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रौशन जसवाल विक्षिप्‍त
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कबिरा खड़ा बजार में मांगे सब की खैर । ना काहू से दोस्ती न काहू से वैर ॥
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कैसी लोहड़ी कैसा उत्सव
कैसी लोहड़ी कैसा उत्सव गुम अपने और चुप है सब लोहड़ी गाना और मांगना लोहड़ी किस्से कहानियों की बात है अब अपने अपने दड़बों में दुबके हैं अपनी बात अपनी सौगात है अब
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इक दिन होना है
ये तो इक न इक दिन होना है, खेत नऐ रिश्‍तों का अब बोना है। नियम कायदे सब, है मेरे लिए, बाहरी आदमी हॅू मुझे बस कोना है। देख के हाथों की आड़ी तिरछी लकीरे, कहा उसने, इससे भी बूरा होना है।  आंखों के कोनों से बहता रहता है पानी, यही सरमाया है, यही तो मेरा सोना है...
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प्रवृति
मानव अपनी सोच की आंतरिक प्रवृति को बदल कर अपने जीवन के बाहरी पहलुओं को बदल सकता है।
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सुन्दर
तुम सहते जाना
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सुन्‍दर कविता
वक्त
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सृजनात्‍मकता
बौद्धिकता और आनन्‍द का संगम ही सृजनात्‍मकता है। -- अल्‍बर्ट आईस्‍टीन
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ठोकर
हमेशा छोटी छोटी गलतियों से बचने की कोशिश करनी चाहिए क्‍योंकि इंसान पहाड़ों से नहीं पत्‍थरों से ठोकर खाता है। -- सुक्ति
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