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Manik Chittorgarh
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‘अपनी माटी’ 26 अंक अनुक्रमणिका
                 ‘ अपनी माटी ’ 26 अंक अनुक्रमणिका     सम्पादकीय ·         साधु , ओझा , संत   वैचारकीय   ·         जाति वर्ग एवं जेंडर के बरक्स लोक में गल्प और यथार्थ का द्वंद्व/ राहुल ·         आधुनिकता के आईने में भारत/डॉ. मीनाक्षी जयप्रकाश सिंह ·         ...
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सम्पादकीय:साधू ओझा संत/ जितेन्द्र यादव
साधू ओझा संत भारतीय समाज की जो आंतरिक सांस्कृतिक संरचना दिखाई देती
है। उसमें साधू, ओझा और संत की अपनी एक बड़ी भूमिका है। इनकी बातों का प्रभाव जनता
के मानस पर बहुत गहराई से उतरता है। अपने
हाव-भाव के द्वारा इतनी तीव्रता से लोगों को सम्मोहित करते हैं कि इसी सम्...
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शोध आलेख:जाति वर्ग एवं जेंडर के बरक्स लोक में गल्प और यथार्थ का द्वंद्व/ राहुल
                           जाति वर्ग एवं
जेंडर के बरक्स लोक में गल्प और यथार्थ का द्वंद्व/   राहुल “ पुरुषों के खिलाफ
खड़ा होना ईश्वर के खिलाफ खड़े होने से अधिक जटिल है. ” - एनी निनेला समय , समाज और संस्कृति को जानने के लिए यह जरूरी हो
जाता है कि लोक साहित्य ...
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आलेख:आधुनिकता के आईने में भारत/डॉ. मीनाक्षी जयप्रकाश सिंह
आधुनिकता के आईने
में भारत                 प्रेमचंद के काल से अब तक संसार में , हमारे देश में क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुके
हैं। अब स्त्रियां सिल और लोढ़े की जगह मिक्सी में मसाला पीसती हैं , घड़े की जगह रेफ्रिजरेटर का प्रयोग आम हो गया
है। प्रेमचंद को अपने लेखों ...
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शोध आलेख: वैश्वीकरण: अवधारणा, अर्थ और आयाम/धीरेन्द्र प्रताप सिंह
                                  आलेख: वैश्वीकरण: अवधारणा , अर्थ और आयाम/ धीरेन्द्र प्रताप सिंह ध्यातव्य है कि
वैश्वीकरण शब्द के पर्याय के रूप में ही भूमंडलीकरण , विश्वायन या जगतीकरण शब्द का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि
इन सभी शब्दों के लिए अंग्रेजी में के...
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आलेख:मानवता के सिंचक ‘अम्बेडकर’/डॉ. संगम वर्मा
आलेख:मानवता के सिंचक ‘अम्बेडकर’/डॉ. संगम वर्मा                 21 वीं सदी के इस नवउदारवादी , नवउपभोक्तावादी संस्कृति के इस दौर में नए-नए
प्रयोग , नए-नए वाद , नए-नए परिवर्तन एवं नई-नई चुनौतियां सामने आ
रही हैं जिसमें मानवता जो चाल्र्स डर्विन के विकासवादी सिद...
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आलेख:मानवता के सिंचक ‘अम्बेडकर’/डॉ. संगम वर्मा ok
आलेख:मानवता के सिंचक ‘अम्बेडकर’/डॉ. संगम वर्मा                 21 वीं सदी के इस नवउदारवादी , नवउपभोक्तावादी संस्कृति के इस दौर में नए-नए
प्रयोग , नए-नए वाद , नए-नए परिवर्तन एवं नई-नई चुनौतियां सामने आ
रही हैं जिसमें मानवता जो चाल्र्स डर्विन के विकासवादी सिद...
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बातचीत : महुआ माजी से रविन्द्र कुमार मीना की बातचीत
बातचीत : महुआ माजी से रविन्द्र कुमार मीना की बातचीत आप बांग्लाभाषी हैं , फिर हिन्दी साहित्य के प्रति आपकी रूचि कैसे जागृत हुई ? मैं बांग्लाभाषी
हूँ , लेकिन 1932 के बाद की खतियानी हूँ रांची की जो झारखंड की
राजधानी है पहले यह बिहार का हिस्सा थी। हम लोग यहीं प...
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बातचीत:रामदेव धुरंधरजी से गोवर्धन यादव की बातचीत
      रामदेव धुरंधरजी से गोवर्धन यादव की बातचीत  लगभग देढ़-दो
सौ साल पहले बिहार से कुछ लोगों को बतौर ठेके पर/मजदूर बनाकर मॉरिशस लाया गया था.
संभवतः आपकी यह चौथी अथवा पांचवीं पीढी होगी. क्या विस्थापन का दर्द आज भी आपको
सालता है ? रामदेव धुरंधरजी भारतीय
मज़दूर...
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बातचीत: आलोचक डॉ. निर्मला जैन से विशाल कुमार सिंह की बातचीत
 ‘ स्वाध्याय आलोचना की
कुंजी है ’ हिंदी की शीर्षस्थ
आलोचक डॉ. निर्मला जैन से विशाल कुमार सिंह की बातचीत निर्मला जी  रचना के प्रति
आलोचना का उत्तरदायित्व एक सामाजिक कर्म है। जिसे समकालीन आलोचना धीरे-धीरे भूलता
जा रहा है। आज-कल के आलोचकों में गंभीर और धैर्यवा...
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