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kewal krishna
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जो हालांकि होते हैं, पर नजर नहीं आते
जब अत्याचारी हो जाए सूरज सूख जाएं नदियां वीरान हो जाए धरती और लगे कि सब कुछ खत्म हो गया तब तुम उन बीजों के बारे में सोचना जो हालांकि होते हैं, पर नजर नहीं आते। उस बारिश के बारे में सोचना जो होनी ही है, किसी न किसी रोज। और सोचना अपने बारे में। अपनी जिंदा उम्...

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साक्षात्कार
कितना अजीब लगता है आइने के सामने खड़े होकर यह सोचना  कि ये चेहरा कितना जाना पहचाना सा है. अपनी ही गली में खड़े होकर सोचना कि शायद गुजरा हूं मैं भी कभी यहीं से। अपनी ही कविताओं को किसी और की महसूस कर बांचना। अपने ही शब्दों को अजनबी कर देना खुद से। कितना अजीब...

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राजीव लोचन के पुराने पड़ोसी
  धरती एक किताब है। पन्ने उलटिए और कहानियां बांचिए। इन दिनों जो कहानी बांची जा रही है, वह राजिम की है। कथावाचक हैं-डा.अरुण शर्मा। वही, जो सिरपुर की कथा के सूत्रधार भी है। राजिम में डा.शर्मा धरती की कई परतें उधेड़ चुके हैं। उम्मीद जागी है कि सिरपुर जितने ही ...

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सुबह-सवेरे
सुबह-सवेरे जब रजाई कुनमुना रही थी चौखट पर खड़ी थी धूप खिलखिला रही थी वो झुग्गियों से आ रही थी -केवलकृष्ण

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करवट
अभी सब सो रहे हैं सामने की वो टेबल, उस पर रखी किताबें दीवार पर टंगा टेलीविजन खिड़कियां, दरवाजे सब। रातभर की चौकीदारी के बाद  वो लट्टू भी उंघ रहा है और मैंने अभी-अभी करवट बदली है। टीssssटी हुट टीssssटी हुट क्वांय क्वांय, क्वांय क्वांय खिड़की के बाहर चीख रहा ...

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बस अभी-अभी तो
बस अभी-अभी तो जागा सुकवा आखें मलता अभी अभी । बस अभी-अभी तो सोचा सुकवा बस अभी अभी तो। बस अभी अभी तो पौ फटी। बिखरी लाली अभी अभी बस अभी-अभी तो उगी कविता बस अभी-अभी -केवलकृष्ण
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