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Himanshu Kumar Pandey
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"बना कर फकीरों का हम भेष ग़ालिब / तमाशाए अहले करम देखते हैं।"
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सावन का महीना। विरह विदग्ध प्रिया। प्रिय मिलन को आतुर।
कजरी से सुन्दर विधा कौन होगी जिसमें प्रिय का विरह और मिलन अभीप्सा पोर पोर निथर आये और भोजपुरी से सुन्दर भाषा कौन सी होगी जो इसे कोर कोर तक अभिव्यक्त कर सके।

बाबूजी की लिखी अनेकों कजरियों में से एक कजरी। हर बार की तरह स्वर चारुहासिनी का।
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रख दूंगा तुम्हारे सम्मुख आकाश, धरती, सूरज और प्रवाह (Video)
इसी  ब्लॉग पर पहले से प्रकाशित रचनाओं के वीडियो बनाने प्रारम्भ किए हैं मैंने। शुरुआत में कुछ कवितायें ही अपलोड करने का विचार था, पर बाद में कुछ महत्वपूर्ण लेख, कुछ मेरे ललित निबंध, कुछ भोजपुरी रचनाएँ अपलोड करने का मन बन गया। एक निष्क्रिय यूट्यूब चैनल में तन...
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कारगर है! मुफ़्त की अच्छी सुविधा है, आजमाईये।
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डायरी के कुछ पृष्ठ
[message] डायरी के पन्ने ब्लॉग पर डायरी लिखने की आदत बचपन से है। नियमित-अनियमित डायरी लिखी जाती रही। यद्यपि इनमें बहुत कुछ व्यक्तिगत है, परन्तु प्रारम्भिक वर्षों की डायरियों के कुछ पन्ने मैंने सहजने के लिए ब्लॉग पर लिख देना श्रेयस्कर समझा, चूँकि ब्लॉग भी एक...
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सच्चा लहरी : तीन
तेरे चारों ओर वही कर रहा भ्रमण है खुले द्वार हों तो प्रविष्ट होता तत्क्षण है  उसकी बदली उमड़ घुमड़ रस बरसाती है जन्म-जन्म की रीती झोली भर जाती है। होना हो सो हो, वह चाहे जैसे खेले उसका मन, दे सुला गोद में चाहे ले ले  करो समर्पण कुछ न कभीं भी उससे माँगो बस उसक...
By Himanshu Kumar Pandey
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