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शत्रुघ्न दास
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Blessed and restful night magical dreams For all of you my dear friends 💕 🙏🙏
Jai Shree Krishna 🙏🙏🌷🌷🙏🙏
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परम पूर्णता का अर्थ ही है कि वे निराकार और साकार दोनों हैं । इसकी पुष्टि भगवान् स्वयं भगवद-गीता के श्लोक संख्या ७.२४ में करते हैं और श्रील प्रभुपाद भी अपने तात्पर्य में बताते हैं, “श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि निर्विशेष या निराकार ब्रह्म से ही परम अनुभूति प्रारंभ होती है जो आगे बढ़कर अन्तर्यामी परमात्मा तक जाती है, किन्तु परमसत्य की अन्तिम अवस्था भगवान् ही हैं |”
तो जो आपका प्रश्न है कि ‘परम पूर्ण’ निराकार क्यों नहीं हो सकता ? वे निराकार भी हैं और साकार भी, इसलिए अर्जुन १२.१ में पूछते हैं कि किसकी भक्ति सही है साकार की या निराकार की ?
भगवान् १२.२ में बताते हैं कि जो साकार रूप में उनकी भक्ति करते है वही सम्पूर्ण रूप से उन्हें जान पाते हैं।
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यद्यपि कृष्णभावनामृत रुग्ण व्यक्ति को अत्यंत रोचक नहीं लगता तो भी श्रील रूप गोस्वामी का यह परामर्श है कि यदि कोई भवरोग से अच्छा होना चाहता है तो उसे इस कृष्णभावनामृत को बड़ी ही सावधानी तथा मनोयोग से ग्रहण करना होगा ।
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ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द: विग्रह:,
अनादिरादि गोविन्द: सर्व कारण कारणम: |

