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शत्रुघ्न दास
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क्या भक्ति बुढ़ापे में करनी चाहिए - DSC 70 - Hindi: http://youtu.be/QgHsIgJ7E6o
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आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 15.15
अध्याय पन्द्रह : पुरुषोत्तम योग


सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |
वेदैश्र्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् || १५ ||


सर्वस्य - समस्त प्राणियों; - तथा; अहम् - मैं; हृदि - हृदय में; सन्निविष्टः - स्थित; मत्तः - मुझ से; स्मृतिः - स्मरणशक्ति; ज्ञानम् - ज्ञान; अपोहनम् - विस्मृति; - तथा; वेदैः - वेदों के द्वारा; - भी; सर्वैः - समस्त; अहम् - मैं हूँ; एव - निश्चय ही; वेद्यः - जानने योग्य, ज्ञेय;* वेदान्त-कृत* - वेदान्त के संकलकर्ता; वेदवित् - वेदों का ज्ञाता; एव - निश्चय ही; - तथा; अहम् - मैं |


मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है | मैं ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ | निस्सन्देह मैं वेदान्त का संकलनकर्ता तथा समस्त वेदों का जानने वाला हूँ |


तात्पर्य : परमेश्र्वर परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और उन्हीं के कारण सारे कर्म प्रेरित होते हैं | जीव अपने विगत जीवन की साड़ी बातें भूल जाता है, लेकिन उसे परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कार्य करना होता है, जो उसके सारे कर्मों के साक्षी है | अतएव वह अपने विगत कर्मों के अनुसार कार्य करना प्रारम्भ करता है | इसके लिए आवश्यक ज्ञान तथा स्मृति उसे प्रदान की जाती है | लेकिन वह विगत जीवन के विषय में भूलता रहता है | इस प्रकार भगवान् न केवल सर्वव्यापी हैं, अपितु वे प्रत्येक हृदय में अन्तर्यामी भी हैं | वे विभिन्न कर्मफल प्रदान करने वाले हैं | वे न केवल निराकार ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में पूजनीय हैं, अपितु वे वेदों के अवतार के रूप में भी पूजनीय हैं | वेद लोगों को सही दिशा बताते हैं, जिससे वे समुचित ढंग से अपना जीवन ढाल सकें और भगवान् के धाम को वापस जा सकें | वेद भगवान् कृष्ण विषयक ज्ञान प्रदान करते हैं और अपने अवतार व्यासदेव के रूप में कृष्ण ही वेदान्तसूत्र के संकलनकर्ता हैं | व्यासदेव द्वारा श्रीमद्भागवत के रूप में किया गया वेदान्तसूत्र का भाष्य वेदान्तसूत्र की वास्तविक सूचना प्रदान करता है | भगवान् इतने पूर्ण हैं कि बद्धजीवों के उद्धार हेतु वे उसके अन्न के प्रदाता एवं पाचक हैं, उसके कार्यकलापों के साक्षी हैं तथा वेदों के रूप में ज्ञान के प्रदाता हैं | वे भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में भगवद्गीता के शिक्षक हैं | वे बद्धजीव द्वारा पूज्य हैं | इस प्रकार ईश्र्वर सर्वकल्याणप्रद तथा सर्वदयामय हैं |

अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् | जीव ज्योंही अपने इस शरीर को छोड़ता है, इसे भूल जाता है, लेकिन परमेश्र्वर द्वारा प्रेरित होने पर वह फिर से काम करने लगता है | यद्यपि जीव भूल जाता है, लेकिन भगवान् उसे बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वह अपने पूर्वजन्म के अपूर्ण कार्य को फिर से करने लगता है | अतएव जीव अपने हृदय में स्थित परमेश्र्वर के आदेशानुसार इस जगत् में सुख या दुख का केवल भोग ही नहीं करता है, अपितु उनसे वेद समझने का अवसर भी प्राप्त करता है | यदि कोई ठीक से वैदिक ज्ञान पाना चाहे तो कृष्ण उसे आवश्यक बुद्धि प्रदान करते हैं | वे किस लिए वैदिक ज्ञान प्रस्तुत करते हैं ? इसलिए कि जीव को कृष्ण को समझने की आवश्यकता है | इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य से होती है - योSसौ सर्वैर्वेदैगीयते | चारों वेदों , वेदान्त सूत्र तथा उपनिषदों एवं पुराणों समेत सारे वैदिक साहित्य में परमेश्र्वर की कीर्ति का गान है | उन्हें वैदिक अनुष्ठानों द्वारा, वैदिक दर्शन की व्याख्या द्वारा तथा भगवान् की भक्तिमय पूजा द्वारा प्राप्त किया जा सकता है | अतएव वेदों का उद्देश्य कृष्ण को समझना है | वेद हमें निर्देश देते हैं, जिससे कृष्ण को जाना जा सकता है और उनकी अनुभूति की जा सकती है | भगवान् ही चरम लक्ष्य है | वेदान्तसूत्र (१.१.४) में इसकी पुष्टि इन शब्दों में हुई है - तत्तु समन्वयात् | मनुष्य तीन अवस्थाओं में सिद्धि प्राप्त करता है | वैदिक साहित्य के ज्ञान से भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को समझा जा सकता है, विभिन्न विधियों को सम्पन्न करके उन तक पहुँचा जा सकता है और अन्त में उस परम लक्ष्य श्रीभगवान् की प्राप्ति की जा सकती है | इस श्लोक में वेदों के प्रयोजन, वेदों के ज्ञान तथा वेदों के लक्ष्य को स्पष्टतः परिभाषित किया गया है |

प्रश्न १ : भगवान् किसलिए वैदिक ज्ञान प्रस्तुत करते हैं ?

प्रश्न २ : भगवान् बद्ध जीवों के उद्धार हेतु किस-किस प्रकार सहायता करते हैं ?
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आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 15.13
अध्याय पन्द्रह : पुरुषोत्तम योग


गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा |
पुष्णामि चौषधी: सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः || १३ ||


गाम् - लोक में; आविष्य - प्रवेश करके; - भी; भूतानि - जीवों का; धारयामी - धारण करता हूँ; अहम् - मैं; ओजस - अपनी शक्ति से; पुष्णामि - पोषण करता हूँ ; - तथा; औषधिः - वनस्पतियों का; सर्वाः - समस्त; सोमः - चन्द्रमा; भूत्वा - बनकर; रस-आत्मकः - रस प्रदान करनेवाला ।‌‌‌


मैं प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हूँ और मेरी शक्ति से सारे लोक अपनी कक्षा में स्थित रहते हैं । मैं चन्द्रमा बनकर समस्त वनस्पतियों को जीवन-रस प्रदान करता हूँ ।


तात्पर्य: ऐसा ज्ञात है कि सारे लोक केवल भगवान् की शक्ति से वायु में तैर रहे हैं । भगवान् प्रत्येक अणु, प्रत्येक लोक तथा प्रत्येक जीव में प्रवेश करते हैं । इसकी विवेचना ब्रह्मसंहिता में की गई है । उसमें कहा गया है - परमेश्र्वर का एक अंश, परमात्मा, लोकों में, ब्रह्माण्ड में, जीव में, तथा अणु तक में प्रवेश करता है । अतएव उनके प्रवेश करने से प्रत्येक वस्तु ठीक से दिखती है । जब आत्मा होता है तो जीवित मनुष्य पानी मैं तैर सकता है । लेकिन जब जीवित स्पूलिंग इस देह से निकल जाता है और शरीर मृत हो जाता है तो शरीर मृत हो जाता है तो शरीर डूब जाता है । निस्सन्देह सड़ने के बाद यह शरीर तिनके तथा अन्य वस्तुओं के समान तैरता है । लेकिन मरने के तुरन्त बाद शरीर पानी में डूब जाता है । इसी प्रकार ये सारे लोक शून्य में तैर रहे हैं और यह सब उनमें भगवान् की परम शक्ति के प्रवेश के कारण है । उनकी शक्ति प्रत्येक लोक को उसी तरह थामे रहती है, जिस प्रकार धूल को मुट्ठी । मुट्ठी में बन्द रहने पर धूल के गिरने का भय नहीं रहता, लेकिन ज्योंही धूल को वायु में फैंक दिया जाता है, वह नीचे गिर पड़ती है । इसी प्रकार ये सारे लोक, जो वायु में तैर रहे हैं, वास्तव में भगवान् के विराट रूप की मुट्ठी में बँधे हैं । उनके बल तथा शक्ति से सारी चर तथा अचर वस्तुएँ अपने-अपने स्थानों पर टिकी हैं । वैदिक मन्त्रों में कहा गया है कि भगवान् के कारण सूर्य चमकता है और सारे लोक लगातार घूमते रहते हैं । यदि ऐसा उनके कारण न हो तो सारे लोक वायु में धूल के समान बिखर कर नष्ट हो जाएँ । इसी प्रकार से भगवान् के ही कारण चन्द्रमा समस्त वनस्पतियों का पोषण करता है । चन्द्रमा के प्रभाव से सब्जियाँ सुस्वादु बनती हैं । वास्तव में मानव समाज भगवान् की कृपा से काम करता है, सुख से रहता है और भोजन का आनन्द लेता है । अन्यथा मनुष्य जीवित न रहता । रसात्मकः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । प्रत्येक वस्तु चन्द्रमा के प्रभाव से परमेश्र्वर के द्वारा स्वादिष्ट बनती है ।

