Shared publicly  - 
 
**
  शीतल पावन गंगा ने ये कैसा उत्पात किया अपने ही भक्तो पर असहनीय आघात किया सब की जुबान पर बस यही शब्द हैं गूंज रहे कितनी हानि हुई कितने लोग गंगा में बहे दर्द हुआ दुःख हुआ और होना भी लाजमी ही था अपने खोये सपने खोये वो भयावह मंजर था कोष रहे सब वर्षा को कभी गंग...
Translate
  शीतल पावन गंगा ने ये कैसा उत्पात किया अपने ही भक्तो पर असहनीय आघात किया सब की जुबान पर बस यही शब्द हैं गूंज रहे कितनी हानि हुई कितने लोग गंगा में बहे दर्द हुआ दुःख हुआ और होना भी लाजमी ही था अपने खोये सपने खोये वो भयावह मंज...
2
Add a comment...