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Vishal Shukla Akkhad
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातक (प्रतिष्ठा), कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री, भारतीय विद्या भवन, कोलकाता से पत्रकारिता में डिप्लोमा. प्रभात खबर कलकत्ता से पत्रकारिता की शुरुआत, बीच में एक साल देश के पहले बाइलिंगुअल टैबलायड डेली आइनेक्स्ट के हेड आफिस कानपुर में जनरल डेस्क पर बिताये. अक्तूबर 2007 से दिसंबर 2011 तक फिर प्रभात खबर में रहा और जनवरी 2012 से फिर कानपुर में.
काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातक (प्रतिष्ठा), कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री, भारतीय विद्या भवन, कोलकाता से पत्रकारिता में डिप्लोमा. प्रभात खबर कलकत्ता से पत्रकारिता की शुरुआत, बीच में एक साल देश के पहले बाइलिंगुअल टैबलायड डेली आइनेक्स्ट के हेड आफिस कानपुर में जनरल डेस्क पर बिताये. अक्तूबर 2007 से दिसंबर 2011 तक फिर प्रभात खबर में रहा और जनवरी 2012 से फिर कानपुर में.

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कहीं किसी की आह तो नहीं ले ली
कहीं किसी की आह तो नहीं ले ली कहीं किसी का दिल दुखाया तो नहीं चंद सिक्कों की खातिर झूठे बन गए मैंने कभी गैर तुम्हें बनाया तो नहीं    हिदायत जो दी थी दादी ने एक दिन बुजुर्गों को कहीं फिर सताया तो नहीं सदमे में बैठा मेरा रकीब इक कोने में खुशी का राज उसको बताय...

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चुनावन के दिन मा बड़ा मजा आई
चुनावन के दिन मा बड़ा मजा आई रास्ता कय गदहे भी ओढ़िहैं रजाई चुनावन के दिन मा बड़ा मजा आई कुत्तन का मिलिहै दूध-औ बिस्कुट घोड़न का कच्चा चना-औ तिलकुट खच्चर कय सब होय जाई सगाई चुनावन के दिन मा बड़ा मजा आई चूहा का बिल्ली से निजात दिलाइब बिल्ली का जमकय चूहा खिला...

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बिटिया भई विदा घर सूना हो गया
बिटिया भई विदा घर सूना हो गया हंसते चेहरों का दर्द दूना हो गया पिंजरे में फंस गई उड़ती मुनिया   जिस दिन उसका गौना हो गया -विशाल शुक्ल अक्खड़

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गर्दभ जी का राज चलेगा
मेरी बीवी वंडरफुल मुझको पीटे थंडरफुल मुझको तो वह रोज पीटती जैसे दवा की डोज पीटती सुबह पीटती शाम पीटती रात ढले वह रात रीटती ससुरा मेरा थानेदार लेकर उसका नाम पीटती साला भी तो साला है लेकर उसका अरमान पीटती सासू मां का ज्ञान पीटती साली का गुणगान पीटती पिटते पिट...

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गधा ही रहूंगा
गधा था गधा हूं गधा ही रहूंगा सधा था सधा हूं सधा ही रहूंगा न तोड़ूंगा विश्वास उनका कभी बना था बना हूं बना ही रहूंगा  लादकर बोझ कंधे पर चलता रहूंगा सांझ हो दोपहर मैं तो रमता रहूंगा तुम बनो तो बनो मंत्री या विधायक मैं तो जनता था जनता हूं जनता रहूंगा  -विशाल शु...

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मेरी नैया थी डूबी मंझधार में
मेरी नैया थी डूबी मंझधार में तुम बने थे खेवैया मेरे प्यार में सच से होते ही सामना ऐ सनम चल दिए तुम झूठ के संसार में    -विशाल शुक्ल अक्खड़

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बहुत याद आती है गांव तेरी
बहुत याद आती है मेरे गांव तेरी जब कोई पड़ोसी हाल नहीं पूछता जब कोई बुजुर्ग सवाल नहीं पूछता बहुत याद आती है मेरे गांव तेरी जब कोई आंधी सिर से नहीं गुजरती जब कोई रात बतकही में नहीं बीतती जब गुड्डू कहानी की जिद नहीं करता जब बुढ़ऊ रात भर खो-खो नहीं करता

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हद तो हो गयी हमने कलेजा निकाल रख दिया उनका हुजूम आया और वाह वाह कर चल दिया

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 या तो वक़्त बदलता है या वे लोग  जिन्हें अपनों पर ऐतबार नहीं होता  कुछ ऐसे होते हैं जहाँ में जिन्हें  खुद के सिवा किसी से प्यार नहीं होता

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काश की ऐसी साली होती जैसे आधी घरवाली होती पेट से भरी पूरी सी एकदम दिमाग से वह खाली होती
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