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Amrit Kumar
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Amrit Kumar

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कुछ रिश्ते ऊपर वाला हमें देके भेजता है,
कुछ रिश्ते हम खुद अपने लिए इस दुनिया में चुनते हैं..
याद है वो दोस्त जो दूसरी लाइन में बैठा अपने स्लेट से तुमको गुणा भाग का जवाब बताता था,
वो जिसे तुम शनिवार वाली फिल्म ख़त्म होने के बाद उसकी गली तक छोड़ के आते थे,
वो दोस्त जो एक जेब में तुम्हारे लिए मूंगफली भर के लाता था,
और जो आगरा जाके वो खिलौना लेके आता था जिसमे पानी डालने पर ताजमहल दिखता था,
वो दोस्त जो तुम्हे कैरियल पे बिठा के स्कूल ले जाता था,
और तुम वापस उसे बिठा के स्कूल से वापस घर लाते थे,
वो दोस्त जो तुम्हारे पास पेंसिल न होने पर अपनी पेंसिल आधी तोड़ दिया करता था,
और तुम्हारी आधी नटराज की रबर जिसके पास पायी जाती थी,
वो दोस्त जो तुम्हारे लिए सीनियर क्लास के लड़कों से भिड़ जाता था,
और मुंह से खून निकलने तक मार खाता था,
वो जिसके साथ तुम मिल के अपना लंच खाते थे,
वो दोस्त जिसके साथ तुमने जिंदगी का पहला बंक मारा और मॉर्निंग शो में फिल्म देखी,
वो दोस्त जिसने तुम्हारे पहले क्रश को जिंदगी भर भाभी कहा,
और उसकी शादी वाले दिन तुम से ज्यादा जज्बाती होकर बियर पी,
वो दोस्त जो खुद तो क्वालीफाई न कर पाया,
पर तुम्हारे इंजीनियर बनने पर बहुत खुश हुआ था,
वो दोस्त जिसे तुम अपने नए दोस्तों से मिलके भूलने लगे थे..
वही दोस्त जिसको फाइनल ईयर तक पहुँचते पहुँचते तुमने अवॉयड ही करना शुरू कर दिया था..
वही दोस्त जो जो तुम्हारे परिवार के साथ तुम्हे नौकरी ज्वाइन करने से पहले स्टेशन विदा करने आया था..
उसकी हंसी आज तक नहीं बदली थी, पर तुम उसको देख के खुल के नहीं मुस्कुराये थे,
वही दोस्त जो तुम्हे नए शहर में भी अक्सर कॉल करता रहा,
जब तक कि तुमने अपना नंबर नहीं बदल लिया और उसको नया नंबर नहीं दिया..
वो जो ऑरकुट पर तो तुम्हारा दोस्त था लेकिन फेसबुक पर तुमने उसकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट भी नहीं की थी..
आज जब 5 साल बाद अपनी शादी के कार्ड बांटने तुम जा रहे हो,
उसी की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे हो,
और वो आगे भाग भाग कर तुम्हारे रिश्तेदारों के पैर छू छू के उसी उत्साह के साथ कार्ड बाँट रहा है,
मानो उसकी दोस्ती में वक़्त का कोई हैजीटेशन ही न हो,
वो पलट के तुम्हे देखता है,
तुम उदास हो, खुद पर शर्मिंदा भी,
वो इस बार भी तुम्हे समझ जाता है,
कंधे पर हाथ रख के कहता है,
अबे क्यों सेंटिया रहा है, तेरी विदाई थोड़े ही न होनी है, बहुत काम है भाई, अभी तो फुल टाइट होके तेरी बरात में नाचना भी है,
तुम खुद की नज़रों में ही गिर गए हो,
इस से पहले कि तुम रोओ,
वो तुम्हे गले लगाता है, और कहता है...अबे चलता है ये सब..मैं नहीं समझूंगा तो कौन समझेगा..
बाइक चल पड़ती है, और बाइक पे पीछे बैठे हुए तुम्हारे आंसू भी........ :'(
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Amrit Kumar

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All time sweets song..The legend of India!
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Amrit Kumar

