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Amrita Tanmay
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|| लिखत लिखत हे सखी, खुद ही लिखत जाए ||
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स्वार्थ ........
मेरे लिए मेरी हर रात महाभिनिष्क्रमण है और मेरा हर दिन महापरिनिर्वाण है स्वअर्थ में अपना दीप मैं स्वयं हूँ बस इतना ही ध्यान है , इतना ही भान है ... जहाँ सस्ती से सस्ती बोली में बिकती स्वतंत्रता है चारों ओर एक गहन संघर्ष है , खींचातानी है वहाँ जीवन में स्वयं ...
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तुझको सौंपे बिना ....
तुझसे ही है क्यों अनलिखा अनुबंध ? तुझको सौंपे बिना जो जिऊं मुझको है सौगंध ! जब केसर रंग रंगे हैं वन सुरभि- उत्सव में डूबा है उपवन गंधर्व- गीतों से गूँजे ये धरती- गगन दूर कहीं अमराई में जो कोयल कूके तो क्यों न गदराये मेरा सुंदर तन- मन ? तुझसे ही है क्यों अनज...
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जो थोड़ा- सा .........
जो थोड़ा- सा संसार का एक छोटा- सा कोना मैंने घेर रखा है वहाँ मेरे बीजों से नित नये सपने प्रसूत होते हैं मेरी कलियों में नव साहस अंकुरित होता है तब तो मेरा फूल पल प्रति पल खिलता रहता है ....... जो थोड़ी- सी मेरी सुगंध है , वो उड़ती रहती है जो थोड़ा- सा मेरा ...
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यदि मैं भी कभी गुनगुना दूँ .......
बड़ा सुख था वीणा में पर उत्तेजना से फिर पीड़ा हो गई ...... संगीत बड़ा ही मधुर था सुंदर था , प्रीतिकर था हाँ ! गूँगे का गुड़ था पर आघात से फिर पीड़ा हो गई ..... तार पर जब चोट पड़ी कान पर झनकार था शब्दों के नाद से हृदय में मदभरा हाहाकार था पर चोट से फिर पीड़ा...
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मन रे !
मन रे , भीतर कोई दीवाली पैदा कर ! अँधेरा तो केवल उजाला न होने का नाम है उससे मत लड़ बस उजाला पैदा कर ! कभी दीया मत बुझा हर क्षण जगमगा कर आँखों को सुझा ! जो दिखता है कम - से - कम उतना तो देख और मत पढ़ अँधेरे का लेख ! कर हर क्षण उमंग घना बसंत सा - ही उत्सव मन...
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शाश्वत झूठ ........
हर पल मैं अपने गर्भ में ही अपने अजन्मे कृष्ण की करती रहती हूँ भ्रूण - हत्या तब तो सदियों - सदियों से सजा हुआ है मेरा कुरुक्षेत्र हजारों - हजारों युद्ध - पंक्तियाँ आपस में बँधी खड़ी हैं लाखों - लाख संघर्ष चलता ही जा रहा है और मेरा हिंसक अर्जुन बिना हिचक के ह...
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काफी हो ..........
जितने मिले हो मेरे लिए , तुम उतने ही काफी हो ख्वाहिशें जो गुस्ताखियां करे तो तहेदिल से मुझे , शर्तिया माफी हो बामुश्किल से मैंने तूफां का दिल , बेइजाज़त से हिलाया है कागज की किश्ती ही सही मगर बड़ी हिम्मत से , उसी में चलाया है जरूरी नहीं कि , जो मैंने कहा ते...
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सच्चाई .........
मेरी अंतरात्मा की आवाज में बहुत - बहुत रूप हैं , बड़े - बड़े भेद हैं और जो - जो कान उसे सुन पाते हैं बेशक , उनमें भी बहुत बड़े - बड़े छेद हैं मेरी अंतरात्मा की आवाज में बड़ी - बड़ी समानताएं हैं , बड़ी - बड़ी विपरितताएं हैं और इनके बीच मजे ले - लेकर झूलती हुई ...
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प्रासंगिकता ......
सूक्ष्म से सूक्ष्मतर कसौटी पर जीवन दृष्टि को ऐसे कसना जैसे अपने विष से अपने को डसना .... गहराई की गहराई में भी ऐसे उतरना जैसे अपनी केंचुली को अपनापा से कुतरना ..... महत्वप्रियता सफलता लोकप्रियता अमरता आदि को रेंग कर ऐसे आगे बढ़ जाना जैसे जीवन - मूल्यों की म...
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कहो तो ..........
कहो तो तुम्हारे लिए रचने को तो मैं रच दूँ रूप- यौवन का नित नया संसार तुम्हें स्वयं में , ऐसे डुबा लूँ कि मैं ही हो जाऊँ माँझी और मैं ही मँझधार........ कहो तो , तुम्हारे लिए नित नये गीतों को दे दूँ मैं उत्तेजित उद्गार कहो तो , नित नई वीणा पर छेड़ दूँ रति- रा...
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