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yayawar
A vagabond, in quest of the eternal truth.
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"मैंने देखा है
कि पिछले कुछ समय से तमाम कोशिशों के बाद भी
खुद को व्यस्त नहीं रख पाया हूँ
इसीलिए दुनिया को अल्हदा नज़रों से देख पाया हूँ
क्या बताऊँ,
पिछले कुछ दिनों से बहुत निठल्ला रहा हूँ
इसीलिए कुछ देख पाया हूँ
इसीलिए कुछ कह पाया हूँ।"

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एक बार फिर
कल कई और यायावर
आएंगे अस्तित्व की खोज के लिए
जो असाध्य है और जो साध्य है, उसे स्वयं करके देखने के लिए
जो प्राप्य है और जो अप्राप्य, उसकी प्राप्ति के लिए
जो धरातल है और जो शिखर है, उसके अंतर को नापने के लिए
जो भूत है और जो भविष्य है, उस अंतराल की समय यात्रा के लिए
जो क्षम्य है और जो अक्षम्य, उसमें लिप्त होने के लिए
जो पुरातन है और जो नूतन है, उसमें खोई कड़ी तलाशने के लिए
जो ज्ञात है और जो अज्ञात है,
जो असतत है और जो अविरल है,
जो क्षुद्र है और जो विराट है,
जो श्वेत है और जो श्याम है,
जो क्षणभंगुर है और जो स्थायी है,
जो निम्न है और जो उच्च है,
जो प्रत्यक्ष है और जो परोक्ष है,
जो है और जो होगा, उस सबको मिलाने के लिए
कल कई और यायावर आएंगे
और कहेंगे
मैं हूँ,

http://www.yayawar.in/2015/10/ek-baar-fir.html
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बड़े खुलूस से भेजा उन्हें जश्न-ए-बर्बादी का बुलावा
कदम चलते रहे, वो खुद को रोकते रहे रात भर

अदाओं की दिलकशी को मोहब्बत समझ बैठे थे
उसी मोहब्बत की आग में फिर जलते रहे रात भर

मेरा फसाना बज़्म में सुनने के कहाँ काबिल था
वो अपना दर्द-ए-दिल ही बयाँ करते रहे रात भर

ठुकराते रहे ज़िंदगी भर मोहब्बत की मेरी पेशकश
वफ़ा खोजते हैं अब मुसल्सल, बेवफाओं में रात भर

http://www.yayawar.in/2013/06/raat-bhar.html
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....तब मन में तीसरा ख्याल आता है 
कि कहानी को मध्यमार्गी बनाया जाये 
थोड़ा सुख थोड़ा दुःख मिलाया जाये 
सबको दोनों से थोड़ा थोड़ा परिचित कराया जाये 
तब मन में विद्रोह के स्वर उभर आते हैं 
कि ये कहानी कोई कूटनीति का मैदान थोड़े ही है 
जहाँ पर दोनों पक्षों को खुश करने से 
मेरी सफलता का आंकलन होगा 
कि ये कोरा कागज़ कोई वो जगह तो नहीं है 
जहाँ मैं समझौते के बीज बोऊंगा 
मैं लिखूंगा तो अपने मन की बात लिखूंगा 
और मैं फिर से वहीं आ जाता हूँ
जहाँ से हर बार शुरू करता हूँ 
फिर से कलम कहानी की शुरुआत के लिए प्रयासरत है 
और मन कहानी के अंत में व्यस्त है । 

http://www.yayawar.in/2014/09/kahani-ka-ant.html
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कल रात मन-सत्ता शून्य में विलीन
अवचेतन वृत्तिहीन सुख-दुःख हीन
क्यों न इस बात पर हो चिंतन-मंथन
गीत का उद्द्येश्य सोच रहा अकिंचन
महलों में गाये जाने को क्यों ये गीत
दरबारी कविता को क्यों मानूं मैं गीत
विलास पर गीत करे क्यों अभिमान
मंदिरों में क्यों गाया जाये यह गान
पराजित के मन में आग लगा दे जो
सुप्त जन-मानस को आज जगा दे जो
समर में चिंगारी धधक जला दे जो
अधरों पर आये तो सत्ता-शीर्ष हिला दे जो
लड़ जाने का हो जिसमें प्रकट सन्देश
दूर रहे जहाँ शांति का मिथ्या उपदेश
जहाँ न बहता हो रक्त रगों में पर आग
रणभेरी बजे, हर स्वर गाये वह वीर राग
धराशायी को द्वन्द-मध्य उठा दे गीत
इतना सब हो तब मानूं मैं कि वह गीत
क्षमाप्रार्थी नहीं मैं, हो यदि तो निंदा हो
किसी को खुश करने के लिए नहीं
लिखो इसलिए क्योंकि तुम जिंदा हो ।

http://www.yayawar.in/2015/08/kyonki-tum-zinda-ho.html
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"इतने सालों में वो क़सम
गिरते-पड़ते, रगड़ खाते
ज़िन्दगी की तमाम घटनाओं के बीच
किसी कोने में तन्हा सी पड़े-पड़े
आज दम तोड़ रही थी,
उन दोनों ने और बहुत सी कसमें याद की
जो आज बदलाव की आंधी में
ना जाने कहाँ भटक गयीं थी,
जिन्हें ढूंढकर लाना भी अवांछित सवालों को बुलावा देना था,
दोनों ने सोचा कि इस संसार में कुछ भी स्थायी कहाँ रहता है"

http://www.yayawar.in/2015/07/qasam.html
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पहचान को तरसती रही कसमसाती रही
लेकिन चलती रही चार दिन की ज़िंदगानी...
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शान-ए-चमन बनूँ गुल की बस यही आरज़ू थी यायावर
हवा का झोंका आया गुल को शाख से जुदा कर दिया
#hindipoetry   #kavya  
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Remembering Swami Vivekananda on his birth anniversary:

"To succeed, you must have tremendous perseverance, tremendous will. “I will drink the ocean”, says the persevering soul; “at my will mountains will crumble up”. Have that sort of energy, that sort of will; work hard, and you will reach the goal."

#swamivivekananda  
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इसी ज़मीं पर जीना इसी पर खाक होना
इंसान को कहाँ मयस्सर है आज़ाद होना
http://www.yayawar.in/2014/12/aazaadi.html
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