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विशाल शुक्ल अक्खड़
Lives in Kanpur Nagar, Uttar Pradesh, India
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चाक चले हाथ सधे माटी की बिटिया गढ़े  कुम्हार जनक साजें मोहे धागा नाल जुदा करे आवं तपे रंग चढ़े सजनी तब ससुराल चले तेल-बाती साथ दें रोशन फिर घर-द्वार करे
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चाक चले हाथ सधे माटी की बिटिया गढ़े  कुम्हार जनक साजें मोहे धागा नाल जुदा करे आवं तपे रंग चढ़े सजनी तब ससुराल चले तेल-बाती साथ दें रोशन फिर घर-द्वार करे
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यह जन्नत है
यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी शिकारा पर बरसे हिमालय का.. पानी यहां का हर मंजर ......बड़ा खूबसूरत हवा भी यहां की ........बड़ी ही रुहानी यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी चिनाब के दर पे लिखीं जो कथाएं बच्चों को अपने आओ ....सुनाएं कई सपूतों ने सींचा है .....इस...
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यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी शिकारा पर बरसे हिमालय का.. पानी यहां का हर मंजर ......बड़ा खूबसूरत हवा भी यहां की ........बड़ी ही रुहानी यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी चिनाब के दर पे लिखीं जो कथाएं बच्चों को अपने आओ ....सुना...
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मैं निभाता चला गया
वो करते गए जफाएं मैं निभाता चला गया उनके दिए हर जख्म सहलाता चला गया तकदीर में तो न था ऐसा सितम ऐ खुदा तू भी तो हर गम मुझे पिलाता चला गया
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वो करते गए जफाएं मैं निभाता चला गया उनके दिए हर जख्म सहलाता चला गया तकदीर में तो न था ऐसा सितम ऐ खुदा तू भी तो हर गम मुझे पिलाता चला गया
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दीदार-ए-यार
वो गुरफा में बैठे हैं दीदार-ए-यार को पहुंचा दो कोई हाल-ए-दिल दिलदार को हसरत मिलने की हसरत ही रह गई सरनिगूं बना दिया नगमा निगार को दर्द-ए-दिल दिया दवा भी तो दे देते यतीम क्यूं छोड़ दिया अपने निजार को नीयत बदल गई निशाना बदल गया रुसवा करूं कैसे उस जां-निसार को...
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वो गुरफा में बैठे हैं दीदार-ए-यार को पहुंचा दो कोई हाल-ए-दिल दिलदार को हसरत मिलने की हसरत ही रह गई सरनिगूं बना दिया नगमा निगार को दर्द-ए-दिल दिया दवा भी तो दे देते यतीम क्यूं छोड़ दिया अपने निजार को नीयत बदल गई निशाना बदल गया...
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सर्द मौसम की बदरी
सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है शाल ओढ़े सनम तू किधर जा रही है  बूंदे गिरने लगी हैं जरा सा ठहर जाओ संभल कर चल लो कहीं न फिसल जाओ सांसों की गर्मी दे दो सदा आ रही है सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है भूल से भी न तुम भूल ऐसी करो हवाओं का रुख देख कर ही चलो जुल्...
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सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है शाल ओढ़े सनम तू किधर जा रही है  बूंदे गिरने लगी हैं जरा सा ठहर जाओ संभल कर चल लो कहीं न फिसल जाओ सांसों की गर्मी दे दो सदा आ रही है सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है भूल से भी न तुम भूल ऐसी करो...
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महंगाई
उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई एक ही दिन में खा गई सारी कमाई ठोंक बजा कर हर सामान चुनतीं पत्नी जी तोड़-तोड़ कर अरमान बुनतीं सूची से कम जरूरी सामान खारिज करतीं फिर याद आ गई अचानक ही दवाई उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई... बर्तन की दुकान हो कपड़े की दुकान बड़ी हसरत ...
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उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई एक ही दिन में खा गई सारी कमाई ठोंक बजा कर हर सामान चुनतीं पत्नी जी तोड़-तोड़ कर अरमान बुनतीं सूची से कम जरूरी सामान खारिज करतीं फिर याद आ गई अचानक ही दवाई उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई... बर्तन की दु...
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रिश्ते की टूटन
रिश्ते का यूं टूट जाना कोई कहानी नहीं आंसू हैं गम के आखों से बहता पानी नहीं काश वो लम्हा बीत जाता यूं ही चुपके से सारे सिकवे भूल जाते होती ये नादानी नहीं
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रिश्ते का यूं टूट जाना कोई कहानी नहीं आंसू हैं गम के आखों से बहता पानी नहीं काश वो लम्हा बीत जाता यूं ही चुपके से सारे सिकवे भूल जाते होती ये नादानी नहीं
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कल तक
कल तक झूमे वो खत ओ किताबों में आज आये यूं मेहमां बनके ख्वाबों में रोशन जहां था जिनका मेरी इक मुस्कान पे कहने लगे, बाकी रहा न तेल अब इन चरागों में दर-ओ-दीवार के दीदार को रहते थे बेकरार मोड़ लिया मुंह हमसे रहने लगे हिजाबों में वो छत की दीवार से कोहनी टिका के ...
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कल तक झूमे वो खत ओ किताबों में आज आये यूं मेहमां बनके ख्वाबों में रोशन जहां था जिनका मेरी इक मुस्कान पे कहने लगे, बाकी रहा न तेल अब इन चरागों में दर-ओ-दीवार के दीदार को रहते थे बेकरार मोड़ लिया मुंह हमसे रहने लगे हिजाबों में ...
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ठहर बरसो सावन
ठहर-ठहर बरसो सावन सिहर-सिहर जाता वदन गीत के हर बंद में ज्यों घुमड़-घुमड़ आता सजन
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ठहर-ठहर बरसो सावन सिहर-सिहर जाता वदन गीत के हर बंद में ज्यों घुमड़-घुमड़ आता सजन
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आओ जरा शबाब
आओ जरा शबाब पे आओ तो हुजूर रुख से जरा नकाब हटाओ तो हुजूर बदरी में छिप के बैठा है चांद क्यूं मेरा लब से जरा शराब छलकाओ तो हुजूर चोरी-चोरी तकना मुस्का के छिप जाना जुल्म है अदा कोई बताओ तो हुजूर मुझसे अच्छा कैसे उस छत का है नसीब अदाओं से अपनी न दिल जलाओ तो हुज...
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आओ जरा शबाब पे आओ तो हुजूर रुख से जरा नकाब हटाओ तो हुजूर बदरी में छिप के बैठा है चांद क्यूं मेरा लब से जरा शराब छलकाओ तो हुजूर चोरी-चोरी तकना मुस्का के छिप जाना जुल्म है अदा कोई बताओ तो हुजूर मुझसे अच्छा कैसे उस छत का है नसीब...
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कुछ ने कहा नाम रख लो विशाल शुक्ल अक्खड़
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातक (प्रतिष्ठा), कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री, भारतीय विद्या भवन, कोलकाता से पत्रकारिता में डिप्लोमा. प्रभात खबर कलकत्ता से पत्रकारिता की शुरुआत, बीच में एक साल देश के पहले बाइलिंगुअल टैबलायड डेली आइनेक्स्ट के हेड आफिस कानपुर में जनरल डेस्क पर बिताये. अक्तूबर 2007 से दिसंबर 2011 तक फिर प्रभात खबर में रहा और जनवरी 2012 से कानपुर फिर कानपुर में.
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Kanpur Nagar, Uttar Pradesh, India
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Kolkata, West Bengal, India - Gonda, Uttar Pradesh, India