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Sunny Kumar
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A Learner, EduTech Facilitator, Tech Savvy, Content Writer, blessed with political mind and Poet's heart. Tasted failures and fighting for survival.
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जब भी मन अशांत होने लगता है, भावनाओं का तूफ़ान मन को डुबोने लगता है, चुपके से मन को कागज के नाव पर स्याहियों के सहारे उतार लेता हूँ, मन को खरोच तो आती है और विस्थापित होने का डर भी बराबर होता है पर फिर तूफान शांत होने के बाद कागजों के उस नाव से पुनः मन को उसकी दुनिया में छोड़ देता हूँ। अब इन तूफानों का डर नही सताता चुकी ये हर बार कुछ सीखा जाती है पर प्रार्थना करता हूँ की कलम की स्याही, कुछ सादे पन्ने के नाव और ये बचाव का हुनर हमेशा साथ रहे, और हर तूफान के बाद मन पुनः शांत रहे।

Account of A Lover. Dedicated to all unlucky lovers who are living with memories..
कुछ यादों का है कर्ज,
कुछ वायदें उधार है,
कुछ  बेमेल हसरतें भी दर्ज,
कुछ खो गए ख्याल है,
कुछ लम्हों का लिखा हिसाब,
जहाँ हर लम्हा, बेहिसाब है।।

कुछ शर्तों का भी उल्लेख,
कुछ उम्मीदों के अवशेष,
कुछ मर्यादाओं के जिक्र,
कुछ कल को लेकर फिक्र,
कुछ सपनों का बुना जहाज,
जहाँ खुशियाँ अथाह है।।

कुछ प्यार के है पैगाम,
कुछ हो गए लम्हें बेलगाम,
कुछ तारीफों के फूल,
कुछ छोटी छोटी भूल,
कुछ भरोसे से होता भोर,
जहाँ उमंगें असीम है।

कुछ लालसाओं के चादर,
कुछ अलग अलग सी बात,
कुछ दायित्वों के बोध,
कुछ में औरों के भी बोझ,
कुछ अलग हो रही मंजिल,
जहाँ टूटे सब ख्वाब है|
-सन्नी कुमार


आप हमारे ब्लॉग से हमारी और भी कवितायें पढ़ सकते है.  मेरा पता है sunnymca.worspress.com

तारीफें उनकी हो जिन्होंने भाव बख्शे दिल को थे,
तारीफें उनकी हो जो मिलकर ख्वाब बुनते अक्सर थे,
हम थे क्या बस एक जिन्दा दिल, जो धड़कना जानता था,
हम थे क्या बस जागे नयन, जो ख्वाबों को जीना जानता था.

तारीफें उन एहसासों की जो कागज़ पर उकड़ना थी जानती,
तारीफें उनके काजल की जो स्याही में बदलना थी जानती,
हम थे क्या बस एक चंचल कलम जो अलफ़ाज़ सजाना जानता,
तारीफें हो इश्क की जो बिन पंखों के उड़ना सीखाना जानता.

ढूंढ लाते हम उनको गर वो खो जाते,
पर बदले लोगों को ढूंढना नही आता..
दिल हो गर मायूश तो मना भी लें,
पर टूटे दिल को मनाना नही आता…

आज फिर बीत गया ‘कल की यादों’ में,
पर गुजरे लम्हों में रुकना नही आता…
वो सारे पल जो बीते, खुशनसीबी के थे,
पर बीते पलों को फिर से जीना नहीं आता..

वो कोरे सारे ख्वाब जो टूटे थे कल,
उनको आंसुओं से धोना नही आता.
दिल माफ़ करे अब उनको न याद करें,
पर दिल पर जोर करना भी हमको नहीं आता..
-सन्नी कुमार
http://wp.me/p2fA1F-JB

एक बेहतर अंत की शुरुआत..
[A Tale of Unfortunate Heart Who Failed to keep his feelings in a right way.]

जो मिला मुझे वह नियती थी,
नहीं उसमें किसी की गलती थी,
दिल था ‘बेचारा’ बेचैन हुआ
आखिर हसरत इसकी अधूरी थी.
चीखा, चिल्लाया, दफ़न हुआ,
बस इसकी, इतनी ही अवधि थी..

