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Dr Ashutosh Shukla
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मेरी हर धड़कन भारत के लिए है....
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यूपी में जाति विशेष के अधिकारियों कर्मचारियों के तबादले पर उसका समर्थन या विरोध केवल राजनैतिक कारणों से ही हो रहा है. समाज के हर वर्ग में हर तरह के लोग पाए जाते हैं पर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से योग्यता पर जाति, बिरादरी, क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाने लगी उसके बाद यह स्थिति तो सामने आनी ही थी। पिछली सरकार में जिस तरह से यादवों को हर जगह प्राथमिकता दी गयी और भाजपा उसे चुनावी मुद्दा बनाने में सफल रही उसके बाद विवादित लोगों का हटना तय ही माना जा रहा था. अखिलेश सरकार के २०१२ में सत्ता सँभालने पर यह आशा की गयी थी कि पिछली सपा सरकार की तरह जातीय पोस्टिंग से बचा जायेगा पर जनता में यही सन्देश गया कि इस मामले में अखिलेश भी मुलायम जैसे ही हैं. अब यदि योगी सरकार विवादित लोगों को हटाने की तरफ बढ़ रही है तो उससे किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह उसका संवैधानिक अधिकार है। योगी सरकार ने अभी तक बड़े पैमाने पर तबादले भी नहीं किये हैं तो संभव है वे अधिकारियों को अपनी वास्तविक क्षमता दिखाने का अवसर दे रहे हों और आने वाले समय में जो उनके पैमानों पर खरे नहीं उतरेंगें उनको हटाने के आदेश जारी किये जायेंगें। दिल्ली और गोरखपुर से साफ़ तौर पर सन्देश दिए जा चुके हैं कि सांसद और विधायक किसी भी परिस्थिति में ट्रांसफर पोस्टिंग की सिफारिशें सरकार से न करें और केवल सरकार की नीतियों के अनुपालन पर ही ध्यान देते हुए निगरानी रखें इससे जहाँ नौकरशाही को नियमानुसार कार्य करने का मौका मिलेगा वहीं उन पर काम करने और अपनी क्षमता दिखाने का पूरा अवसर मिलेगा। 

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क्या हरियाणा सरकार में कोख में बेटियों को मारने वाले हत्यारों के समर्थक भी शामिल हैं ?? मामला इतना गंभीर है कि अब यह केवल विभागीय नहीं रह गया है क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा झज्जर के सिविल सर्जन डॉ रमेश धनखड़ को वहां पर लिंगानुपात सुधारने के लिए मंत्री मेनका गाँधी द्वारा सम्मानित किया जा चुका है इस मामले में शामिल सभी मंत्रियों, अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से उनके पदों से हटाने की आवश्यकता है क्योंकि केवल खोखले बयानों से बेटियां नहीं बचेंगी उसके लिए किसी को तो डॉ रमेश धनखड़ की तरह सामने आना ही होगा। अब सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने वालों से सख्ती से निपटे। #हरियाणा_सरकार #बेटी_के_हत्यारों_के_साथ 

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ईवीएम विवाद पर आज 'मेरठ' से प्रकाशित होने वाले दैनिक "जनवाणी" में मेरा आलेख "हार की हताशा है ईवीएम पर सवाल" 
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ईवीएम - आरोप और तथ्य
                                                  पांच राज्यों में हुए चुनावों के रुझान और नतीजे आने के साथ ही जिस तरह से बसपा अध्यक्ष मायावती ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से चुनावों में हेर-फेर करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए उसके बाद उनके ...

पर्रिकर का गोवा लौटना कुछ लोगों की नज़रों में सही कदम नहीं है पर वे जिस तरह से केवल अपने काम पर ही केंद्रित रहते हैं उस परिस्थिति में उनके लिए कहीं भी काम करना आसान ही रहने वाला है। देश के रक्षा मंत्री के महत्वपूर्ण और प्रभावी पद से पार्टी के कहने पर गोवा जैसे छोटे राज्य में सीएम के रूप में सामान्य बहुमत की जोड़तोड़ वाली सरकार का नेतृत्व करने के लिए वापसी करना किसी भी महत्वाकांक्षी नेता के लिए इतना आसान नहीं होता पर गोवा में भाजपा के पास पर्रिकर जैसा कोई अन्य नेता नहीं था और गठबंधन की शर्तों के अनुसार उनका लौटना अपरिहार्य हो गया था। 