भगवान तो कृष्ण है, जो सच्चिदानन्द (शास्वत,ज्ञान तथा आनन्द के) स्वरुप है | उनका कोई आदि नहीं है , क्योकि वे प्रत्येक वस्तु के आदि है | वे समस्त कारणों के कारण है |
- (ब्रह्म संहिता ५.१)
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भक्ति-पद तक ऊपर उठने के लिए हमें पांच बातों का ध्यान रखना चाहिए : 1. भक्तों की संगति करना, 2. भगवान कृष्ण की सेवा में लगना, 3. श्रीमद् भागवत का पाठ करना, 4. भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करना तथा 5. वृन्दावन या मथुरा में निवास करना | यदि कोई इन पांच बातों में से किसी एक में थोडा भी अग्रसर होता है तो उस बुद्धिमान व्यक्ति का कृष्ण के प्रति सुप्त प्रेम क्रमशः जागृत हो जाता है (CC.मध्य लीला 24.193-194) |
कृष्णभावनामृत हमारी चेतना को निर्मल तथ शुद्ध बनाने की विधि है |  जब मनुष्य हर वस्तु को अपनी मानता है तब वह भौतिक चेतना में रहता है और जब वह समझ जाता है कि हर वस्तु श्री कृष्ण की है तो वह कृष्णभावनामृत को प्राप्त कर लेता है | कृष्णभावनामृत में की गयी प्रगति कभी नष्ट नहीं होती | जिसने कृष्ण के प्रति प्रेम उत्पन्न कर लिया वही भक्त है | गीता (6.41-43) में भगवान कृष्ण कहते हैं: “यदि भक्ति पूरी नहीं भी होती तो भी कोई नुकसान नहीं हे क्योकि असफल योगी पवित्र आत्माओ के लोक में अनेक वर्षो तक भोग करने के बाद या तो सदाचारी पुरुषों के परिवार में या धनवानो के कुल में जन्म लेता हें | ऐसा जन्म पा कर वह अपने पूर्व जन्म की देवी चेतना को पुनः प्राप्त करता हे और आगे उन्नति करने का प्रयास करता है” |
कृष्णभावनामृत में प्रगति करते समय हमें एक बात का और विशेष ध्यान रखना है: भगवान, भगवान के नाम तथा भगवान के भक्त के प्रति कभी भी अपराध नहीं करना है | इससे बचने का सरल उपाय है अपने आप को दीन तथा भगवान का दास समझना | भगवान ही केवल कर्ता है, हम तो अयोग्य व अधम है | सब में भगवान की उपस्थिति महसूस करते हुए सबको सम्मान दें | तथा साथ ही जो व्यक्ति दूसरों के गुणों तथा आचरण की प्रशंसा करता है या आलोचना करता है, वह मायामय द्वैतों में फसने के कारण कृष्णभावनामृत से विपथ हो जाता है (SB.11.28.2) |
भक्तिहीन व्यक्ति के लिए उच्च कुल, शास्त्र-ज्ञान, व्रत, तपस्या तथा वैदिक मंत्रोच्चार वैसे ही हैं, जैसे मृत शरीर को गहने पहनाना (CC.मध्य लीला 19.75) | प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है कि मनुष्य को कर्म, ज्ञान तथा योग का परित्याग करके भक्ति को ग्रहण करना चाहिए, जिससे कृष्ण पूर्णतय तुष्ट हो सकें  (CC.मध्य लीला 20.136) | भक्ति के फलस्वरूप मनुष्य का सुप्त कृष्ण प्रेम जागृत हो जाता है | सुप्त कृष्ण-प्रेम को जागृत किये बिना कृष्ण को प्राप्त करने का अन्य कोई साधन नहीं है (CC.अन्त्य लीला 4.58) | गीता (BG.18.58) में भगवान कृष्ण कहते हैं: यदि तुम मेरी चेतना में स्थित रहोगे तो मेरी कृपा से बद्ध-जीवन के समस्त अवरोधों को पार कर जाओगे | लेकिन यदि मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नही करोगे, तो तुम विनिष्ट हो जाओगे | तथा  “जब भक्ति से जीव पूर्ण कृष्णभावनामृत में होता है तो वह वैकुण्ठ में प्रवेश का अधिकारी हो जाता है” (BG.18.55) |
शुकदेव गोस्वामी कहते हैं: “हे राजन!, जो व्यक्ति भगवन्नाम तथा भगवान के कार्यो का निरन्तर श्रवण तथा कीर्तन करता है, वह बहुत ही आसानी से शुद्ध भक्ति पद को प्राप्त कर सकता है | केवल व्रत रखने तथा वैदिक कर्मकांड करने से ऐसी शुद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती” (SB.6.3.32) | भक्ति के बिना कोरा ज्ञान मुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं है, लेकिन यदि कोई भगवान कृष्ण की प्रेममयी सेवा में आसक्त है तो वह ज्ञान के बिना भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है (CC.मध्य लीला 22.21) | मुक्ति तो भक्त के समक्ष उसकी सेवा करने के लिए हाथ जोड़े खड़ी रहती है |
नियमित भक्ति करते रहने से हृदय कोमल हो जाता है, धीरे धीरे सारी भौतिक इच्छाओं से विरक्ति हो जाती है, तब वह कृष्ण के प्रीति अनुरुक्त हो जाता है | जब यह अनुरुक्ति प्रगाढ़ हो जाती है तब यही भगवत्प्रेम कहलाती है (CC.मध्य लीला 19.177) | यदि कोई भगवत्प्रेम उत्पन्न कर लेता है और कृष्ण के चरण-कमलों में अनुरुक्त हो जाता है, तो धीरे-धीरे अन्य सारी वस्तुओं से उसकी आसक्ति लुप्त हो जाती है  (CC.आदि लीला 7.143) |भगवत्प्रेम का लक्ष्य न तो भौतिक दृष्टि से धनी बनना है, न ही भवबंधन से मुक्त होना है | वास्तविक लक्ष्य तो भगवान की भक्तिमय सेवा में स्थित होकर दिव्य आनन्द भोगना है | जब मनुष्य भगवान कृष्ण की संगति का आस्वादन कर सकने योग्य हो जाता है, तब यह भौतिक संसार, जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है  (CC.मध्य लीला 20.141-142)|
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शत्रुघ्न दास