प्रश्न १ : भगवान् किस प्रकार अपनी शक्ति से सभी लोकों को थामे हुए हैं ? यदि वे ऐसा न करें तो क्या परिणाम हो ?

प्रश्न २: रिक्त स्थान भरें : परमेश्र्वर का एक अंश, ____, लोकों में, ___ में, जीव में, तथा ___ तक में प्रवेश करता है ।
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हरे कृष्ण महामंत्र की महिमा

कलियुग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल किंतु प्रबल साधन उनका नाम-जप ही बताया गया है।

श्रीमद्भागवत का कथन है-” यद्यपि कलियुग दोषों का भंडार है तथापि इसमें एक बहुत बडा सद्गुण यह है कि सतयुग में भगवान के ध्यान (तप) द्वारा,

त्रेतायुग में यज्ञ-अनुष्ठान के द्वारा,

द्वापरयुगमें पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था,

कलियुग में वह पुण्यफल श्री हरिके नाम-संकीर्तन(हरे कृष्ण महामंत्र) मात्र से ही प्राप्त हो जाता है।

कृष्णयजुर्वेदीय कलिसंतरणोपनिषद् मे लिखा है कि द्वापरयुगके अंत में जब देवर्षिनारद ने ब्रह्माजीसे कलियुग में कलि के प्रभाव से मुक्त होने का उपाय पूछा, तब सृष्टिकर्ता ने कहा-

आदिपुरुष भगवान नारायण के नामोच्चारण से मनुष्य कलियुग के दोषों को नष्ट कर सकता है। नारदजीके द्वारा उस नाम-मंत्र को पूछने पर हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीने बताया-

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

यह महामंत्र कलि के पापों का नाश करने वाला है। इससे श्रेष्ठ कोई अन्य उपाय सारे वेदों में भी देखने को नहीं आता।

हरे कृष्ण महामंत्र के द्वारा षोडश (16) कलाओं से आवृत्त जीव के आवरण नष्ट हो जाते हैं। तत्पश्चात जैसे बादल के छट जाने पर सूर्य की किरणें प्रकाशित हो उठती हैं, उसी तरह परब्रह्म का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है।

नारदजी के द्वारा हरे कृष्ण महामंत्र के जप की विधि पूछने पर ब्रह्माजीबोले-

हरे कृष्ण महामंत्र जप की कोई विशिष्ट विधि नहीं है।

कोई पवित्र हो या अपवित्र, महामंत्र का निरन्तर जप करने वाला सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य-चारों प्रकार की मुक्ति प्राप्त करता है।

जब साधक इस महामंत्र का साढे तीन करोड जप कर लेता है, तब वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

