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Ravishankar Shrivastava
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टैक्नोक्रेट, सॉफ़्टवेयर स्थानीयकरण विशेषज्ञ, संपादक, लेखक। Software Localization Expert, Writer, Editor, Ex-Technocrat, Freelance Translator, Technical Consultant,
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बड़ा सा कुआँ चारों ओर भीड़, बाल्टियों के छप-टप की आवाज लाख की चूडियों के स्वरों का साथ दे रही थी। बाहर घड़ो को राख से माँजती, चमकाती स्त्रियों की बातें हँसी-ठट्ठे, कोलाहल ही कोलाहल। कुएँ के किनारे दो ओर घिर्री लगी थी बाकी पत्थर की सिल्लियाँ थी जिन पर रस्सियों के निशान गहरे हो चले थे। मस्ती में डूबी रमणियों की रस्सी और बाल्टी भी मस्ताती ऊपर आती, छलक-छलक आधा पानी बिखेरती हुई। तो धीर गंभीर गृहिणियों की बाल्टी सीधी चाल से चलती, पूरी भरी हुई किनारे लगती। कुआँ कई घटनाक्रम को अपने कानों से सुनता......... कभी बीती रात के प्रणय संवाद की खिलखिलाहट से मुस्काता, तो कभी सास-ननद की प्रताड़ना से भरे प्रसंगों पर रूँआसा हो जाता। तो कभी वह माँ के आगे-पीछे डोलते छोटे बच्चों के सिर पर रखे लोटे को देख स्वयं को धन्य मानता और कभी बिवाइयों से फटे पैरो को देख गाँव से कुएँ तक के मार्ग पर अफसोस करता। उषा काल से चली रस्सियाँ दिन चढ़ने तक लहलहाती थी उसकी भुजाएँ बनकर, इधर दोपहर बीतते ही गोधूलि तक। लौटते जानवर और पनहारियाँ दोनों ही उसे एक जैसे लगते..... अपने अपने घर को छूने की ज़िद में, दिन की पूर्णता पर विराम लगाते हुए। रात्रि के अंधकार में वह स्वयं को अकेला पाता। कभी-कभी आते-जाते यात्री पास खड़े पेड़ों के नीचे रात्रि विश्राम किया करते थे।



कुएँ से करीब 200-250 फुट दूर पत्थरों की आधी अधूरी दीवारें थी। नीचे पडे़ पत्थरों पर अस्पष्ट संरचना बनी थी। आसपास खूब झाड़ियाँ; बेल-लता ऊग आयी थीं। बड़े-बूढे़ उसे नागदेवता का वासा बताते तो कभी पुराना श्मशान कहते। वहाँ शायद कोई न जाता था। हाँ, मवेशी उन दीवारों से रगड़-रगड़ कर रक्तपिपासु जोकों और जुओें को मारा करते थे।

पनिहारियों में एक थी स्वरूपा। सामान्य कद-काठी, माँसल अंग-प्रत्यंग, उन्नत ग्रीवा, तीखे नयन। चारों ओर घूमकर फिर नजर वहीं जम जाए, इतना आकर्षण था उसमें। बोली भी वैसी ठहरी हुई, गंभीर। विधाता ने ऐसा चेहरा गढ़ा था जो उसकी सरल दृष्टि ही अहंकारी प्रतीत होती थी। काम से काम, मतलब से मतलब। यही कारण था कि उसके यहाँ आते ही बराबर उम्र वाली कानाफूसी करती। तो वहीं प्रौढ़ा उसे भरी नजरों से देखती थी। वह सभी की अनदेखी करती। घड़ो को भर करबचे हुए पानी को अल्हड़ सखियों के घड़े में उड़ेल देती। नातने को मरोड़ कर झटक कर घड़े पर ढक देती। दो सीढ़ीनुमा पत्थरों को पार कर पहला घड़ा तो कुशलता से शिरोधार्य कर लेती पर हाँ दूसरे छोटे घडे़ के लिए किसी की मदद लेती।

