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Ali Sohrab
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हैदराबाद में याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ दलित क्यों विरोध प्रदर्शन कर रहे थे? जेएनयू में मुस्लिमों पर इतना ध्यान क्यों है?

हैदराबाद से लेकर JNU तक देश के छात्र हाशिए पर रहे समुदायों के प्रतिनिधियों की बात क्यों कर रहे हैं? हक़ीक़त यही है कि भारत में दलितों और मुस्लिमों को ही सबसे ज़्यादा फांसी की सज़ा दी गई है.

मृत्युदंड पाने वालों में कुल 75 फ़ीसदी और चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है. ऐसे में पक्षपात का मुद्दा उभरता है.

मालेगांव धमाकों में सवर्ण हिंदुओं के शामिल होने का मामला हो तो सरकार सख़्ती नहीं दिखाती है.

बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी देने की जल्दी नहीं है. राजीव गांधी के हत्यारों की सज़ा कम कर उसे उम्रक़ैद में तब्दील कर दिया गया है.

इन लोगों को भी चरमपंथ का दोषी पाया गया था. लेकिन सबको समान क़ानून से कहां आंका जा रहा है?

इन सबमें मायाबेन कोडनानी को छोड़ ही दें, जिन्हें 95 गुजरातियों की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था, लेकिन वे जेल में भी नहीं हैं.

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पत्रकारिता अब सच और ईमानदार का साथी के बजाए सत्ता और कट्टरता के पुजारियों की हो गई है, अपवाद स्वरुप कुछ चैनलों को छोड़ दिया जाये तो अधिकतर चैनलों के मालिक और उनके एंकर-रिपोर्टर पूरी तरह से नागपुर के इशारों पर काम कर रहे हैं, अब तो ऐसा लगने लगा है कि इनकी सुबह और शाम दिल्ली में आरएसएस दफ्तर झंडेवालान में गुजरती है.

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संघ का मुस्लिम-प्रेम उफान पर है, "राष्ट्रीय मुस्लिम मंच" द्वारा मुसलमानों कि 25 करोड़ आबादी से कुछ 50-100 मीरजाफरों को ढूँढ रहा है ताकि मुसलमानों को आपस में आसानी से नफरत फैलाया जा सके। भाँड मीडिया भी संघ व मोदी की इस साजिश में पूरे ज़ोर शोर से लगा हुआ है और विदेशी "तारेक फतेह" जैसे मीर जाफर को लगातार अपने पैनल में बुलाकर मुसलमानों को बाँटने और उस खाई को चौड़ी करने में संघ की साजिश को अंजाम दे रहा है।

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जब उच्चतम न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध सुनवाई पर टिप्पणी करते हुए कही कि "लोकतंत्र की हत्या हो रही है तो हम मूक दर्शक बन कर नहीं रह सकते" उच्चतम न्यायालय का यह व्यवहार बिल्कुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह था। क्युँकि जब मुसलमानों से संबंधित विषयों पर इसी तरह "लोकतंत्र की हत्या" होती है तो उच्चतम न्यायालय "मूक दर्शक" बन कर सदैव रहा है ।

उसी "गंगाजल" फिल्म में आगे इंस्पेक्टर बच्चा यादव "साधू यादव" के विरुद्ध कार्यवाही करता है तो उसकी आँख फोड़कर हत्या कर दी जाती है । कहीं उच्चतम न्यायालय को यही डर तो नहीं ? जो साधू यादव (संघ) के विरुद्ध कार्यवाही से रोक तो नहीं रहा ? कहीं साधू यादव का डर उच्चतम न्यायालय को मुसलमानों से संबंधित मामलों में मूकदर्शक बनने को बाध्य तो नहीं कर रहा है ? या उच्चतम न्यायालय में सब साधु यादव के लोग ही बैठे हैं ?

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मेरे प्यारे देशवासियो,
हमारे राष्ट्र के सड़सठवें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, मैं भारत और विदेशों में बसे आप सभी को हार्दिक बधाई देता हूं। मैं, हमारी सशस्त्र सेनाओं, अर्ध-सैनिक बलों तथा आंतरिक सुरक्षा बल के सदस्यों को अपनी विशेष बधाई देता हूं।

प्यारे देशवासियो,
छब्बीस जनवरी 1950 को हमारे गणतंत्र का जन्म हुआ। इस दिन हमने स्वयं को भारत का संविधान दिया। 

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उसका 'दिल टूट गया था'। उन्हें 21 दिसंबर को यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से बाहर 'फेंक' दिए जाने के बाद रोहित समेत पांच स्टूडेंट्स कैंपस गेट के बाहर तंबू लगाकर रह रहे थे। उन्हें मेस और दूसरी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था। 

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हिंदू समाज को राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों से सवाल करना चाहिए कि राम मंदिर के नाम पर जो खरबों रुपये का चंदा इक्ट्ठा हुआ था उसका क्या हुआ?  मेरे खयाल से हिंदू समाज बहुत भोला है, नेक है। आडवाणी की रथ यात्रा के वक्त हिंदू औरतों ने राम मंदिर बनवाने के लिए अपने गहनें तक उतार कर दे दिए थे। जनता को राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों से सवाल करना चाहिए। मेरे ख्याल से तो इस आंदोलन को दोबारा इसलिए शुरू किया गया है क्योंकि पहले का चंदा सब खा-पी गए होंगे अब दोबारा पैसे की जरूरत होगी। राम मंदिर मुद्दा पैसा कमाने की मशीन है। मेरी गुजारिश है सबसे पहले हिंदू भाई 15-20 सालों के उन खरबों रुपये का हिसाब लें, जो राम मंदिर के नाम पर इक्ट्ठा किए गए हैं। 

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पागल,
जी जी पागल ही जिसका जन्म ही राँची में हुआ हो वो पागलों की तरह ही सोचेगा, पापा का जॉब था Heavy Engineering Corporation Ltd., Ranchi में और हमारा जन्म भी उसी शहर में हुआ, जब होश संभाला तो देखा आदिवासियों से ऐसा बर्ताव किया जा रहा है जैसे वो जंगली जानवर हों, गाड़ियों में भर भर के जंगल में छोड़ दिया जाता था हमारे सभ्य समाज द्वारा, अब ऐसे माहौल में पला-बढ़ा व्यक्ति पागल के जैसा ही न सोचेगा ?

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अब कल्पना की नदी जब बह ही निकली है तो मैं सोचता हूं कि क्यों न लगे हाथों रानी लक्ष्मी बाई के बाल-प्रेम पर एक फ़िल्म बनाई जाए और अगर पटकथा कमज़ोर पड़ती है तो लॉर्ड डलहौज़ी की एक गोरी बहन बना दी जाए जो शादीशुदा होते हुए भी अकेलेपन की शिकार है, जिसे रानी झांसी के एक सिपहसालार से प्यार हो जाता है। इस सिपहसालार को रानी अपने भाई की तरह मानती है और अंत में जब रण में रानी का घोड़ा फंसता है तो उसी गोरी का पति अपनी टुकड़ी के साथ रानी को घेरता है। रानी घायल होने के बाद भी उस अंग्रेज़ को मौत के घाट उतारती है और मरने के पहले अपने भाई के हाथ में उसकी गोरी प्रेमिका का हाथ रखती है। जय हिन्द कहती है और इस मृत्युलोक से कूच कर जाती है।
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