेरी बाँहों में गुज़रा ,समाँ रोक लेता,  मेरी चाहत में तेरी ,रज़ा रोक लेता, तेरी साँसों से बहती, हवा रोक लेता, तेरे माथे को छूती ,दुआ रोक लेता, जो गर रोक पाता,तुझे रोक लेता, तेरी पायल से बजती,झनक रोक लेता, चूड़ियों की मैं तेरी, ...

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क़लम
हाँ मै कलम हूँ ,स्वतंतृ,स्वछन्द कलम, किसी के लिये दर्द ,किसी के लिये दुआ, किसी के लिये अश्क, किसी के लिये सुकून, फिर भी एक निस्वार्थ कलम..... तुमने उठाया मुझे लिखने को,सच, झूठ, कल्पनाये, बिन जाने मेरी मंशा मेरी व्यथाये .. मै क्या लिखना चाहती हूँ, क्योंकी मै...

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दौर
एक दौर वो भी था जब वो घुट-घुट कर जी लेती थी, लाज बचाने को घर की अपमान कई सह लेती थी, मार पती की प्यार समझ कई रात युहीं  कट जाती थी, सास के तानों को सुनकर माँ याद उसे भी आती थी, बस चुप रहकर सब दुख सहना माँ उससे बोला करती थी, उसके एक सम्मान को ले वो सबकुछ झेल...

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शिक्षा
भारत के किसी कोने में,जब बच्चा सबक उठाता हो, उच्चारण उन शब्दों का,देश के हर ज़र्रे तक जाता  हो, एक देश है,एक भाव है,पाठ्य माल भी एक बने, कयी भाषाओं का देश मेरा,"एक" विद्यालय कहलाता हो,  मिटा रहे जब भेदभाव,तो शिक्षा को क्यों बाँटा है, एक वस्त्र मे सजी हो पुस्...

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क्रोध
उठा के तुमने उंगली, धीरज तोड़ा है तूफान का, हर बूंद लहू की चीख रही , लो बदला अमर जवान का, हम हिंसा के अनुयायी नहीं, पर तुमने शस्त्र उठाया है, इतिहास के उजले पन्नों पर, पहले तुमने लहू लगाया है, अब तान के सीना खड़े रहो, और देखो घात महान का, उठा के तुमने उंगली.....

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रंजिश
रंजिशे हैं दरमियाँ,सूनी रातों मे अब, धूँड़े खुद को हँसी,उलझी बातों मे अब, ज़ख्म क्या कर गया?आँखे नम ही तो है, तनहा जी लेंगे हम ,ये भरम भी तो है, मिट रहे सारे लम्हें दीवारों से अब, रंजिशें हैं दरमियाँ... आये तू लौटकर,अब ये चाहत नही, तेरे होने की अब हमको आदत नह...

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प्रकृति
अपने कमरे की खिड़की से, बँधे पेड़ ,हवाये बादल देखे, सहमी सी बारिश गुमराह परिंदे देखे, इन्सानियत से मजबूर,हताश और चूर-चूर, खामोश और सबकी सोच से दूर, कौन समझ पायेगा,इनकी सज़ा हम ही है, प्रलय और विनाश की वजह हम ही है, बहती हुइ नदी के जो किनारे बाँध दे, तनो की ...

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दर्द
है दर्द का मंज़र आँखों मे,कोई खंजर दिल मे गया उतर, छोटा सा घरौंदा जीवन का,इन आँखों मे है तितर बितर, अश्कों मे मेरे ख्वाबों के ,टूटे वो टुकड़े बहते हैं, क्या हाल हुआ अरमानो का,हम किस्सों मे अब कहते है, उठने सोने के अंतर मे ,अब सब ठहरा सा लगता है, खुशियों के इस...
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