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अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए शरीरिक पीड़ा की परिभाषा को भूल जाना, अपने शरीर की सहनशक्ति की अंतिम सीमा छू लेने के बाद उस सीमा को स्वयं ही और आगे बढ़ा देना… ऐसी स्थिति में आप शरीर नहीं रह जाते –आप केवल इच्छाशक्ति रह जाते हैं।
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