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गाँवो में ऐसी गर्मी की रातो में छत पे सोये सोये तारो को देखना, फिर जिस दिन स्कूल में गुरु जी से सप्तर्षि तारो के समूह के बारे में जाना उसके बाद वो सात तारे अपनी खास जान पहचान वाले तारो से लगने लगे थे,
रात को उस सप्तऋषि तारो के समूह को देखते हुये सोने की आदत कई सालो तक बरक़रार रही,
रात को गांव के तालाब के पास वाले पीपल और नीम के पेड़ो से बह कर आने वाली ठंडी हवाओ के झोंको से टकरा कर हम कब अपनी सपनो की दुनिया में खो जाते थे पता भी न चलता था,
और नींद सुबह चिड़ियों की चहचहाहट, गायों के गले की घंटियों और सूर्य देव के आने की आहट से ही खुलती थी,
वैसे इनमे एक साइंस ये भी था की सुबह चिड़ियों की चहचहाहट और गाय के गले की घंटियो की आवाज़ से हर जगह पॉजिटिव ऊर्जा का संचार होता है, हमारे बड़े बुजुर्ग कितने विद्वान थे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है,
उस सुकून भरी नींद के लिए न तो कभी हीट स्प्रे करने की जरुरत पड़ी न कभी आल आउट जलाने की,
अब के इन महंगे ऐसी और महंगे बिस्तरो में भी सोते वक़्त हमे कल की चिंता, फ्यूचर के लिए इन्वेस्टमेंट, टैक्स सेविंग, बच्चों के भविष्य की चिन्ता के झोंको में टकरा कर कब नींद लग जाती है पता ही नहीं चलता, और अगले दिन सुबह से हम अपने उस अंजान से डर के लिए मशीनों की तरह दौड़ भाग जारी रखते हैं,
जिंदगी तब भी बहुत स्मूथ थी जब हम बेपरवाह हुआ करते थे,
तब और आज में फर्क ये है, तब हम प्लांनिग किया करते थे और अब चिंता,
जो चीजे जैसी हैं उन्हें वैसे ही चलने दीजिये क्योंकि वो महज़ हमारे चिंता करने से नहीं सुधारी जा सकती हैं,
इसीलिए हमारे गुरु जी कहते थे, इस दुनिया की सत्ता चलाने वाले पर इतना भरोसा रखियेगा जिस दिन स्थितियां आउट ऑफ़ कन्ट्रोल होगी उस दिन वो भी आप को स्तिथियों को आउट ऑफ़ आर्डर जाकर कंट्रोल करने लायक सक्षम बना ही देगा :D
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Amrit Kumar

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97% of the people who quit too soon are employed by the 3% who never gave up!
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Amrit Kumar

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जब चक्रव्यूह में घुस ही गए हैं तो गिरने तक लड़ेंगे..ये लड़ाई हमने चुनी नहीं है..मैदान भी नहीं चुना है...दुश्मन भी नहीं चुना है..देश का भला चाहा..क्यों चाहा वो भी नहीं पता...हमेशा लगा कि कुछ गलत घट रहा है आसपास...कुछ ऐसा है हमारे पास जिसे लोग लूट रहे हैं...कुछ ऐसा है जिसे नहीं बचाया तो वो नहीं बचेगा...पता ही नहीं चला बचाते बचाते कब रणभेरी बज गयी..और कब हमारे हाथों में तलवार आ गयी...लड़ते लड़ते तुम मिले..हम सब मिले..हम सब एक ही तरफ से लड़ रहे थे..अहसास हुआ कि हम अकेले नहीं हैं इस लड़ाई में..और भी बहुत हैं जो उसको बचाने के लिए लड़ रहे हैं जिसे नहीं बचाया तो वो नहीं बचेगा...सामने वाली सेना बहुत बड़ी थी..उनके अस्त्र शस्त्र..सब बड़ा था..लेकिन हमारा हौसला उस से कहीं ज्यादा बड़ा था..एक दुसरे के कंधे पे चढ़ के हमने हाथियों पर बैठे उनके तीरंदाज मारे...
शायद हज़ार साल से कुछ सुलग रहा था हम सब के अवचेतन में...पहले भी बुजुर्गों से सुना था ऐसी लड़ाइयां हुईं..आंशिक सफल भी हुए कई बार..कई बार दुश्मन भाग गया..लेकिन अगले ही पल वापस आके उसने उनके गले काट डाले..
इस बार की लड़ाई में हमने उन्हें नदी के पार तो ठेल दिया है...पर इस बार नदी के इस किनारे से वापस लौटेंगे नहीं..कम से कम हम तो नहीं....वो वापस आ रहा है..हमें दिख रहा है...वो भेस बदल के आ रहा है..अपनी ताकत बढ़ा के आ रहा है...हमारी आग राख नहीं हुई है अभी....क्या हुआ जो Leonidas नहीं बन पाया...वो कुबड़ा कम से कम मैं तो कभी नहीं बनूँगा...
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Amrit Kumar

