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Manish Kumar
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Travel writer, Music & Literature critique, Hindi Blogger, Energy Expert life has given me so many roles to play . I love to play each of th
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मौसम सावन का है। वर्षा की हल्की हल्की फुहारें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं और काले बादल मेरे शहर में यूँ खूँटा डाले हैं जैसे कह रहे हों कि कभी तो घर से निकलोगे? आज तो तर कर के ही छोड़ेंगे। इसी रिमझिम के बीच टहलते हुए रेडियो से एक सदाबहार नग्मा सुनाई दिया जिसे आख़िर तक सुनते हुए मन ग़मगीन सा हो गया। मैं सोचने लगा। इंसान की फितरत भी अजीब है। अपने आस पास के वातावरण को मूड के हिसाब से कुछ यूँ ढाल लेता है कि सावन, बदरा... जैसे बिंब जो कभी मन को उमंग से भर देते हैं वही हृदय में दर्द का सैलाब भी ले आते हैं।

आकाश में उमड़ते घुमड़ते काले बादल नायिका के व्यथित हृदय की पीड़ा को किस तरह अश्रुओं के सावन में तब्दील कर देते हैं इसी का संवेदनशील चित्रण किया है इंदु जी ने इस गीत में। उनके गीत में ठेठ हिंदी शब्दों को समावेश है जो कि एक कविता के रूप में बहते चले जाते हैं। इस गीत का उनका आखिरी अंतरा मुझे सर्वाधिक प्रिय हैं जिसमें वो कहती हैं..

उतरे मेघ हिया पर छाये
निर्दय झोंके अगन बढ़ाये
बरसे हैं अँखियों से सावन
रोए मन है पगला
कहाँ से आये बदरा..

#Yesudas   #RajKamal #InduJain #ChashmeBaddur #सावन #मेघ #EkShaamMerenaam

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The Sacred Sorrow of Sparrows कोई यात्रा वृत्तांत नहीं है इसलिए इस किताब के प्रकाशक नियोगी बुक्स ने इसे मेरे जैसे यात्रा लेखकों के पास समीक्षा हेतु भेजने की इच्छा ज़ाहिर की तो मुझे कौतूहल जरूर हुआ। जब इस संग्रह की कहानियों से पर्दा उठने लगा तो समझ आया कि ये हम जैसे यात्रा प्रेमियों को क्यूँ भेजी गयी है?
बस समझ लीजिए गर कोई घुमक्कड़ लेखक अपनी यात्राओं के दौरान मिले चरित्रों के इर्द गिर्द घटी घटनाओं को उन शहरों के अक़्स और संस्कृति के साथ आत्मसात करते हुए कहानियों की शक़्ल में परोस दे तो ऍसी किताब सामने आती है।

इस किताब के लेखक सिद्धार्थ दासगुप्ता यूँ तो पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा से विज्ञापन जगत से जुड़े हैं पर यात्रा करना उन्हें शुरु से भाता रहा है। उनका पहला उपन्यास Letters from an Indian Summer पेरिस से लेकर बनारस के गली कूचों तक गुजरा था। The Sacred Sorrow of Sparrows की दस कहानियाँ तो सुदुर पूर्व के टोक्यो से लेकर लखनऊ, दिल्ली, पुणे, मुंबई, दुबई, इस्फहान, इस्तांबुल होते हुए लेबनान जा पहुँचती हैं।

लेखक का कहना है कि इन कहानी के चरित्रों के अंदर बहती उदासी ही उन्हें एक सूत्र में जोड़ती है। क्या ऐसा सचमुच है ये जानने के लिए आपको ले चलते हैं इस कहानी संग्रह की मजबूत और कमजोर कड़ियों की तरफ़..।

