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Himanshu Kumar Pandey
Works at Basic Education
Attended Sakaldiha Inter College
Lives in Sakaldiha, Chandauli
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Himanshu Kumar Pandey

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रस्किन बांड की ५ पुस्तकें प्राप्त करें। लिंक पर क्लिक कर लॉगिन करें।
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मेरे प्यारे मज़दूर
मैं जानता हूँ तुम्हारे भीतर कोई ’क्रान्ति’ नहीं पनपती पर बीज बोना तुम्हारा स्वभाव है। हाथ में कोई 'मशाल' नहीं है तुम्हारे पर तुम्हारे श्रम-ज्वाल से भासित है हर दिशा। मेरे प्यारे ’मज़दूर’! यह तुम हो जो धरती की गहरी जड़ों को नापते हो अपनी कुदाल से रखते हो अदम्य...
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श्रमिक दिवस पर आज सिरहाने @AajSirhaane के लिए लिखी गयी लघु-कविता।
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सौन्दर्य लहरी - 20
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसङ्कोचशशिभिः तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ। फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलय-कराग्रेण ददतां दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥88॥ पद तुम्हारे निज सुधाकर नख अवलि से स्वर्गललना के सरोरुह पाणितल को संकुचित देते बना हैं चण्डि! तेरे...
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सौन्दर्य लहरी आचार्य शंकर की अप्रतिम काव्य-सर्जना है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य लहरी में। प्रस्तुत है सौन्दर्य लहरी के श्लोक ...
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को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यौ है
१. (राग केदार) पकरि बस कीने री नँदलाल। काजर दियौ खिलार राधिका, मुख सों मसलि गुलाल॥ चपल चलन कों अति ही अरबर, छूटि न सके प्रेम के जाल। सूधे किए अंक ब्रजमोहन, आनँदघन रस-ख्याल॥ २. (राग सोरठ) मनमोहन खेलत फाग री, हौं क्यों कर निकसौं। मेर संग की सबै गईं, मोहि प्रग...
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ब्रजभाषा साहित्य का ऋतु सौंदर्य अद्भुत है। फाग, फागुन की अनेकों विमायें इस साहित्य में सहज ही दिखेंगी। प्रस्तुत हैं ब्रजभाषा-साहित्य से कुछ सरस फाग-छन्द-
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सौन्दर्य लहरी - 19
सौन्दर्य लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर ...
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मैं अब फेसबुक पर नहीं हूं। अब केवल गूगल प्लस और चिट्ठों पर हूं। ऐसा क्यों है इसके बारे में, इस चिट्ठी चर्चा है। आज जब मैंने फेसबुक पर जाने का प्रयत्न किया तो उसने लॉग-इन करने से मना कर दिया। उसने इस बात की पुष्टि करनी चाही...
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शैलबाला शतक - १०
शैलबाला शतक  शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों म...
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सौन्दर्य लहरी - 21
स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो, निषेवे नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः। किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो, महासंवर्ताग्निविरचयति नीराजनविधिं ॥95॥ स्वशरीरोद्भूत किरणसमूह अणिमादिक सुसेवित जो स्वरूप त्वदीय नित करता निषेवित अहं भावित कौन सा आश्चर...
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सौन्दर्य लहरी आचार्य शंकर विरचित अप्रतिम काव्य-सृजन है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है इस रचना में। इस प्रविष्ट में इस काव्य-रचना का हिन्दी...
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ब्रजभाषा साहित्य का ऋतु सौंदर्य अद्भुत है। फाग, फागुन की अनेकों विमायें इस साहित्य में सहज ही दिखेंगी। प्रस्तुत हैं ब्रजभाषा-साहित्य से कुछ सरस फाग-छन्द-
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निश्चय ही विण्डोज लाइव राइटर ने बहुत से ब्लॉगरों की प्रविष्टियों को सजाया निखारा है और अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है। आप जैसे हिन्दी के विशिष्ट ब्लॉगर्स तो बहुत पहले से इस औजार का सक्रिय और रचनात्मक उपयोग करते आये हैं। इसके अनुपयोगी होते-होते ओपेन लाइव राइटर का आना सुखद है। यह ज़रूर ही उन्नत होता जाएगा अपनी मुक्त स्रोत प्रकृति के कारण।  
मेरे लिए बेहद काम की जानकारी और आश्वासन। आभार।
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Himanshu Kumar Pandey

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लगे क्यूँ मगर हम अकेले बहुत हैं
अगर देखिएगा तो चेहरे बहुत हैं लगे क्यूँ मगर हम अकेले बहुत हैं चलो इश्क़ की राह में चलके हमको न मंज़िल मिली तो भी पाये बहुत हैं ये माना के है ख़ूबसूरत जवानी मगर पा इसी में फिसलते बहुत हैं मज़ेदार है ज़िन्दगी इसलिए के न हासिल हो कुछ पर तमाशे बहुत हैं ये सच है के उ...
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People
Work
Occupation
Teacher
Skills
creative writing, translation, blogging
Employment
  • Basic Education
    Teacher, 2010 - present
  • Sakaldiha P.G.College
    Lecturer, 2007 - 2010
Places
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Sakaldiha, Chandauli
Story
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"बना कर फकीरों का हम भेष ग़ालिब / तमाशाए अहले करम देखते हैं।"
Introduction
मैं क्या हूँ ? क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया ? मैं क्या हूँ ?  जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद ? मैं क्या हूँ ? बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार, उस आकाश का एक तारा ? मैं क्या हूँ ? - जानना इतना आसान भी तो नहीं !
Collections Himanshu Kumar is following
Education
  • Sakaldiha Inter College
    Science, 1995 - 1997
  • Banaras Hindu University
    Language, 1997 - 2002
  • Puducherry University
    Language, 2002 - 2004
Basic Information
Gender
Male
Other names
Himaanshu
Appeal: ExcellentFacilities: Very GoodService: Very Good
Public - 3 years ago
reviewed 3 years ago
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