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Hari Bol
..Dedicated to lotus feet of KRSNA.....
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प्रश्न : क्या भगवान इतने बड़े हैं कि वे किसी चित्र के द्वारा दर्शाये नहीं जा सकते ? मेरा एक ईसाई मित्र है जो कहता है कि भगवान इतने महान एवं व्यापक हैं कि वे किसी चित्र द्वारा दर्शाये नहीं जा सकते । कम से कम इतने तो नहीं कि उनका चित्र हम जेब में ले कर घूम सकें ।

उत्तर : जी हाँ भगवान इतने महान एवं व्यापक हैं की हम उन्हें देख भी नहीं सकते मगर वे कितने भी महान क्यों न हों उनकी कृपा उनसे भी महान है । ये उनकी कृपा ही है कि जो हमारे दृष्टि से परे हैं वे भगवान स्वयं को विग्रह रूप में हमारे लिए सुलभ करते हैं । वे लोग जो एक तरफ तो कहते हैं कि भगवान इतने महान हैं कि किसी चित्र द्वारा दर्शाये नहीं जा सकते, भगवान की महत्ता को स्वीकारते हैं परन्तु ऐसे लोग उनकी महान कृपा को सीमित कर देते हैं । भगवान महान हैं इसलिए वे कुछ भी कर सकते हैं । और कुछ भी कर सकने का तात्पर्य ये है कि वे स्वयं को हमारी दृष्टि के समक्ष प्रकट भी कर सकते हैं ।

हाँ वे अनंत हैं और उसी अनंत का एक भाग हमारी सीमित दृष्टि के लिए अपने आप को सीमित रूप में प्रकट करता है । और एक सिमित रूप कैसे असीमित भगवान को प्रकट करता है यही उनकी शक्ति का प्रतीक है । हम सीमित जीव यह नहीं कर सकते । असीमित को सीमित में नहीं बाँधा जा सकता परन्तु भगवान अनंत होने के साथ साथ अनंत शक्ति और कृपा के स्वामी भी हैं और वे स्वयं को हमारे समक्ष सीमित रूप में प्रकट करते हुए भी असीमित रहते हैं । जिस प्रकार एक छोटा बालक हाथी के माथे को छूने का प्रयास करे तो वह नहीं छू पायेगा परन्तु अगर वह हाथी बैठकर अपना माथा आगे कर दे तो बालक सरलता से छू लेगा । उसी प्रकार हम जीवात्मा परम भगवान को जानने एवं प्रेम करने का प्रयास कर रहे हैं । परन्तु वे जीवात्मा की पहुँच से दूर हैं । इसलिए भगवान, विग्रह रूप में प्रकट होकर स्वयं को हमारे लिए सुलभ करते हैं ताकि हम उन्हें छू सकें, उनकी सेवा कर सकें और इस तरह उनके प्रति प्रेम उत्पन्न कर सकें ।

हमारी आँखें हमारी चेतना का प्रमुख प्रवेश द्वार हैं इसलिए अगर हम भगवान के प्रति समर्पित होना चाहते हैं तो हमें अपनी आँखों को भक्तिमय एवं आध्यात्मिक दिशा में निर्देशित करना होगा । भगवान के विग्रहों के द्वारा हम अपनी आँखों को निर्देशित करने में सक्षम हो पाते हैं । इस तरह वे असीमित भगवान कृपापूर्वक स्वयं को विग्रह रूप में प्रकट करके हमारे लिए सुलभ हो जाते हैं और उन विग्रहों के चित्रों को लेकर हम अपनी सीमित आँखों द्वारा भक्ति कर सकते हैं । इस प्रकार हम उनके निकट जाकर उनको पा सकते हैं ।
इस तरह भगवान की महत्ता एवं व्यापकता किसी चित्र द्वारा सिमित नहीं होती परन्तु वे सीमित रूप में प्रकट होकर भी अपनी असिमितता को प्रकट करते हैं । यही उनकी अनंत शक्ति और कृपा का द्योतक है ।