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शाम का पहर बड़ा अजीब सा है। दोस्तों का साथ रहे तो कितना जीवंत हो उठता है और अकेले हों तो कब अनायास ही मन में उदासी के बादल एकदम से छितरा जाएँ पता ही नहीं चलता। फिर तो हवा के झोकों के साथ अतीत की स्मृतियाँ मन को गीला करती ही रहती हैं। धर्मवीर भारती को भी लगता है शाम से बड़ा लगाव था। पर जब जब उन्होंने दिन के सबसे खूबसूरत पहर पर कविताएँ लिखीं उनमें ज़िंदगी से खोए लोगों का ही पता मिला। उनके ना होने की तड़प मिली।

अनखिले गीत सब उसी के हैं
अनकही बात भी उसी की है
अनउगे दिन सब उसी के हैं
अनहुई रात भी उसी की है
जीत पहले-पहल मिली थी जो
आखिरी मात भी उसी की है!
एक-सा स्वाद छोड़ जाती है
ज़िन्दगी तृप्त भी व प्यासी भी
लोग आए गए बराबर हैं
शाम गहरा गई, उदासी भी!

तो आइए सुनिए इस कविता के भावों तक पहुँचने की मेरी एक कोशिश..

#DharamvirBharati #Hindi #Kavita #PoetryRecitation #शाम #हिंदी_ब्लागिंग

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एफिल टॉवर में तीन तल है । नीचे से पहले और पहले से दूसरे तक पहुँचने के लिए तीन सौ सीढ़ियाँ तय करने पड़ती हैं। इसके ऊपर एक तीसरा तल भी हैं जहाँ केवल लिफ्ट से पहुँचा जा सकता है। फोटोग्राफी के लिए दूसरा तल सबसे बेहतरीन माना जाता है जबकि तीसरे तल तक पहुँच कर आप पेरिस की चौहद्दियों को भली भांति देखने का रोमांच पा सकते हैं बशर्ते इसके लिए आपकी जेब में मोटी रकम हो।

आज एफिल टावर पेरिस की शान है पर क्या आप जानते हैं कि इसके जनक गुस्ताव एफिल ने जब पहली बार इस ऊँचे टावर के निर्माण का प्रारूप बनाया था तो समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने किन शब्दों में इसकी आलोचना की थी ?

आज के इस आलेख में ना केवल आप फ्रांस के कलाकारों के एक बड़े वर्ग द्वारा इस टॉवर के विरोध का कारण जानेंगे बल्कि साथ ही ये समझ पाएँगे कि एफिल के चारों ओर कौन कौन से खूबसूरत इलाके हैं?

#France #Paris #EiffelTower #PhotoFeature

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बाहर बारिश की झमाझम है और मन भी थोड़ा रिमझिम सा हो रहा है तो सोच रहा हूँ कि क्यूँ ना आज आपको हरिहरण साहब की गायी वो हल्की फुल्की पर बेहद मधुर ग़ज़ल सुनाऊँ जिसके कुछ अशआर कुछ दिनों से मन में तरलता सी घोल रहे हैं।
हरिहरण ने ये ग़ज़ल अपने एलबम काश में वर्ष 2000 में रिकार्ड की थी जिसे मैं आज आपको सुनवाने जा रहा हूँ। गिटार और बांसुरी के साथ उस्ताद रईस खान का सितार मन को तब चंचल कर देता है जब ग़ज़ल के मतले में हरिहरण की आवाज़ कुछ ये कहती सुनाई पड़ती है

मैकदे बंद करे लाख ज़माने वाले
शहर में कम नहीं आँखों से पिलाने वाले

सच ही तो है , जिसने भी हुस्न और शोखियों का स्वाद उनकी आँखों के पैमाने से पिया है उसे भला मयखाने जाने की क्या जरूरत?
मतले के बाद का शेर सुनकर तो बस आह ही उभरती है, कोई पुरानी कसक याद दिला ही जाता है ये नामुराद शेर

काश मुझको भी लगा ले तू कभी सीने से
मेरी तस्वीर को सीने से लगाने वाले

तो आइए इस बरसाती मौसम में आप भी मेरे साथ इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाइए..

