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Shatrughna Das
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परमात्मा - "मैं किसी में स्थित नहीं हूँ" !!!

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ॥

मुझ अव्यक्त रूप परमात्मा द्वारा अर्थात मेरा जो परम भाव है, जिसका स्वरुप प्रत्यक्ष नहीं है यानी मन, बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है, ऐसे मुझ अव्यक्त मूर्ति द्वारा यह समस्त जगत व्याप्त - परिपूर्ण है। उस अव्यक्त स्वरुप मुझ परमात्मा में ब्रह्मा से लेकर स्तंबपर्यंत समस्त प्राणी स्थित हैं। क्योंकि कोई भी निर्जीव प्राणी व्यवहार के योग्य नहीं समझा जाता अतः वे सब मुझमें स्थित हैं अर्थात मुझ परमात्मा से ही आत्मवान् हो रहे हैं, इसलिए मुझमें स्थित कहे जाते हैं। उन भूतों का वास्तविक स्वरुप मैं ही हूँ इसलिए अज्ञानियों को ऐसी प्रतीति होती है कि मैं उनमें स्थित हूँ, अतः कहता हूँ कि मैं उन भूतों में स्थित नहीं हूँ। क्योंकि साकार वस्तुओं की भाँति मुझमें संसर्ग दोष नहीं है। इसलिए मैं बिना संसर्ग के सूक्ष्म भाव से आकाश के भी अन्तर्व्यापी हूँ। संगहीन वस्तु कहीं भी आधेय भाव से स्थित नहीं होती यह प्रसिद्ध है।
(श्रीमद्भगवद्गीता ; अध्याय - ९ , श्लोक - ४)

भगवान् यह क्या कह रहे हैं - अव्यक्त मूर्ती ?! अव्यक्त मूर्तिमान कैसे हो सकता है ??
मन, बुद्धि और समस्त इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ) की मनन करने, निश्चय करने, देखने, सुनने, सूँघने, बोलने, इत्यादि की सीमा है। अपने-अपने सीमाओं से परे की उपलब्धि इनके द्वारा संभव नहीं है। अतः जिस परमात्म तत्व से सारा जगत व्याप्त है अर्थात परिपूर्ण है वह हम सब के द्वारा प्रत्यक्ष कदापि नहीं हो सकता है। किन्तु, ब्रह्मा से स्तम्ब पर्यन्त जिस परमात्म तत्व से समस्त जगत परिपूर्ण है उस परमात्म तत्व स्वरुप भगवान् के लिए प्रत्यक्ष है अतः जो हमारे लिए अव्यक्त है वह भगवान् के लिए मूर्तिमान है। यह भी सिद्ध हो जाता है कि ब्रह्मा तथा अन्य देव भी हमारी तरह ही मन, बुद्धि और इन्द्रियों की सीमा के अंतर्गत ही हैं। अंतर इतना ही है कि उनकी मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ उत्कृष्ट श्रेणी की हैं। वे भी मुक्त नहीं हैं - बंधन में हैं।

मूर्त पदार्थ अमूर्त पदार्थ का आधार कभी नहीं होता और अमूर्त पदार्थ कभी मूर्त का आधेय नहीं होता अर्थात अमूर्त पदार्थ को मूर्त पदार्थ की आधार के रूप में आवश्यकता नहीं होती। घड़ा मिट्टी का रूपांतर मात्र है। मिट्टी का ही एक नया नाम और रूप घड़ा है। एक घड़े की उत्पत्ति, स्थिति और लय तीनों आकाश में होती है। मिट्टी घड़ा बने या घड़ा मिट्टी हो जाए आकाश में कोई परिवर्तन नहीं होता है। घड़े में रखे जल का आधार अवश्य घड़ा है किन्तु, घड़े में उपलब्ध आकाश का आधार घड़ा नहीं है। मिट्टी और घड़ा दोनों ही आकाश के आधार नहीं हैं। कोई भी पदार्थ / वस्तु / तत्व अपने आधार में ही स्थित होती है। मिट्टी और घड़ा दोनों हमेशा आकाश में स्थित हैं। आकाश मिट्टी और घड़े का आधार है लेकिन, मिट्टी और घड़ा आकाश के आधार नहीं हैं इसलिए मिट्टी और घड़ा आकाश में स्थित है जबकि आकाश घड़े में स्थित नहीं है।

सामान्य युक्ति से भी - कमरे में मेज होता है मेज में कमरा नहीं हो सकता है। बड़े में छोटे का होना ही संभव है। छोटे में बड़ा कैसे समा सकता है ?!

हम सब के आधार परमात्मा हैं अतः हम सब परमात्मा में स्थित हैं। भगवान् सूक्ष्म भाव से आकाश के भी अन्तर्व्यापी हैं अतः आकाश भी परमात्मा में स्थित है। परमात्मा मन, बुद्धि और इन्द्रियों तथा समस्त जगत में अव्यक्त रूप से व्याप्त हैं अतः ये सब भी परमात्मा में स्थित हैं। लेकिन, हम परमात्मा के आधार नहीं हैं अतः परमात्मा हम सब में स्थित नहीं हैं।

जय श्री कृष्ण !!
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एक ही तत्व सारे विश्व में है | 

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"What is our mother-country? It is not a piece of earth, nor a figure of speech, nor a fiction of the mind. It is a mighty Shakti, composed of the Shaktis of all the millions of units that make up the nation."

- Aurobindo Ghosh

#Vande_Matarm #Bharatmata_ki_Jai
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क्या आप इस पोस्ट से सहमत है जिसने हमारे फोजी भाई को थप्पड मारा था, इस पोस्ट को लाइक कर कमेंट में बताये शेयर तो करना ही है इस पोस्ट को आज बिलकुल इग्नोर ना करे
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Om nam shivay.
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