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+Mangilal Bhati jai shri krishn pranam
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ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द: विग्रह:,
अनादिरादि गोविन्द: सर्व कारण कारणम: |

भगवान तो कृष्ण है, जो सच्चिदानन्द (शास्वत,ज्ञान तथा आनन्द के) स्वरुप है | उनका कोई आदि नहीं है , क्योकि वे प्रत्येक वस्तु के आदि है | वे समस्त कारणों के कारण है |
- (ब्रह्म संहिता ५.१)
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शत्रुघ्न दास

Hindu Knowledge, Wisdom, Stories & Philosophies  - 
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Ashvini Swamy's profile photo
 
One of my most beloved pic of Kanhaaji......wish you had the whole picture.
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-- 'हरे राम' पहले या 'हरे कृष्ण' --
शुकदेव गोस्वामी ने कहा, "प्रिय राजन, परीक्षित महाराज, मैंने इस युग के कई दोषों की व्याख्या कर दी है और आप अब भ्रान्ति में पड़ गए हैं । यह एक दोषों के सागर के समान है । परन्तु इस युग में विशेषतः एक लाभ है । वह क्या है?
कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्त-संगः परम व्रजेत (श्रीमद भागवत १२.३.५१) 
"यदि केवल यह पद्धति लागू कर दी जाती है, हरे कृष्ण मन्त्र, "कीर्तनाद एव कृष्णस्य, यह हरे कृष्ण । कभी कभी लोग आकर हमसे झगड़ते हैं कि, "आप 'हरे कृष्ण' क्यों बोलते हैं ? आप 'हरे राम' क्यों नहीं बोलते ?"
कदाचित आपको इसका अनुभव होगा । परन्तु शास्त्र कहते हैं, कीर्तनाद एव कृष्णस्य । इसका यह अर्थ नहीं है कि हम राम को परम भगवान् स्वीकार नहीं करते, .... नहीं इसका यह अर्थ नहीं है । 
शास्त्र कहते हैं, कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्त संगः परम व्रजेत । और शास्त्र में यह भी वर्णित है कि यदि आप विष्णु सहस्त्रनाम का जप करते हैं, भगवान् विष्णु के नामों को हज़ार बार बोलेंगे तो वह एक राम-नाम के तुल्य है । आप तीन बार राम-नाम जप करते हैं तो वह एक कृष्ण-नाम के तुल्य है । यह शास्त्र में कहा गया है ।
तो यह हरे कृष्ण ... निःसन्देह कई पुराणों में आरंभ 'हरे राम' से है, परन्तु कई अन्य पुराणों में 'हरे कृष्ण' है । तो हमें कोई आपत्ति नहीं है, आप 'हरे राम' से आरम्भ कीजिये या 'हरे कृष्ण' से, हमें कोई आपत्ति नहीं है । परन्तु शास्त्रों में कहा गया है, कीर्तनाद एव कृष्णस्य । राम और कृष्ण, कोई अंतर नहीं है परन्तु शास्त्र में कहा गया है, कीर्तनाद एव कृष्णस्य । इसलिए शास्त्रों के निर्णयानुसार यह 'हरे कृष्ण' है । 
इसमें कोई असहमति नहीं है, कोई आपत्ति नहीं है - आप हरे कृष्ण जपिए या हरे राम ।
- श्रील प्रभुपाद प्रवचन 
१६ अप्रैल १९७६, मुंबई
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