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Manoj Thakur
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भारत के भविष्य के किसान.......
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आस्था, रोमांच व प्रकृति

मंडी जिले के कई अनछुए धार्मिक स्थल जो आप को बार बार अपनी और आकर्षित करें -

हिमाचल प्रदेश में जिला मंडी का हर कोना प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ सांस्कृतिक पहलुओं से सजा पड़ा है। यहां ऐसे कई अनछुए पर्यटन स्थल हैं जो एक बार देख लेने के बाद हमें बार-बार अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं।

मंडी शहर

मंडी व्यास नदी के किनारे बसा है। यहां मंदिरों की भरमार है। यहां 81 शिव मंदिरों के कारण इसे छोटी काशी व पहाड़ का वाराणसी कहा जाता है। ऋषि मांडव ने इस स्थान पर तपस्या की थी। इस कारण इसे मांडव नगर के नाम से भी जाना जाता है। मंडी शहर की स्थापना अजबर सेन ने 1527 में की थी। यहां राजाओं के महल व अन्य मकान उस समय की भवन निर्माण शैली का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। शहर में हिमाचल प्रदेश के सबसे पुराने भवन विधमान है। मंडी नाम इस क्षेत्र इसीलिए दिया गया माना जाता है क्योंकि यह 20वीं सदी के मध्य तक व्यापार का केन्द्र था।

आज जहां इंदिरा मार्केट है, उसे पहले संकन गार्डन के नाम से जाना जाता था। यह राजा का तालाब था जो जल संग्रहण का अदभुत नमूना पेश करता था। वहीं घंटाघर है जो राजा सिद्धसेन द्वारा धोखे से की गई अपने बहनोई पृथ्वीपाल की हत्या के प्रायश्चित स्वरूप बनवाया गया है। इस घंटाघर की प्राचीन घड़ियां लोगों को आकर्षित करती हैं। पूर्वी किनारे पर ऐतिहासिक सेरी मंच है जो सांस्कृतिक, राजनीतिक व साहित्यिक कार्यक्रमों का गवाह है। पश्चिमी किनारे पर सीढि़यां हैं जो मंडी शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर स्थित टारना मंदिर तक ले जाती हैं। उत्तर दिशा में है ऐतिहासिक चौहटा बाजार और साथ ही भूतनाथ मंदिर जो लोगों की गूढ़ आस्था व श्रद्धा का केंद्र बिंदु है। यहां ऐसे कई पुरातात्विक मंदिर हैं जो सदियों से लोगों के लिए पूजनीय रहे हैं। वैसे अकेले मंडी शहर में ही 300 के करीब नए-पुराने मंदिर हैं। मंडी बस स्टैंड के साथ ही वह ऐतिहासिक गुरुद्वारा है जहां पर सिखों के दसवें गुरु गुरुगोविंद सिंह ने कुछ समय व्यतीत किया था। मण्डी के लोग मंडयाली बोली बोलते हैं। मंडी की धाम तो बहुत ही मशहूर है। सेपु बड़ी यहां की खास डिश है।

मंडी शहर में व्यास नदी के किनारे 1877 में बने उस झूला पुल को आज भी उसी तरह से काम करता देख सकते हैं जो जवाहर नगर और पुरानी मंडी को जोड़ता है। मंडी से ही 17 किमी दूर चंडीगढ़-मनाली हाईवे पर आप व्यास नदी पर बने पंडोह डैम को भी निहार सकते हैं जो व्यास नदी का पानी भाखड़ा डैम तक ले जाता है। मंडी की बरोट घाटी हिमाचल की सबसे सुंदर जगहों में से एक है।

सरकाघाट के कमलाह गांव का कमलाह किला प्रमुख दर्शनीय स्थल है। समुद्रतल से 4772 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह किला मंडी के राजा सूरज सेन ने सन 1625 में बनवाया था।

रिवालसर झील :
यह झील मंडी से लगभग 24 किमी दूर है। तैरते हुए टापुओं के लिए प्रसिद्ध यह झील तीन धमरें- हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म का सामूहिक आस्था स्थल है। आदिकाल से यह हिंदुओं का पवित्र धार्मिक स्थल है। यहीं पर बौद्ध गुरु पद्मसंभव ने तप किया था। सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह के यहां चरण पड़े थे। इसी झील से 7 किमी दूर ऊपर पहाड़ी की तरफ जाएंगे तो सड़क के साथ ही बौद्ध गुरु पद्मसंभव को समर्पित गुफा नजर आएगी। यहां आपको पदमसंभव की एक बड़ी-सी मूर्ति के दर्शन भी होंगे। इसी स्थान से लगभग एक किमी की दूरी पर माता नैना देवी का मंदिर है जहां लोग रोजाना दूर-दूर से हजारों की संख्या में शीश नवाने आते हैं।

पराशर झील :
इस झील का सौंदर्य देखते ही बनता है। मंडी से 49 किमी उत्तर दिशा में स्थित यह झील ऋषि पराशर को समर्पित है। इस स्थान पर उन्होंने तपस्या की थी। पानी के लिए जब ऋषि पराशर ने अपना गुर्ज जमीन पर मारा तो पानी की धारा प्रस्फुटित हो गई और इस धारा ने झील का रूप धारण कर लिया। लेकिन उस भूमि को पानी की एक बूंद भी भिगो नहीं पाई जिस भूमि पर ऋषि तपस्या में लीन थे। वृताकार भूमि का यह टुकड़ा आज भी झील में एक कोने से दूसरे कोने में तैरता रहता है। सर्दियों में जब इस टापू और झील के आसपास बर्फ जम जाती है तो उस समय झील की खूबसूरती अलग ही हो जाती है। झील के साथ ही पैगोडा शैली में निर्मित ऋषि पराशर का तीन मंजिला मंदिर भी है।