आज दूसरा घड़ा सिर पर रखते हुए गणेश की माँ ने उसका हाथ देखा- ’’हाय राम क्या हुआ बहू कैसे जली?’’ प्रश्न को अनसुना कर पलटती स्वरूपा को रोक लिया गणेश की माँ ने। स्नेह स्पर्श और मधुर वाणी से स्वरूपा को कण्ठ अवरूद्ध हो आया, थूक का घूँट भर कर बोली ’’काकी वो तेल उलट गया कल रात, जल्दी में थी ना। कड़मह से ध्यान हट गया था।’’ पर कुशल काकी का ध्यान तो नहीं हटा था उसने चेहरा पढ़ लिया था इस हतभागिनी का। फिर आँखों की गीली कोर भी बहुत कुछ कह गई। कुछ महीने पहले ही तो डोली आई थी इसकी। भला इतनी जल्दी कोई बहू को कुएँ की जगत छुआता है। सुंदर सुशील स्वरूपा को मिला भी तो कैसा वर-शंकालु, गुस्सैल, लम्पट बंसी। कभी रामसत्ता में आने दे, न बुलावे में जाने दें।

घर से निकलते दस बार माँ से कहेगा ध्यान रखना, मैं जा रहा हूँ। माथे पर अकारण चढ़ी भौंहें, कभी नीचे नहीं उतरती थी। खाने की थाली पर बैठ, नियम से सब्जी भाजी के नुक्स निकालता, सुबह तेज मिर्च की माँग तो शाम को कम मिर्च डालने का आदेश करता। स्वरूपा भयभीत मृगी सी आँखें फाड़े पूरे यत्न से बंसी के अवांछित आदेशों की पालना करती, पर फिर भी पति के मुँह में ठूँसी गालियाँ उसके कानों को प्रतिदिन छूती और देखते देखते हाथ भी छूने लगे।

सास थी पर मूकदर्शा- ’तू जाने और वो जाने’ का वेदवाक्य उसके सभी कर्त्तव्यों पर विराम लगा देता। स्वरूपा समझ नहीं पाई कि माँ, पुत्र की दृष्टि में प्रतिष्ठित होना चाहती थी या पुत्र माँ की दृष्टि में। उसे प्रति दुर्व्यवहार कर, बंसी माँ को रिझा रहा था कि देख माँ मैं ’जोरू का गुलाम’ नहीं। और माँ पुत्र को अप्रत्यक्ष सहमति देकर स्वयं की स्वच्छ छवि बना रही थी। छोटे भाईयों की बड़ी बहन स्वरूपा, घर गृहस्थी को तो तब से संभाले थी, जब उसकी सखियाँ कपड़ों से बने गुड्डे-गुड़िया खेलती थी। माँ की कमी ने उसे समय से पहले ही जग पारखी बना दिया। देहरी लाँघते समय पिता ने कहा था ‘‘चार जनों में कोई मुझे अंगुली उठाके तेरा पिता कहे ऐसा कभी न होने देना।’’ यही बात गाँठ बाँधे वो जी रही है फिर माँ का स्नेह झरना रिसता होता तो जीभर प्यास बुझाती। पिता ने तो उसके हाथ पीले कर उसके साथ-साथ मानो उसके दुःख दर्दों से ही दूरी बना ली। माँ की कभी कुछ हद तक मौसी ने भरी थी पर अब तो पिता और मौसाजी की बैरता में वो भी दूर हो चली। आगे पूरा पढ़ें>>>

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जावेद अख़्तर का यह कविता संग्रह अपने आप में नायाब है. कुछ-कुछ प्रायोगिक किस्म का. इसे कविता की कॉफ़ी टेबल बुक भी कहा जा सकता है. जावेद अख़्तर की कविताई का आनंद कविता के साथ-साथ तारतम्य बिठाती कलाकृतियों से कई गुना बढ़ जाता है. कलाकृतियाँ कविता-पोस्टर की याद दिलाती हैं. कई शहरों में पहले इस तरह के आयोजन हुआ करते थे - कविता चौराहे पर, जहाँ कविताओं के साथ कलाकृतियों की जुगलबंदी बिठाई जाती थी. परिकल्पना अरविंद मण्डलोई का है, रेखांकन मुकेश बिजौले, कैलिग्राफ़ी अशोक दुबे और ग्राफ़िक्स पवन वर्मा का है. पुस्तक हर मामले में नायाब और नंबर 1 है.

