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M.MAsum Syed
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इमाम हुसैन की जंग से जुड़े यह आंकडे आप को ताज्जुब में डाल देंगे |
कर्बला की महा त्रासदी एक एेसी घटना है जिस पर बहुत कुछ कहा और लिखा गया है किंतु बहुत कुछ बचा है। यज़ीद की बैअत से इन्कार से लेकर आशूर तक इमाम हुसैन का आंदोलन 175 दिनों तक चला। 12 दिन मदीने में, 4 महीने 10 दिन मक्के में, 23 दिन मक्के और कर्बला के रास्ते में औ...
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दुसरे धर्म के लोग क्या सोंचते हैं कर्बला और इमाम हुसैन के बारे में ?
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 61 हिजरी में जो क़ुर्बानी बारगाहे ख़ुदा में पेश की थी वह कोई हादसा नहीं था बल्कि एक मोजिज़ा थी। हादिसे और मौत में फ़र्क़ है, हादिसा कुछ दिन या कुछ साल गुज़रने के बाद अपना असर खोने लगता है और फिर सदियाँ गुज़रने के बाद दिलो दिमाग़ से...
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दुसरे धर्म के लोग क्या सोंचते हैं कर्बला और इमाम हुसैन के बारे में ?
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 61 हिजरी में जो क़ुर्बानी बारगाहे ख़ुदा में पेश की थी वह कोई हादसा नहीं था बल्कि एक मोजिज़ा थी। हादिसे और मौत में फ़र्क़ है, हादिसा कुछ दिन या कुछ साल गुज़रने के बाद अपना असर खोने लगता है और फिर सदियाँ गुज़रने के बाद दिलो दिमाग़ से...
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दुसरे धर्म के लोग क्या सोंचते हैं कर्बला और इमाम हुसैन के बारे में ?
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 61 हिजरी में जो क़ुर्बानी बारगाहे ख़ुदा में पेश की थी वह कोई हादसा नहीं था बल्कि एक मोजिज़ा थी। हादिसे और मौत में फ़र्क़ है, हादिसा कुछ दिन या कुछ साल गुज़रने के बाद अपना असर खोने लगता है और फिर सदियाँ गुज़रने के बाद दिलो दिमाग़ से...
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दुसरे धर्म के लोग क्या सोंचते हैं कर्बला और इमाम हुसैन के बारे में ?
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 61 हिजरी में जो क़ुर्बानी बारगाहे ख़ुदा में पेश की थी वह कोई हादसा नहीं था बल्कि एक मोजिज़ा थी। हादिसे और मौत में फ़र्क़ है, हादिसा कुछ दिन या कुछ साल गुज़रने के बाद अपना असर खोने लगता है और फिर सदियाँ गुज़रने के बाद दिलो दिमाग़ से...
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सदर इमामबाड़ा जौनपुर में ताज़िया १० मुहर्रम को दफन हुआ
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आंसूओं के साथ जौनपुर में ताजिये सुपुर्द ए खाक हुए |
जौनपुर। जनपद में शुक्रवार को गमगीन माहौल में यौमे आशूरा मनाया गया। इस मौके पर लोगों ने आंसूओं के साथ ताजियों को अपनी-अपनी कर्बलाओं में सुपुर्द ए खाक कर दिया। इसके बाद अजाखानों में मजलिसें शामे गरीबां आयोजित हुई। नगर के विभिन्न इलाकों में निर्धारित समय के अन...
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