आँखों के आंसू तब सूखे थे,
शायर के बोल भी टूटे थे.
दिल की बेचैनी आँखों में,
जब सामने हालातों के सौदागर थे..

वो इश्क नही, था ख्वाब मेरा,
जिसको नादान ने तोड़े थे,
होती बेदर्दी हुस्न के पीछे,
उस रोज रहस्य जाने थे..

छुप-छुप कर मिलने वाले सपने,
उस रोज में चुप्पी साधे थे,
दिल की तड़प में मरने वाले,
सारे जज्बात नदारथ थे.

दिल फिर भी हालातों संग,
अब रोज नयी कोशिश में था,
कभी उसके चाहत में रोये,
कभी उसकी बिछुड़न में..

वादे जिसने थे सारे तोड़े,
बेशर्म उसी को, अब भी थामे था.
जो बची थी उम्मीद, जल्द ही दफ़न हुयी,
आया संदेशा, वो किसी और की हुयी..

था बाजार सजाकर व्यापार हुआ,
दिल के ख्वाबों का मोल-भाव हुआ,
जो खुमार खुद्दारी का भरता था,
वही दिल उस रोज नीलाम हुआ..

न हसरत थी उसकी हथियाने की,
न जबरदस्ती कभी बतियाने की’.
फिर क्यूँ सौदा उसके पीछे हुआ,
अब दिल को ‘बिल'(दिलबर) से खेद हुआ.

दिल लगा पूछने बिल से उसके हालात,
कर गया क्या वो गलत सवालात,
पूछ लिया मोल जोल की शर्तो को,
अपने नीलामी के वचनों को..

हुयी गुस्सा बिल, धिक्कारी भी,
समझाया, हालातो का हल्ला भी.
पर दिल को कुछ आया समझ नहीं,
अब वो पूछे सबसे,
क्या भावों का कोई मोल नहीं..?

अपनों से दूर जो सपना लाया ,
उसकी हसरत ने नफरत भिजवाया.
ख्याल रहा नही तब ख्वाबों का,
न मर्यादाओं, न ही नातों का..

लूट चूका था दिल और दिलबर,
सौदा हुआ था सपनो का.
संबंधो का फाँस लगाकर,
झूल गया था दिल का दिलबर९(बिल)..

नाराजगी दिल को बिल से थी,
और उतनी ही बिल को दिल से भी,
बिल कोसे अपने हालत को,
और दिल बिल के जात को..

दिल जिद्दी और जज्बाती था,
खुद रोता उसे भी रुलाता था.
हुआ दिल था तन्हां, बिल नहीं,
इस बात का उसपर असर नही..

बिल इस बात को लेकर चिंतित थी,
कहीं दिल खोले सारे भेद नहीं.
कल के फरेब के किस्सों से,
हो प्रभावित कहीं आज नहीं..

बिल कहती ‘अब मज़बूरी है’,
पर दिल पूछे क्यूँ तब दुरी थी,
जब बाँटा हमने राजों को था,
साँझा हमारा एक सपना था,
क्यूँ तब तुमने खुद्दारी बेचीं थी,
क्यूँ कोड़े ख्वाब दिखाए थे,
झूठे वादों में भरमाये थे,
बेच आयी मेरे सपनों को,
कहती हो मज़बूरी है..

बिल हुयी नाराज, दिल खूब था रोया,
जिंदगी ने जान को बड़ा थकाया..
बिल के हालत बिल ही जाने,
जो उसने दिल से अब और न बांटे.

यदा कदा ही वो अब मिलती दिल से,
देती थी मर्यादाओं के सीख.
उसको दिल से एक नयी शिकायत,
क्यूँ लिखता है वो कल की तारीख.

अपनी पुरानी यादों से दिल,
अब नए दिन को काला करता था,
बिल का दिल से आखिरी संवाद,
सीखे जीवन से और बढे वो आगे..

जो नसीहत बिल ने दी थी,
वही सब ने भी दुहराया दिल से.
पर आगे की कैसे सोचे दिल आशिक,
जो उसका अक्श है पीछे छुट गया..

सही गलत का रहा अब दिल से मेल नही,
जिंदगी लगे अब बोझिल, कोई खेल नहीं.
पर करता क्या दिल तन्हां था,
मर मर कर रोज में जीता था..