#Hariharan #Ghazal #Kaash  

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कुछ गीत बेहद गूढ़ होते हैं। जल्दी समझ नहीं आते। फिर भी उनकी धुन, उनके शब्दों में कुछ ऐसा होता है कि वो बेहद अच्छे लगते हैं। जब जब चाँद और चाँदनी को लेकर कुछ लिखने का मन हुआ मेरे ज़हन में अमृता प्रीतम की लिखी हुई ये पंक्तियाँ सबसे पहले आती रहीं अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठा कर, घूंट चाँदनी पी है हमने। सन 1975 में आई फिल्म कादंबरी के इस गीत का मुखड़ा अपने लाजवाब रूपकों और मधुर धुन की वज़ह से हमेशा मेरा प्रिय रहा।

पर इस गीत से मेरा नाता इन शब्दों के साथ साथ रुक सा जाता था क्यूँकि मुझे ये समझ नहीं आता था कि आसमान की सुराही से मेघों के प्याले में चाँदनी भर उसे चखने का इतना खूबसूरत ख़्याल आख़िर कुफ्र यानि पाप कैसे हो सकता है?
गीतों के बोलों के इस रहस्य को समझने के लिए फिल्म देखी और तब अमृता के बोलों की गहराई तक पहुँचने का रास्ता मिल पाया...तो चलिए आज की इस पोस्ट में साथ चलते हैं इस गीत यात्रा पर...

#AmritaPritam #Kadambri #AshaBhosle #Vilayatkhan #EkShaamMereNaam

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आज से लगभग पैंतालीस साल पहले जब ये इमारत बनी तो लंदन की तरह ही इस कदम की व्यापक आलोचना हुई। लोगों ने इसे पेरिस शहर के चरित्र को नष्ट करने वाला भवन माना। विरोध इतना बढ़ा कि एफिल टॉवर के आस पास के केंद्रीय इलाके में सात मंजिल से ज्यादा ऊँचे भवनों पर रोक लगा दी गयी। विगत कुछ वर्षों में पेरिस शहर पर जनसंख्या के दबाव की वज़ह से ये रोक कुछ हल्की की गयी है। पर मोनपारनास टॉवर बनाने वालों पर लोगों का नज़रिया फ्रेंच ह्यूमर में झलक जाता है जब यहाँ के लोग कहते हैं कि टॉवर के ऊपर से पेरिस सबसे खूबसूरत दिखाई देता है क्यूँकि वहाँ से आप इस बदसूरत टॉवर को नहीं देख सकते।

अब हँसी हँसी में कही हुई इस बात में कितनी सच्चाई है वो आप मेरे साथ इमारत के छप्पनवें तल्ले तक चल कर ख़ुद देख सकते हैं आज के इस फोटो फीचर में।

#Paris #France #Photography #Montparnasse

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बिष्णुपुर के मंदिरों के बाद अगर किसी बात के लिए ये शहर जाना जाता है तो वो है बांकुरा का घोड़ा। ये घोड़ा बांकुरा जिले का ही नहीं पर समूचे पश्चिम बंगाल के प्रतीक के रूप में विख्यात है। बंगाल या झारखंड में शायद ही किसी बंगाली का घर हो जिसे आप घोड़ों के इन जोड़ों से अलग पाएँगे। हालांकि विगत कुछ दशकों में ये पहचान अपनी चमक खोती जा रही है। एक समय टेराकोटा से बने इन घोड़ों का पूजा में भी प्रयोग होता था पर अब ये ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाने का सामान भर रह गए हैं। टेराकोटा यानी पक्की हुई मिट्टी से खिलौने बनाने की ये कला बिष्णपर और बांकुरा के आस पास के गाँवों में फैली पड़ी है। अगर समय रहे तो आप इन खिलौंनों को पास के गाँवों में जाकर स्वयम् देख सकते हैं। घोड़ों के आलावा टेराकोटा से गढ़े गणेश, पढ़ाई करती स्त्री, ढाक बजाते प्रौढ़, घर का काम करती महिलाएँ आपको इन हस्तशिल्प की दुकानों से जगह जगह झाँकती मिल जाएँगी। मेले में ग्रामीण इलाकों से आए इन शिल्पियों से इन कलाकृतियों को खरीद कर बड़ा संतोष हुआ। इनकी कीमत भी आकार के हिसाब पचास से डेढ़ सौ के बीच ही दिखी जो की बेहद वाज़िब लगी।