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देश में अस्थिरता फ़ैलाने के लिए जिस तरह से कई राज्यों के युवाओं को इकठ्ठा करने के बाद यूपी से खोरासान गुट के नाम से आतंकी कार्यवाहियां करने की कोशिश की जा रही थी उसे कई राज्यों की एएटीएस और पुलिस ने मिलकर फिलहाल उनको समाप्त करने में सफलता पायी है पर पूरे अभियान में जिस तरह से सामंजस्य की कमी और अनावश्यक बयानबाज़ी होती रही उससे सभी पक्ष पूरी तरह से बच सकते थे. एटा में तो तेलंगाना से आयी एटीएस को स्थानीय पुलिस ने भाषा न समझने के कारण गिरफ्तार भी कर लिया और उनकी पिटाई भी की। क्या देश भर में इस तरह के अभियानों के लिए एक सुनिश्चित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक नहीं होना चाहिए ? निश्चित तौर पर २६/११ के बाद बनी सहमति और नियमों के अनुसार टीवी पर इन घटनाओं के कवरेज से बचने की आशा की जाती है फिर भी एएनआई ने वहां के कुछ क्लिप्स जारी किये जिन्हें कई टीवी चैनेल्स ने लगातार दिखाया भी। खुद यूपी पुलिस ने अपने ट्विटर पर इस बात को बताया कि हाजी कॉलोनी में एक मुठभेड़ चल रही है जिसके बाद कई अधिकारियों की तरफ सभी बयान आते रहे जिनका कोई औचित्य नहीं था। एमपी से जुड़े हुए प्राथमिक सबूतों के आधार पर सीएम ने विधान सभा में बयान देकर इनके बारे में अपनी सरकार की पीठ थपथपाने की कोशिशें शुरू की और इसके बाद कांग्रेस के नेताओं पीसी चाको ने भी विवादित बयान दिया जबकि मुठभेड़ से जुड़े तथ्य सामने भी नहीं आ पाए थे फिर अपनी गलती का एहसास होने पर सफाई भी दी इस तरह की घटनाओं से सभी दलों के नेताओं को शुरुवाती बयान देने से बचना चाहिए। जब यह कई राज्यों से जुड़ा हुआ मामला था तो सीएम शिवराज चौहान इस मामले में और अधिक जानकारी मिलने या केंद्रीय गृह मंत्री के संसद में विस्तृत बयान की बात कहकर मामले को समाप्त कर सकते थे. जिस तरह से एमपी ने सीधे तौर पर इनका सम्बन्ध आईएस से जोड़ दिया वहीं घटना स्थल से मिले सबूतों की अभी भी जांच की जा रही है और दोबारा जाकर सबूत इकठ्ठा करने की कोशिशें भी जारी हैं। जब एनआईए इस मामले में आ चुकी है तो सभी संबंधित पक्षों को इस पर बोलने में संयम रखना चाहिए क्योंकि सबूतों की कड़ियाँ जोड़ने में कई बार कुछ कमियां रहने से दोष साबित नहीं किया जा सकता है। देश में हर मुद्दे पर सभी को अनावश्यक बोलने की जो नयी आदत बनती जा रही है उससे बचने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि महत्वपूर्ण मुद्दों पर अब देश को क्या बोलना है यह सभी को सीखने की आवश्यकता है. 

लखनऊ में हुए आतंकरोधी अभियान में जिस तरह से यूपी की एटीएस और लखनऊ पुलिस में तालमेल की कई स्तरों पर कमी दिखाई दी भविष्य में उसके समुचित समाधान की आवश्यकता और बेहतर सामंजस्य की आवश्यकता पर बल दिया जाना चाहिए। 

सरकारों के प्रयासों से अगर भाषाएँ आगे बढ़ सकती होती और नागरिकों तथा देशों का कल्याण हुआ करता तो १९७१ में बांग्ला भाषा के आधार पर कभी इस्लाम धर्म के आधार बने अलग देश पाकिस्तान को नकार कर नया बांग्ला भाषी बांग्लादेश कभी नहीं बनता। सभी को उनकी मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार है इसे जबरिया थोपने के स्थान पर नागरिकों को उनकी मातृभाषा में उच्च शिक्षा देने का प्रबंध होना चाहिए। असोम में १९६० में ही असमिया को लागू करने को लेकर बराक घाटी में आंदोलन हुआ था और आज भी वहां बांग्ला ही आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार्य है। असोम सरकार का संस्कृत को आगे बढ़ाने का प्रयास सराहनीय है पर क्या राज्य में अब त्रिस्तरीय के जगह चार भाषा का फार्मूला लागू होगा ? क्षेत्र और भाषा को लेकर हमारे देश में पहले ही बहुत सारी समस्याएं मौजूद हैं तो अब इनको सुलझाने के स्थान पर उलझने वाले क़दमों से क्या असोम का विकास होगा ? संस्कृत के विकास के लिए यदि असोम सरकार विश्व स्तरीय संस्थान या संस्कृत विश्व-विद्यालय खोले तो उसका स्वागत है क्योंकि इससे वह संस्कृत भाषा को स्थायी रूप से लंबे समय तक शिक्षा और शोध से जोड़ने में देश की मदद कर सकती है। 
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