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एक मैं हूँ अब की कोई याद नही करता एक दिन था जब हर कोई मुझ पर था मरता दूरियों को मिटाना रोतों तो हसाना सब मुझ बिन कहाँ मुमकिन था भोर होती तो डाकिया आता था हर घर मैं मेला सा लग जाता
था कहीं किसी का आना कहीं किसी का जाना था सबको ये ख़बरें मेरा काम पहुँचाना था फ...
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एक मैं हूँ अब की कोई याद नही करता एक दिन था जब हर कोई मुझ पर था मरता दूरियों को मिटाना रोतों तो हसाना सब मुझ बिन कहाँ मुमकिन था भोर होती तो डाकिया आता था हर घर मैं मेला सा लग जाता था कहीं किसी का आना कहीं किसी...
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