मंजुल प्रकाशन से प्रकाशित यह किताब इस मामले में भी नायाब है कि इसके विक्रय से प्राप्त रॉयल्टी की रकम का उपयोग उपेक्षित-वंचित बच्चों के शिक्षण-प्रशिक्षण आदि में खर्च होगा. मंजुल प्रकाशन का यह प्रयास स्तुत्य है.

अपने बुकशेल्फ में रखने लायक एक जरूरी किस्म की किताब. कुछ पन्नों को समीक्षा स्वरूप नीचे स्कैन कर प्रस्तुत किया जा रहा है. स्वयं अंदाजा लगाएँ -

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एक बढ़िया, मनोरंजक कहानी - राजपूतानी -
अपने दोनों किनारों से छलकती रुपेण नदी बरसात के दिनों में भयंकर बन जाती है। जो भी इसके चपेट में आता है वह गोता खाता हुआ इसकी भंवर में पड़कर पल भर में अदृश्य हो जाता है। एक बार ऐसे ही बरसात के दिनों में रुपेण के दोनों किनारे छलछला रहे थे, खेत छलक रहे थे, नदी नाले टूटकर बह रहे थे, पगलाए हुए बादल भयंकर रुप धारण करके धरती आसमान को एक करने पर डटे हुए थे, ऐसे में एक क्षत्रिय अपने घोड़े पर सवार होकर उधर से निकला।

नदी पार करने के लिए उसने अपने घोड़े को रुपेण में उतार दिया। घोड़ा बहुत तेज तर्रार और ऊंचे नस्ल का था। पर पानी का बहाव इतना तेज था कि कुछ ही समय में सवार और घोड़ा दोनों ही पानी में गोते लगाते हुए, चक्कर खाते हुए भंवर में फंस गए।

क्षत्रिय की सारी मेहनत निष्फल हो गई और क्षण भर में साहस और शौर्य दोनों अपने होश खो बैठे।



रुपेण से होकर गुजरने वाली वह मार्ग पहले बहुत मनोरम, सुन्दर तथा वनस्पतियों से भरपूर था। पथिकों के विश्राम के लिए एक विशाल बरगद का पेड़ भी अपनी टहनियों को फैलाकर आरामगाह जैसा बन गया था। इस बरगद के नीचे न जाने कितनों पथिकों ने आराम किया होगा, और न जाने कितने थके पशु पक्षियों को आनन्द मिला होगा। रुपेण नदी, सुन्दर बरगद, साफ सुथरी चमकती जमीन, छोटा पर सुन्दर मोहक वन प्रदेश, जिसमें डर या भयंकर लगने जैसा कुछ भी नहीं। इन सबके कारण कमजोर दिलवाला, डरपोक व्यापारी भी वहां आराम करने के लिए ललच जाता।

परन्तु इस क्षत्रिय के मृत्यु के पश्चात वह सुन्दर जगह एकदम से वीरान उजड्ड बन गया। अनेक कठिनाइयों का सामना करके भी उस राह से बचकर लोग दूसरे मार्ग से आने जाने लगे।

गांव में यह बात फैल गई कि कोई भी पथिक सही सलामत उस मार्ग से गुजर ही नहीं सकता। इसलिए इस सुन्दर जगह को छोड़कर लोग दूसरे मार्ग को अपनाने लगे और फिर यह छोड़ा हुआ मार्ग धीरे धीरे भयंकर बनने लगा।

एक बार भरी दुपहरी की तेज धूप में एक चारण नजदीक के गांव से होकर इस रास्ते से गुजर रहा था। गांव के उस पार जाते समय वह जाने का रास्ते का पता पूछने लगा, तब कुछ लोगों ने उसे बिन मांगी सलाह दी, “भई वह रास्ता यात्रा करने लायक नहीं है, इस रास्ते से जानेवाले का सर धड़ से अलग हो जाता है।”

“क्यों? ऐसा क्यों होता है?” >>> आगे पढ़ें >>>

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कृतिदेव / चाणक्य आदि फ़ॉन्ट के डाक्यूमेंट अपने स्मार्टफ़ोनों में आसानी से, बिना रूट किए, कैसे देखें/पढ़ें

पहले भी कुछ जुगाड़ थे यहाँ और यहाँ. परंतु ये सीमित थे और किसी में फ़ोन को रूट करने की जरूरत होती थी.

