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रौशन जसवाल विक्षिप्‍त
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कबिरा खड़ा बजार में मांगे सब की खैर । ना काहू से दोस्ती न काहू से वैर ॥
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दीवारों से बतियाना
मां अक्सर बातें करती थी दीवारों से अकेले ही, कभी समझा नहीं मां का बतियाना दि दीवारोंसे, आज समझा हूँ  होता क्या है अकेलापन और एकटक दीवारों को देखना, दीवारों से बतियाना, एक उम्र के बाद लगता है अच्छा एकाकी दीवारों को एकटक देखना और उनसे अकेले बतियाना।
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शब्द
खो गए हैं कुछ शब्द मेरे जो है मेरे समीप रहते थे आसपास मेरे ही, कहना चाहता हूँ ढेरों कहानियां कविताएं कुछ आपबीती और कुछ जगबीती परंतु वो शब्द खो गए हैं, ढूंढता रहता हूं उन्हें कहीं तो होंगे ही मिलेंगे जरूर , गई ये आस, तब मैं शामिल हो जाऊंगा तुम्हारी महफ़िल में...
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कैसी लोहड़ी कैसा उत्सव
कैसी लोहड़ी कैसा उत्सव गुम अपने और चुप है सब लोहड़ी गाना और मांगना लोहड़ी किस्से कहानियों की बात है अब अपने अपने दड़बों में दुबके हैं अपनी बात अपनी सौगात है अब
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