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Anup Sethi
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रमेश कुंतल मेघ
रमेश कुंतल मेघ का एक और रेखांकन
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रमेश कुंतल मेघ
इस वर्ष का साहित्‍य अकादमी पुरस्कार  हमारे आदरणीय और प्रिय गुरू डॉ रमेश कुंतल मेघ  को उनके वृहद् ग्रंथ विश्‍व मिथक सरित्‍सागर को दिया गया है।  डॉ मेघ को आलोचक के रूप में ही जाना जाता है।  वे कवि भी हैं, चित्रकार भी। यहां उनका एक स्‍केच देखिए   
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धोंडी दगड़ू
संजय कुमार  मजदूर दिवस पर धोंडी दगड़ू ( मुंबई शहर में 26 जुलाई 2005 को आई बाढ़ के बाद) हमने उन्हें कोसा पानी नहीं बिजली नहीं हम पैदल चलकर आए थे मीलों बारिश में भीगते हुए मरकर पहुंचे ब्रेड तक नहीं सरकार निकम्मी कुछ करती नहीं n धोंडी दगड़ू ने कचरा भरा डंपर में च...
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एक भाषा की चीख
संजय कुमार एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ...
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एक भाषा की चीख
संजय कुमार एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ...
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एक भाषा की चीख
एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ठीक रहा। पर...
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एक भाषा की चीख
एक   भाषा   की   चीख भारतीय   नौकरशाही   और   हिन्दी   की   जगह मैं 1983 में हिमाचल प्रदेश से आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्‍पादक होकर मुंबई आया।
हिंदी पढ़ी थी और साहित्‍य से प्रेम किया था , नौकरी भी हिंदी
के प्रोग्राम बनाने की मिली थी। कुछ अरसा तो ठीक रहा। पर...
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मुद्रित शब्द के परे : आभासी संसार में उथल-पुथल
अक्‍तूबर 2016 में छपे चिंतनदिशा पत्रिका के  पत्रिका-परिक्रमा स्‍तंभ में पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर  मुनि मुक्तकंठ की टिप्‍पणी छपी है। दैनिक समाचार समाचारों को एक दिन बाद रद्दी में बदलता है लेेकिन  फेसबुक  दैनिक अखबारों  से भी ज्‍यादा तेजी से चलता है और दिन...
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मुद्रित शब्द के परे : आभासी संसार में उथल-पुथल
अक्‍तूबर 2016 में छपे चिंतनदिशा पत्रिका के  पत्रिका-परिक्रमा स्‍तंभ में पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर  मुनि मुक्तकंठ की टिप्‍पणी छपी है। दैनिक समाचार समाचारों को एक दिन बाद रद्दी में बदलता है लेेकिन  फेसबुक  दैनिक अखबारों  से भी ज्‍यादा तेजी से चलता है और दिन...
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भरम का सांप
कल फिर हिन्‍दी दिवस है, हर साल की तरह। भाषा अपनी जगह, भाषा का खेल अपनी जगह चल रहा हैै। यूटीआई की नौकरी छोड़ने के बाद डायरी और हिन्‍दी पर कुछ कविताएं पहल के पिछले दौर में छपी थीं।   कविताओं में से एक अब पढ़िए।     हो तो गया काम तमाम  अब क्या चाहिए खुला है द्...
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