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आज एक तस्वीर देखी , 
जो मुझे कुछ अपनी सी लगी , 
जिसने उकेर दिया शाम के कोहरे में तुम्हारा अक्स !
नही, 
वास्तव में , 
तुमसा कोई नहीं था उसमे बस वो थी कुछ धुंधली सी , 
कुछ बनावटी सी , 
मेरी समझ से परे !! 
बिल्कुल वैसे ही जैसे हम दोनो की समझ थीं एक दूजे की समझ से परे !! 
कोई इमारत नजर आ रही थी धुंधली सी उसमें , कुछ कुछ वैसी जैसी तुम हमेशा अपने सपनों मे देखती थीं , और बताती थीं मुझे ! 
सामने सड़क पर नजर आ रहे हैं कुछ अनजाने लोग जिनके चेहरे नहीं दिख रहे मुझे , बिल्कुल वैसे ही जैसे जब अब तुम्हारा चेहरा अनजान सा लगता है मुझे , 

ऐसा प्रतीत होता है मानो वही धुंध छा गई है इस तस्वीर पर जो हम दोनो के बीच छाई है !! 

लेकिन फिर भी एक उम्मीद है इस मन में , 
ये धुंध हटेगी जब उगेगा एक सवेरे को अपने आंचल में समेटे प्रेम रूपी सूर्य,, 
जब साफ होंगे चेहरे तभी साफ होगी ये तस्वीर! और शायद तभी पहचान सकूँगा मैं इस तस्वीर में मौजूद अपनों और परायों को !!
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Amrit Kumar

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बाबर के वंशजों को भी अपना हिस्सा चाहिए था उन्होंने पाकिस्तान बांग्लादेश ले लिया...अब अपने आप को पटेल के वंशज बताते हुए आरक्षण की मांग है..क्या हो अगर कल भगत सिंह के नाम पर..सुभाष बाबू के नाम पे..अशफाक उल्ला खान के नाम पे..लाल बहादुर शाश्त्री के नाम पे..चंद्रशेखर आज़ाद के नाम पे..अब्दुल कलाम के नाम पे..वीर अब्दुल हमीद के नाम पे..इतिहास पुरुष महाराणा प्रताप के नाम पर..हिन्दू गौरव पृथ्वीराज चौहान और वीर शिवाजी के नाम पर...गुरुनानक के नाम पर भी आरक्षण माँगा जाएगा...व्यक्तिगत राजनैतिक आकांक्षा में शर्म तो ख़ैर बची नहीं है पर क्या बेशर्मी इतनी सामूहिक हो सकती है.......
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Amrit Kumar

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“No one can hurt you without your consent.”
“It is not what happens to us that hurts us. It is our response that hurts us.
Be excellent at your work no matter what work you do, Happiness is always yours."   :D :D
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Amrit Kumar

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When you saw him, thought of him, you did not think 'Muslim' you did not think 'tamilian' first, you did not think 'boatman's son'. You did not think of how to slot him in our multi lingual multi cultural multi religious Indian terms. you thought....at least I thought what a combination of brilliance, greatness, and without the need to dominate. #Humility is a much abused word and I don't want to use it here. He kept it real always. And you felt so proud he belonged to India and his heart beat for India and he dreamed big for us. I wish I can live like that.....
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Amrit Kumar

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एक वो दौर था जब होलिका दहन के लिए लकड़ियों का जुगाड़ भिड़ाना देश की डूबती अर्थव्यवस्था को उबारने से भी बड़ा चुनौती भरा काम लगता था, लकड़ियों की कमी होने पर इधर उधर से दूसरों की लकड़ियाँ चुराना अपने आप में एलिजाबेथ के ताज से कोहिनूर चुराने वाली फीलिंग दे जाता था, होलिका का साइज बड़ा करने के लिए उसमे मोहल्ले भर की झाड़ियों और कचरे का डेकोरेशन करना भी बचपने का इवेंट मैनेजमेंट ही था, फिर होली के लिए वार्निश, गुब्बारे, पक्के रंग, मुखौटे और पिचकारियों से लैस होकर होली की सुबह से दोपहर तक मोहल्ले भर में घूम घूम के होली खेलने का एक अलग ही मज़ा था, तब किसी बाइक सवार को निशाना लगा के गुब्बारा मार के भाग जाना दुश्मन को हैंड ग्रेनेड मार के घायल करने बराबर काम ही लगता था, हर किसी का कोई न कोई ऐसा दोस्त जरूर होता था, जो किसी बड़े आदमी से काले रंग से पुतने के बाद उसे गुंडा बदमाश बता के दहाड़ मार मार के रोता भी था,
फिर समय कुछ आगे बढ़ने के बाद कॉलेज वाले दिनों में होली के एक दिन पहले अपनी अपनी बोतल का इंतज़ाम कर के सुरक्षित स्थान पर रखना होली पे लौंडो का सबसे जरुरी काम होता था, फिर दोपहर होते होते चेहरे पे बॉलीवुड स्टाइल में गुलाल लगा के अपनी वाली के गली के दो चार चक्कर मार लेना और अपनी वाली को छत पर देख के मन ही मन खुश हो लेना ही होली का सार होता था,
और अब होली भी इतनी फुर्सत वाली होती है की दिन भर टीवी देख के होली का दिन बिता लिया जाता है,
त्यौहार वही रहते हैं, बस समय बीतता जाता है, उम्र बढ़ती जाती है और समय के साथ हम सब की प्राथमिकताएं बदलती जाती है..आप ये सब सोच के गंभीर हो ही रहे होते हो कि अचानक आपके दोस्तों की टोली घर पे छापा मार देती है..फिर दे गुलाल दे लत्ते दे पानी  :)
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Amrit Kumar