#Bishnupur   #Art #Craft #Music #Baluchari #Bengal  

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कई बार आप सब ने गौर किया होगा। रोजमर्रा की जिंदगी भले ही कितने तनावों से गुज़र रही हो, किसी से हँसी खुशी दो बातें कर लेने से मन हल्का हो जाता है। थोड़ी सी मुस्कुराहट मन में छाए अवसाद को कुछ देर के लिए ही सही, दूर भगा तो डालती ही है। पर दिक्कत तब होती है जब ऐसे क्षणों में आप बिलकुल अकेले होते हैं। बात करें तो किससे , मुस्कुराहट लाएँ तो कैसे ?

पर सच मानिए अगर ऍसे हालात से आप सचमुच गुजरते हैं तो भी किसी का साथ हर वक़्त आपके साथ रहता है। बस अपनी दिल की अँधेरी कोठरी से बाहर झाँकने भर की जरूरत है। जी हाँ, मेरा इशारा आपके चारों ओर फैली उस प्रकृति की ओर है जिसमें विधाता ने जीवन के सारे रंग समाहित किए हैं।

चाहे वो फुदकती चिड़िया का आपके बगीचे में बड़े करीने से दाना चुनना हो...
या फिर बाग की वो तितली जो फूलों के आस पास इस तरह मँडरा रही हो मानो कह रही हो..अरे अब तो पूरी तरह खिलो, नया बसंत आने को है और अभी तक तुम अपनी पंखुड़ियां सिकोड़े बैठे हो ?
या वो सनसनाती हवा जिसका स्पर्श एक सिहरन के साथ मीठी गुदगुदी का अहसास आपके मन में भर रहा हो....
या उफनती नदी की शोखी जो मन में शरारत भर रही हो..
या बारिश की बूदें जो पुरानी यादों को फिर से गीला कर रहीं हों..

फिर मिलेंगें के इस गीत में इसीलिए तो प्रसून लिखते हैं..

झील एक आदत है तुझमें ही तो रहती है
और नदी शरारत है, तेरे संग बहती है
उतार ग़म के मोजे जमीं को गुनगुनाने दे
कंकरों को तलवों में, गुदगुदी मचाने दे
हवाएँ कह रही हैं आजा झूमें ज़रा
गगन के गाल को चल, जा के छू लें ज़रा
खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे...
#PrasoonJoshi #PhirMilenge #ShankarEhsaanLoy #BombayJaishree #EkShaamMereNaam

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बिष्णुपुर की मंदिर परिक्रमा के पहले चरण में आपने दर्शन किए थे श्याम राय, राधा माधव, लालजी आदि मंदिरों के। आज इन ऐतिहासिक मंदिरों की परिक्रमा जारी रखते हुए जानेंगे बंगाल की वास्तुकला का अद्भुत परिचय देते जोर बांग्ला और मदन मोहन मंदिरों के बारे में।

अपनी वास्तु शैली के लिए जिस तरह पंचरत्न श्याम राय मंदिर आकर्षित करता है वैसा ही सम्मोहन दो झोपड़ियों सी शक़्ल लिए जोर बांग्ला मंदिर में भी है। अगर आप कोलकाता के इको पार्क में जाएँगे तो बिष्णुपुर के इसी मंदिर का नमूना वहाँ बना पाएँगे। मंदिर की घुमावदार छतों के आधार पर ही इस कोटि के मंदिर बंगाल की चाला शैली के मंदिर कहे जाते हैं। अगर जोर बांग्ला को देखें तो इसके दो झोपड़ी के आकार के कक्षों की छतें दो चाला हैं और इनके ऊपर का शिखर चार चाला है क्यूँकि वो चार ओर ढलान वाली छतों के मिलने से बना है....

 #Bishnupur #Terracotta #Temples #travelwithmanish
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