कभी रोता कभी खुद से सवाल वो करता,
कभी पढता किताबें, कभी लिखता रहता,
कभी शक करता, कभी संवाद की कोशिश,
कभी खुद को ही ख़तम करने की साजिश,
पर कुछ भी पहले से आसान न था,
अपनों का दिल पे ध्यान जो था.

दिन जल्दी ही फिर मौन के आये,
दिल अन्दर ही अन्दर गौण हुआ,
था इश्क किया, बिना शर्त रखे,
अब कैसे वो कोई बात कहे,
ना कोई कागज़ न कोई समझौता था,
दिल ‘डील’ के युग में हार गया,
शायद बिल भी अपनों में मारी गयी,
और ये रिश्ता धीरे धीरे पर दफ़न हुआ…

तभी शोर हुआ ‘बाहर बारिश आयी’,
ओह्ह तो मैं सपनो में उलझकर बैठा था,
अच्छा हुआ, जो देखा, बस एक सपना था,
बच गया दिल और इश्क की साख,
पर सच है, सीख बड़ी प्यारी सी थी..

समझ रहा मैं दिल के भावों को,
और रिश्तों में उम्मीदों को,
जो ख्वाब ने दिखाया एक अंत ही था,
पर हौसले कह रहे मुझसे आज,
यही एक बेहतर अंत की शुरुआत..
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दिनों बाद कल फिर कोई ,
ख्वाब आया था,
पहली बार अपना-सा कोई,
अजनबी आया था.

स्पष्ट सबकुछ मुझे याद नहीं हैं,
पर ओढ़े धूल का चादर,
और आँखों में सवालों का सैलाव लिए,
वो मुझसे मिलने आया था..

उसमें अपनापन की खुशबू तो थी,
पर उसका ‘बेरंग’ चेहरा था अंजान।
पूछा जब मैंने परिचय उससे,
बोल बैठी बेशरम “हूँ जिन्दगी तुम्हारी जान“

झुंझला गया था सुनकर उसको,
जो उसका मतलब समझ ना आया था,
दिल ने रोक लिया मुझे बेहूदगी करने से,
शायद इसने उसके चहरे पर दर्द को भांपा था..

फिर पूछ लिया मैंने उससे उसके, बे-निमन्त्रण आने का कारण,
हो गुस्सा इस बार वो बोली,
“हर बार तुम्हीं क्यूँ पूछोगे, क्या औरों को यह अधिकार नहीं?”
दे देता उसके प्रश्नों का उत्तर,
कि ख्वाब मेरा और यहाँ तुम हो आयी,
सो इस लिहाज़ अधिकार गंवाई,
मै बोलूं उससे अपने मन की बात,
इससे पहले ही थी शुरू वो “जात”..

वो बोली “तो सुनों मैं क्यूँ तुम्हारे ख्वाब में आयी”
कभी अपने ख़ुशी के लम्हों को तुमने,
संग मेरे सजाया था,
विरह-विदाई की बेबसी को तुमने,
संग मेरे ही बांटा था,
पर ना जानें क्या गलती हुयी हमसे,
तुम मिलने भी अब नही आते हो,
कभी छुपाते थे हमको दुनिया से,
आज तुम ही हमसे छिपते हो.
दिन वो क्यूं जल्दी बीत गया,
जब तुम मुझको राज़दार बनाते थे,
हसरतों की हस्ताक्षर कह,
मुझसे लाड़ जताते थे.
खुश होती थी उस खेल में मैं,
जब औरों को तुम मुझ-खातिर तरसाते थे.
कभी तुमको भी होती थी शिकायत,
की अक्सर लोग बदल जाते है,
आज जो बदले हो तुम खुद को,
तो फिर क्यूं चुप्पी साधे हो?
मै तुम्हें गुज़रें लम्हों में,
और नहीं उलझाने आयी,
जो जाना था कभी मैंने तुमसे,
आज वही तुमसे दुहराने आयी.
मत दबाओ ज़ज्बातों को तुम,
ना ख्वाबों को बेड़ी डालों,
निकलो बाहर डर/गम के क़ैद से तुम,
अपने दायित्वों को पहचानों।
पूरे करो अधूरे ख्वाबों को,
या नए सपने सजा लो,
पर न करो मलाल उसपे जो बीत गया,
कि अब आनेवाले मौकों को पहचानों।।
-सन्नी कुमार

http://sunnymca.wordpress.com/category/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

