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Hindi Short Stories & Poems
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#Hindi Love Poem "आशिक"
आशिक

तर्ज-ए-ताजमहल
एक यादगार बनाने की
ख्वाहिश थी

ना जुदार्इ थी
ना जमीन थी
ना यमुना नदी

किराये के एक कमरे में
चार बच्चों के संग
मेरी मुमताज थी

पैसों की तंगी थी
रोज की खिटपिट संग
गिले-शिकवे थे

ना कब्र थी
ना संगमरमर
ना गम-ए-जुदार्इ

मैं शाहजहाँ तो बन ना सका
पर खुदा गवाह
मैं आशिक
दिवाना था
अपनी मुमताज का

कुमुद

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A name which truly defines the motive!!
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Sphuling.com wishes you a Happy Valentine's Day!!


आशिक

तर्ज-ए-ताजमहल
एक यादगार बनाने की
ख्वाहिश थी

ना जुदार्इ थी
ना जमीन थी
ना यमुना नदी

किराये के एक कमरे में
चार बच्चों के संग
मेरी मुमताज थी

पैसों की तंगी थी
रोज की खिटपिट संग
गिले-शिकवे थे

ना कब्र थी
ना संगमरमर
ना गम-ए-जुदार्इ

मैं शाहजहाँ तो बन ना सका
पर खुदा गवाह
मैं आशिक
दिवाना था
अपनी मुमताज का

कुमुद

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आ बैल मुझे मार

आज वह नहीं आएगी क्या? इस सोच मात्र से ही स्मिता के हाथ पैर शिथिल होने लगते हैं। धप् से सोफे पर बैठ जाती है वह।

मीनू को स्कूल भेजने से लेकर संजय के ऑफिस के लिए निकलने तक तो, उसने किसी तरह काम संभाल लिया। अब बिखरे पड़े घर को देखकर मानो उसका दम घुटने लगा।

तब ही कॉलबेल की आवाज सुन फुर्ती से उठकर दरवाजा खोली वह। चेहरे पे अजीब सी थकान लिये फुलमनी ही खड़ी थी। Read Full @ http://www.sphuling.com/short-stories-in-hindi-aa-bayl-mujhe-maar/

“इतनी देर लगा दी?” ना चाहते हुए भी स्मिता के स्वर में झुंझलाहट झलक ही जाती है।

फुलमनी रूआँसी सी होकर बोलती है। “कल रात अचानक छोटीवाली बेटी के पेट में दर्द होने लगा था। सुबह सदर अस्पताल में
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आशिक

तर्ज-ए-ताजमहल
एक यादगार बनाने की
ख्वाहिश थी

ना जुदार्इ थी
ना जमीन थी
ना यमुना नदी

किराये के एक कमरे में
चार बच्चों के संग
मेरी मुमताज थी

पैसों की तंगी थी
रोज की खिटपिट संग
गिले-शिकवे थे

ना कब्र थी
ना संगमरमर
ना गम-ए-जुदार्इ

मैं शाहजहाँ तो बन ना सका
पर खुदा गवाह
मैं आशिक
दिवाना था
अपनी मुमताज का

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समोसे की अभिलाषा
एक बड़े से कड़ाही में समोसे तले जा रहे थे। उनमें से एक समोसा अपने रंग-रूप में निखार आने से बहुत खुश था। वह उबलते तेल में से फुदक-फुदक कर इधर उधर देख रहा था।

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कुत्ता काटता भी है

भले ही अपने बेटे-बहू, पोते-पोती का गुणगान ना करे, पर अपने-अपने कुत्ते का महिमागान गाते बिल्कुल भी थकते नहीं, ऐसे बहुत सारे महाशया तथा महाशयां को जानता हूँ मैं।
पर मेरे पड़ोसी शर्माजी का क्या कहना-बल्ले!बल्ले!
एक शाम कुत्ते के संग उन्हें गली में टहलते देख,मैंनें पूछ क्या लिया-‘‘कुत्ते को पॉटी कराने निकले हैं क्या?’’ मेरी तो शामत ही आ गयी!
‘‘-मुँह संभालिये विवेकजी, खबरदार जो आइंदा इसे कुत्ता कहा। इसे नाम से पुकारा किजिए! इसका गुडनेम भानुप्रिया और निकनेम लिलि है। और अच्छी तरह जान लिजिए, लिलि इधर उधर ऐसा-वैसा कुछ भी नहीं करती है।’’
शर्माजी के कथन में ‘‘ऐस-वैसा’’ का तात्पर्य मेरी समझ से परे था। मैंनें उनकी कुतिया को बदचलन तो कतई नहीं कहा था। खैर…!
शर्माजी ने आगे कहा -“लिलि वाकायदा टॉयलेट में पॉटी करती है।”
मेरी भृकुटि का तनना स्वाभाविक ही था। वे मुस्कुराये, आश्चर्य हो रहा है न? वह फ्लश भी दबाना कभी नहीं भुलती। विश्वास ना.....

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भगवान दुःखी थे। अतः कुछ दिनों से कामकाज में उनका मन नहीं था। और भक्तों के आवेदन की फाइलों का पहाड़ उँचा होता जा रहा था।
भगवान हैं तो क्या? ईश्या से परे तो नहीं! वे भी ख्यातिसम्पन्न और प्रभावषाली हैं। उनके इस प्राचीन मंदिर में भीड़ कोइ...
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कयामत कैसे आयी, कैसे गुजरी, किसी को पता नहीं था। एक जगह एक मनुष्य, एक कुत्ता, एक गाय, एक कौआ और एक साँप जीवित बचे हुए थे। उन सभी में आपस में सलाह मशविरा हुआ, क्यों न....
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