माता मुरारी देवी मन्दिर :
माता मुरारी देवी जी का प्रसिद्ध मंदिर सुंदरनगर के पश्चिम दिशा में स्थित मुरारी धार नामक पहाड़ी पर स्थित है जिसकी दूरी सुंदरनगर से 20 किलोमीटर (18 किलोमीटर वाहन योग्य एवं 2 किलोमीटर पैदल मार्ग) है। ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर बहुत ही सुन्दर स्थान पर है जहां से मंडी और बिलासपुर जिलों का बहुत सारा भाग दिखाई देता है। किवदंतियों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण महाभारत के पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान किया था। इसका प्रमाण मंदिर से नीचे स्थित पत्थरों से मिलता है जहां आज भी पांडवों के पैरों के निशान देखे जा सकते हैं। यहां आकर एक अध्यात्मिक शान्ति का अनुभव होता है। श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए मंदिर में सरायं का निर्माण है एवं 5 मिनट की दूरी पर मंदिर प्रबंधन समीति द्वारा निर्मित रेस्ट हाउस भी है। भोजन के लिए अखंड अन्नपूर्णा लंगर लगता है जो साल के 12 महीने चलता है।


कमरुनाग झील :
मंडी के सुंदरनगर इलाके में स्थित यह झील देव कमरुनाग को समर्पित है। किवदंती के अनुसार कमरुनाग राजा रत्न यक्ष थे जो बहुत ही शक्तिशाली थे। पिछले जन्म में कमरुनाग के रूप में अवतरित हुए थे। महाभारत युद्ध के उपरांत पांडवों ने उन्हे अपना आराध्य देव मानकर इस स्थान पर उनकी स्थापना की। कमरुनाग को बारिश का देवता माना जाता है। सुंदरनगर-करसोग मार्ग पर मंडी से लगभग 62 किमी की दूरी पर रोहांडा से लगभग 6 किमी की चढ़ाई पैदल चढ़कर झील के दर्शन होते हैं।

करसोग :
मंडी से 125 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में समुद्र तल से लगभग 1404 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की पीर पंजाल पर्वत श्रेणी में बसी करसोग घाटी अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों, अनूठी लोक-संस्कृति, पौराणिक मंदिरों व सेब के बगीचों व देवदार, चील, अखरोट, ढेरों जड़ी-बूटियों आदि के पेड़ों से सजी एक ऐसी अनछुई घाटी है जिसका सौंदर्य देखते ही बनता है। शिमला से इसकी दूरी 106 किमी है। सीढ़ीनुमा खेतों से सजी यह घाटी किसी चित्रकार की नायाब रचना जान पड़ती है। यहां के लोग पूरी तरह से आस्थावान व समर्पित हैं। इसका प्रमाण यहां सिथत कामाक्षा देवी, माहुंनाग, नाग धमूनी, ममलेश्वर महादेव व देवी महामाया के भव्य व अति प्राचीन मंदिर हैं। इसके मुख्य दर्शनीय स्थल चिंडी, तातापानी (गर्म पानी के चश्मों के लिए मशहूर), पांगणा (ऐतिहासिक गांव), कुन्हू धार है। पांगणा कई सालों तक सुकेत रियासत की राजधानी रही जो बाद में सुंदरनगर स्थापित कर दी गई थी। यहीं पर सुकेत राजपरिवार की इष्ट देवी महामाया का लगभग 50 फुट ऊंचा पांच मंजिला प्राचीन मंदिर पारंपरिक भवन निर्माण शैली का बेजोड़ उदाहरण है। करसोग बाजार से कुछ ही किमी दूर बसा ममेल गांव ममलेश्वर महादेव के मंदिर के कारण दर्शनीय है। यह मंदिर पांडवकाल से भी पुराना माना जाता है। इस मंदिर की दो चीजें हैरान करने वाली हैं। एक तो यहां रखा बड़ा-सा भेखल की झाड़ी से बना लगभग डेढ़ फुट व्यास का ढोल और दूसरी- एक लगभग 150 ग्राम वजन (आकार में इतना कि पूरी हथेली भर जाए) का कनक का दाना। मांहुनाग के मंदिर में भी ऐसा ढोल है जो उसी झाड़ी के शेष भाग से निर्मित माना जाता है।
माहूंनाग को महाभारत के कर्ण का रूप माना जाता है। यह पूरे सुकेत रियासत में पूजा जाने वाला वाला देव है जो लोगों की सांप, कीड़े-मकोड़ों आदि से रक्षा करता है। करसोग से वाया कंडावार्इ होते हुए शिकारी देवी तक एक बहुत ही बढि़या ट्रैकिंग रुट है जो पर्यटकों को घाटी नजदीक से निहारने का मौका प्रदान करता है। करसोग घाटी में मध्य दिसंबर से मध्य फरवरी माह में जाना ठीक नहीं है क्योंकि इन महीनों में बर्फ के कारण रास्ते बंद होने का खतरा हमेशा बना रहता है। यहां ठहरने के लिए सरकारी रेस्ट हाऊस, रेस्तरां, सराय की उचित व्यवस्था के कारण आप आराम से यहां रह सकते हैं। इस घाटी के लिए दिन-रात बस के साथ-साथ टैक्सी आदि की सुविधा के कारण पर्यटक आसानी से यहां पहुंच पाते हैं।
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12/03/2015
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02/03/2015
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