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YESTERDAY,JUST BEFORE THE FESTIVAL OF #HOLI.....ENTRY,POSTING AND PAYMENTS FOR VIDHWA,VIKLANG AND VIRDHA HAS BEEN DONE TO NEARLY 13000 PEOPLE AT MY BRANCH......HMMM.... SOMETIMES IT FEELS PROUD TO BE A BANKER :)
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Amrit Kumar

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अंधियारी रात - 
*****
अंधियारी रातो में अक्सर डर लगा करता था..ये तब की बात है जब कसबे में बिजली हफ्ते दो हफ्ते में एक घंटे आती थी..और जब आती थी तो पूरे मोहल्ले में शोर मचता था. तिराहे वाला बल्ब शायद ही कभी जला हो. 3 महीने में कभी बिजली वाले आकर नया बल्ब लगाते थे जिसे भोलू अगले ही दिन गुलेल से तोड़ दिया करता था और बुजुर्गों की गाली और लौंडो की शाबाशी पाता था. हाँ तो मैं कह रहा था अंधियारी रातो से डर लगता था. मैं बहुत छोटा था और बचपन से ही अलग खटोले पे सोता था. हालांकि मेरे खटोले की ऊँचाई उतनी नहीं थी की एक चूहा भी बिना अटके निकल जाए लेकिन मुझे हमेशा लगता था की कोई सांप है जो पाए से लिपटा हुआ होगा या कोई भूत जो मेरी चादर खींच रहा है. हालांकि कहानी सुनना मुझे अच्छा लगता था लेकिन एक वजह डर भी थी जो मैं नानाजी से कहानी सुनाने को कहता..उनकी आवाज सुनके मेरा डर निकलता जाता और कहानी के बीच बीच में "हाँ" "हाँ" करते में सो जाता. कही दूर से आती रेडियो के गाने की आवाज पे सोचता की जो रेडियो बजा रहा है शायद ये बड़ा होके हीरो बनेगा, मुझे रात को खिड़की से झांकते हुए चौकीदार की टोर्च से भी उतना डर लगता था जितना उसकी सीटी से या उसकी उसकी लाठी से. शायद रात होने के बाद रसोई में बर्तनों की खटपट मुझे ही सुनाई देती थी, और मैं किसी संभावित खतरे की आढ़ में चादर से आँख निकाले दरवाजे की ओर देखता रहता था. रोज भगवान् से प्रार्थना करता की भगवान् किसी के यहाँ चोरी न हो, किसी का मर्डर न हो..लेकिन इस प्रार्थना में "किसी" का मतलब मेरा खुद अपने परिवार से होता था. अंधियारी रात में हवा भी थोड़ी ठन्डी रहती थी ओर दूर दराज की आवाजें भी साफ़ सुनाई देती थी...ऐसे में दूर गली में कुत्ते का भोंकना मेरे लिए संकेत होता था की चोर ओर डाकू मोहल्ले में आ चुके हैं. मेरा दिल जोर से धड़कने लगता था..ओर जैसे जैसे वो आवाज मेरे घर के पास आती जाती मैं सिर्फ भगवान् को याद करता ओर उन्हें याद दिलाता की मैं कितना अच्छा हूँ, कभी झूट नहीं बोलता, बेईमानी नहीं करता, मंदिर जाता हूँ, बड़ो का आदर करता हूँ, गाली नहीं देता, हाँ वो मुकेश तो खूब गालियाँ देता है..फिर ये कुत्ते उसके घर के बाहर क्यों नहीं भौंक रहे. ये प्रार्थना तब तक चलती जब तक कुत्तों की आवाज़ अपनी गली से दूसरी गली तक न चली गयी हो. तभी अक्सर नानी मुझे देखने आतीं की ये सो रहा है या नहीं..मेरे माथे पर हाथ फेरती, ओर मेरे खटोले के साथ वाली छोटी खिड़की खोल देतीं..उस खिड़की से आती ठंडी हवा के बीच में मैं सो जाता. ये उन दिनों की बात है जब सुबह की चाय स्टोव पे ओर खाना चूल्हे में बनता था.
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Nice story.God bless you Amrit Kumar.
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