अब बहुत ही आसान सा जुगाड़ आ गया है.

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बात सन 1983 के किसी जड़काले की है, मध्य प्रदेश माध्यमिक परीक्षा मंडल की अंतिम मैट्रिक परीक्षा की अंकसूची में छपे शब्दों में बसी खुशबू बरकरार थी। भिलाई स्टील प्लांट में श्रमिकों की भर्ती के लिए जिला रोजगार कार्यालय दुर्ग द्वारा समय वरीयता के अनुसार समय-समय पर बुलावा पत्र गांवों के लड़कों को मिल रहे थे। इसके लिए न्यूनतम योग्यता मैट्रिक थी और रोजगार कार्यालय में जीवित पंजीयन आवश्यक था।


अंकसूची मिलने के बाद उसकी दस-बारह फ़ोटो कापी निकलवा कर कोनी बिलासपुर में फिटर आईआईटी और बेमेतरा में बी.काम. के लिए फार्म भरने और दोनों जगह प्रवेश मिल जाने के बाद ऊहापोह में मैं, बी.काम. में प्रवेश ले चुका था।
दीपावली की लम्बी छुट्टी के बाद गांव में ही लल्लू दाऊ ने दुर्ग जाकर रोजगार कार्यालय में पंजीयन करा लेने का प्लान बनाया। हम सरकारी रूप से बेरोजगार दर्ज होने के लिये सुबह घी में बोरकर अंगाकर पताल धनिया मिर्च धड़के और सायकल से दुर्ग के लिए निकल पड़े। हमारा गांव शिवनाथ नदी के किनारे पर बसा हुआ है।


हमारे गांव से लगभग दो किलोमीटर दक्षिण पूर्व में खारुन और शिवनाथ का संगम है। शिवनाथ यहां दक्षिण पश्चिम से बहती हुई आती है, जिसके तट पर किरितपुर नाम का गांव है। खेत के मेढ़ों से होकर जाने से किरितपुर भी हमारे गांव से लगभग दो किलोमीटर दूर है। धान के कट जाने के बाद खेतों के बीच मेढ़ काटकर बनाये गए गाड़ा रावन से सायकल उचकते हुए निकलती है। सुविधाजनक पहुँच मार्ग नहीं होने के बावजूद इन दोनों गांवों के बीच यही सुगम मार्ग है। इससे होते हुए हमने शिवनाथ पार में पहुंचे। नदी में पानी घुटने भर रही होगी, हमने सायकल रोककर लफ़र्रा बेलबॉटम को मोड़कर जांघ तक चढ़ाया। जैसे ही हमने सायकल के स्टैंड को हटाया, कूँ-कूँ की आवाज पर हमने पीछे देखा। हमारे गांव का बंडू कुकूर पूछ हिलाते खड़ा था।
हँसी के साथ हमने उसे गाली दिया- 'तैं कहाँ इँहा घुमरत हस साले।'


वह पूँछ हिलाते हुए सायकल के चक्के पर लोटने लगा।

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मनोरंजक प्रेरक और शिक्षाप्रद लोक कथाओं की एक नई खेप -
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एक बार इटली में एक अमीर व्यापारी रहता था जिसके पाँच बच्चे थे – चार बेटियाँ और एक बेटा। उसका बेटा सबसे बड़ा था। उसका नाम था बाल्डेलौन[2]।

व्यापारी की किस्मत ने पलटा खाया और वह अमीर से गरीब हो गया। अब वह केवल माँग कर ही खा पी पाता था। उसकी यह हालत और भी खराब होने वाली थी क्योंकि उसकी पत्नी को छठा बच्चा होने वाला था।

