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Dr Deepak Acharya
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सिर्फ नब्ज़ से रोग बताना संभव नहीं


बुखार का आना यानी लोग ये समझ बैठते हैं कि आपको या तो वायरल फीवर है या मलेरिया हो गया है। सच्चाई ये है कि दोनों परिस्थितियों में बुखार जरूर आता है पर जरूरी नहीं कि हर बुखार मलेरिया या वायरलजनित हो

https://www.gaonconnection.com/samvad/it-is-not-possible-to-tell-disease-only-with-pulse

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पारंपरिक ज्ञान सिर्फ शब्दों में लिपिबद्ध नहीं


पारंपरिक ज्ञान को विज्ञान की नज़रों से देखा जाए और इसे प्रमाणित करके आम जनों तक लाया जाए तो निश्चत ही लोगों का भरोसा जाग उठेगा और आहिस्ता-आहिस्ता लोग इस विषय को गंभीरता से लेना शुरू कर देंगे।

https://www.gaonconnection.com/samvad/traditional-knowledge-is-not-only-limited-to-words

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बुज़ुर्गों का ज्ञान और मानसून का पूर्वानुमान 


आज भी हिन्दुस्तान के ऐसे कितने सारे इलाके होंगे जहां परंपरागत ज्ञान, बुजुर्गों के अपने अनुभव के आधार पर मौसम को लेकर भविष्यवाणियां की जाती हैं और मौसम विज्ञान की भविष्यवाणियों की तरह इन अनुमानों को भी आमतौर पर लोग गंभीरता से लेते हैं।

https://www.gaonconnection.com/samvad/knowledge-of-adult-farmers-and-their-prediction-towards-the-weather-conditions

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Spice Up Your Health, got released today.

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काश! पेजा जैसे पारंपरिक व्यंजन शहरों में भी बिकते


नब्बे के शुरुआती दशक में पहली बार पातालकोट घाटी जाने का मौका मिला था मुझे और उसके बाद से लेकर आज तक, पातालकोट और पातालकोट के वनवासी मेरी शोध के अहम हिस्से निरंतर बने हुए हैं।

https://www.gaonconnection.com/samvad/patalkote-ghati-peza-herbal-wisdom-herbal-acharya-dr-deepak-acharya-lucknow

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दुनिया चांद पर चली गई, यहां लोग पातालकुम्हड़ा ही खोज रहे


आधी रात को टीवी शुरू करें तो गैर-कानूनी रूप से ऐसे उत्पादों का विज्ञापन दिखाई देता है जो कि सत्यता से कोसों दूर और जबरदस्त भटकाव लिए होता है। मोटापा, डायबिटीज, आर्थराइटिस कम करने, मर्दांगी और पौरुषत्व बढ़ाने वाले उत्पादों को खुलेआम बेचा जाता है।

https://www.gaonconnection.com/samvad/advertisement-diabetes-arthritis-lllegal-product-patalkkumhada-dr-deepak-acharya-lucknow

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गाँव के नजदीकी इलाकों में कोई पोखर, तालाब या पानी के ठहराव की व्यवस्था ना हो पाने की वजह से पालतू पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था अपने आप में एक समस्या हो जाती है। सरकारी व्यवस्था को कोसने के बजाय स्थानीय कोंकणी आदिवासी को अपने पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था के लिए गाँव से करीब आठ किमी दूर खापरी नदी ही नज़र आती है।

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अभी पिछले दिनों अहमदाबाद में एक बच्चे की जन्मदिन पार्टी के दौरान मैं बतौर उपहार एक-एक किलो गुंदी और जंगल जलेबी के फलों की छोटी सी टोकरी सौंप आया। देर रात बच्चे के पिता ने मुझे फोन किया और पहला सवाल सुनने मिला कि आखिर ये है क्या, ये कौन से फल हैं? मैं तो यह सोचते ही रह गया कि जब पिता को इन फलों के बारे में खबर नहीं तो बच्चा क्या खाक समझ पाएगा।
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