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दिनों बाद कल फिर कोई ,
ख्वाब आया था,
पहली बार अपना-सा कोई,
अजनबी आया था.
स्पष्ट सबकुछ मुझे याद नहीं हैं,
पर ओढ़े धूल का चादर,
और आँखों में सवालों का सैलाव लिए,
वो मुझसे मिलने आया था..
उसमें अपनापन की खुशबू तो थी,
पर उसका ‘बेरंग’ चेहरा था अंजान।
पूछा जब मैंने परिचय उससे,
बोल बैठी बेशरम “हूँ जिन्दगी तुम्हारी जान“
झुंझला गया था सुनकर उसको,
जो उसका मतलब समझ ना आया था,
दिल ने रोक लिया मुझे बेहूदगी करने से,
शायद इसने उसके चहरे पर दर्द को भांपा था..
फिर पूछ लिया मैंने उससे उसके, बे-निमन्त्रण आने का कारण,
हो गुस्सा इस बार वो बोली,
“हर बार तुम्हीं क्यूँ पूछोगे, क्या औरों को यह अधिकार नहीं?”
दे देता उसके प्रश्नों का उत्तर,
कि ख्वाब मेरा और यहाँ तुम हो आयी,
सो इस लिहाज़ अधिकार गंवाई,
मै बोलूं उससे अपने मन की बात,
इससे पहले ही थी शुरू वो “जात”..
वो बोली “तो सुनों मैं क्यूँ तुम्हारे ख्वाब में आयी”
कभी अपने ख़ुशी के लम्हों को तुमने,
संग मेरे सजाया था,
विरह-विदाई की बेबसी को तुमने,
संग मेरे ही बांटा था,
पर ना जानें क्या गलती हुयी हमसे,
तुम मिलने भी अब नही आते हो,
कभी छुपाते थे हमको दुनिया से,
आज तुम ही हमसे छिपते हो.
दिन वो क्यूं जल्दी बीत गया,
जब तुम मुझको राज़दार बनाते थे,
हसरतों की हस्ताक्षर कह,
मुझसे लाड़ जताते थे.
खुश होती थी उस खेल में मैं,
जब औरों को तुम मुझ-खातिर तरसाते थे.
कभी तुमको भी होती थी शिकायत,
की अक्सर लोग बदल जाते है,
आज जो बदले हो तुम खुद को,
तो फिर क्यूं चुप्पी साधे हो?
मै तुम्हें गुज़रें लम्हों में,
और नहीं उलझाने आयी,
जो जाना था कभी मैंने तुमसे,
आज वही तुमसे दुहराने आयी.
मत दबाओ ज़ज्बातों को तुम,
ना ख्वाबों को बेड़ी डालों,
निकलो बाहर डर/गम के क़ैद से तुम,
अपने दायित्वों को पहचानों।
पूरे करो अधूरे ख्वाबों को,
या नए सपने सजा लो,
पर न करो मलाल उसपे जो बीत गया,
कि अब आनेवाले मौकों को पहचानों।।
-सन्नी कुमार

http://sunnymca.wordpress.com/category/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

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अब शब्दों पर यक़ीन नहीं होता,
और वक़्त पर ऐतबार,
पर आँखों में सपने, अब भी जागे है,
और तुमसे ही आखिरी उम्मीद।

माना दूर गया था,
तुमको छोड़,
रुसवाइयों में मैं मुँह मोड़,
पर सच है, तब मै भी रोया था,
क्यूंकि तब ख्वाब, मेरा भी टूटा था।

अब वक़्त नहीं, न हालात है वो,
हूँ शर्मिंदा पर दोस्त(उम्मीद) हो तुम,

जो चाहे सजा दो तुम,
पर अब अपनी रज़ा दो तुम,
थक गया हूँ भाग-भाग कर,
तुम संग सिमटने की,
अब नियत दो तुम..

बस कहना है तुमसे और सुनना है तुमको,
कि क्या रिश्तों में है एक गलती की गुंजाईश?
कहो क्या तुम अब भी मेरी हो,
की क्या उन सपनों को सच करने की है कोई गुंजाईश?


http://wp.me/p2fA1F-Gz
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