बाल्डेलौन ने देखा कि उसका परिवार बड़ी कठिनाई के समय से गुजर रहा है सो उसने घर छोड़ने का निश्चय कर लिया। उसने सबको गुड बाई कहा और फ्रांस के लिये चल दिया।

वह एक पढ़ा लिखा नौजवान था सो जब वह पेरिस पहुँचा तो उसको वहाँ के शाही महल में काम मिल गया और फिर वह वहाँ कैप्टेन बन गया।

घर में पत्नी ने पति से कहा — “अब बच्चा आने को है और हमारे पास बच्चे की कोई चीज़ नहीं है। हम अपनी आखिरी चीज़ अपनी खाने की मेज बेच देते हैं ताकि हम बच्चे की कुछ चीज़ें खरीद सकें।”

उन्होंने कुछ ऐसे लोगों को बुलाया जो पुरानी चीज़ें खरीदते थे और उनमें से एक को उन्होंने अपनी खाने की मेज बेच दी। इस तरह से वह व्यापारी अपने आने वाले बच्चे के लिये वह सब सामान खरीद सका जो उस बच्चे के लिये जरूरी था।

जब समय आया तो उनके घर में एक बेटी पैदा हुई जो बहुत सुन्दर थी। उसको देख कर उसके माता और पिता खुशी से रो पड़े। उनके मुँह से निकला — “ओ हमारी प्यारी बेटी, हमको बहुत दुख है कि तुम हमारे घर में इतनी गरीबी में पैदा हुईं।”
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चौड़ी सड़क। मध्यम आकार का मकान। छोटा-सा दरवाज़ा, मकान के पिछवाड़े। दरवाज़े से अंदर दाख़िल हों, तो सामने तंग-सा एक गलियारा पड़ता है। इसी गलियारे में एक कामचलाऊ रसोईघर है। इतना छोटा, कि बाहें फैलाएँ तो दीवारों से टकरा जाएँ। गलियारे से दो सीढ़ी ऊपर एक कमरा है। कोई बारह फ़ुट बाई बारह फ़ुट का होगा।

सुबह साढ़े दस बजे इस कमरे में एक लड़की दिखा करती है। हूर या परी तो नहीं; पर सुतवाँ नाक, घुटना चूमते काले घने बाल, गेहुँआ रंग और हँसमुख चेहरा उसे भीड़ से अलग ज़रूर कर देते हैं। ग़ौर करें, तो कमरे में देखने लायक कुछ है ही नहीं उस लड़की के सिवाय। न मँहगी पेंटिंग, न सजावटी सामान - टेलीविज़न तक नहीं है इस कमरे में।

फिर भी, लड़की ख़ुश है। हर शाम साढ़े चार बजे मुँह धोने, दाँतों के बीच क्लिप फँसा कर बाल काढ़ने, सजने-सँवरने और बाहर जाने के कपड़े पहनने के बाद वह बेताबी से दीवारघड़ी ताका करती है। घड़ी की टिक-टिक में मोटर साइकिल की धक-धक का पुट आते ही उसकी बाँछें खिल जाती हैं। वह बिजली की तेज़ी से दरवाज़ा खोला करती है। एक लड़का अंदर आता है, ब्रीफ़केस कमरे में रखता है, और पाँच मिनट के अंदर दोनों फुर्र हो जाते हैं। दोनों बाज़ार में घूमते हैं, कुछ खाते हैं, बतियाते हैं, एक-दूसरे की आँखों में ख़्वाब देखते हैं, और लौट आते हैं टीन के दरवाज़ेवाले अपने स्वर्ग में।

लड़के के बाल थोड़े घुंघराले हैं। लड़की को अक्सर उन बालों में उँगलियाँ फिराने का मन होता है। लड़के को बेतरतीब बाल पसंद नहीं। लड़की को लड़के के कंधे पर हाथ रखने में मज़ा आता है - गर्दन की भूरी चमड़ी पर चूड़ियों का रंग निखर आता है। >> आगे पढ़ें >>

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