सनत्कुमारसंहिता,ब्रह्मयामल,राधा-तंत्र एवं श्रीचैतन्यभागवतआदि ग्रंथों में इस महामंत्र का यह स्वरूप वर्णित है-

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

महादेव शंकर ने भगवती पार्वती को कलियुग में जीवों की मुक्ति का उपाय बताते हुए

महामंत्र का उपदेश दिया है।

मंत्रशास्त्रके प्रणेताशिव इस महामंत्र की उपयोगिता का रहस्योद्घाटनकरते हुए कहते हैं-

कलियुग में श्री हरि-नाम के बिना कोई भी साधन सरलता से पापों को नष्ट नहीं कर सकता।

जनसाधारण का उद्धार करने के लिए ही महामंत्र को प्रकाशित किया गया है।

कलियुग में इस महामंत्र का संकीर्तन करने मात्र से प्राणी मुक्ति के अधिकारी बन सकते हैं।

अग्निपुराण इस नाम-मंत्र की प्रशंसा करते हुए कहता है कि जो लोग इसका किसी भी तरह उच्चारण करते हैं, वे निश्चय ही कृतार्थ हो जाते हैं।

पद्मपुराणका कथन है कि इस महामंत्र को नित्य जपने वाला वैष्णव देह त्यागने के उपरान्त भगवान के धाम को जाता है।

ब्रह्माण्डपुराणमें महर्षि वेदव्यास इस महामंत्र की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं- इस महामंत्र को ग्रहण करने से देहधारी प्राणी ब्रह्ममय हो जाता है और वह समस्त पापों से मुक्त होकर सब सिद्धियों से युक्त हो जाता है। भव-सागर से पार उतारने के लिए इससे श्रेष्ठ कोई दूसरा उपाय नहीं है।

भक्तिचंद्रिका में महामंत्र का माहात्म्य इस प्रकार वर्णित है-

महामंत्र सब पापों का नाशक है, सभी प्रकार की दुर्वासनाओंको जलाने के अग्नि-स्वरूप है, शुद्ध सत्त्व स्वरूप भगवद्वृत्ति वाली बुद्धि को देने वाला है, सभी के लिए आराधनीय एवं जप करने योग्य है, सबकी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

हरे कृष्ण महामंत्र के संकीर्तन में सभी का अधिकार है। यह महामंत्र प्राणिमात्र का बान्धव है, समस्त शक्तियों से सम्पन्न है, आधि-व्याधि का नाशक है।

हरे कृष्ण महामंत्र की दीक्षा में मुहूर्त्तके विचार की आवश्यकता नहीं है। इसके जप में बाह्य पूजाकी अनिवार्यता नहीं है। केवल उच्चारण करने मात्र से यह सम्पूर्ण फल देता है।

हरे कृष्ण महामंत्र के अनुष्ठान में देश-काल का कोई प्रतिबंध नहीं है। विष्णुधर्मोत्तर में भी लिखा है कि श्रीहरिके नाम-संकीर्तन में देश-काल का नियम लागू नहीं होता है। जूठे मुंह अथवा किसी भी प्रकार की अशुद्ध अवस्था में भी नाम-जप को करने का निषेध नहीं है।

श्रीमद्भागवत महापुराणका तो यहां तक कहना है कि जप-तप एवं पूजा-पाठ की त्रुटियां अथवा कमियां श्रीहरिके नाम- संकीर्तन से ठीक और परिपूर्ण हो जाती हैं।

हरे कृष्ण महामंत्र का संकीर्त्तन ऊंची आवाज में करना चाहिए-

जपतो हरिनामानिस्थानेशतगुणाधिक:।

आत्मानञ्चपुनात्युच्चैर्जपन्श्रोतृन्पुनातपच॥

हरे कृष्ण महामंत्र नाम को जपने वाले की अपेक्षा उच्च स्वर से हरि-नाम का कीर्तन करने वाला अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि जपकर्ता केवल स्वयं को ही पवित्र करता है, जबकि नाम कीर्तनकारी स्वयं के साथ-साथ सुनने वालों का भी उद्धार करता है।

हरिवंशपुराणका कथन है-

वेदेरामायणेचैवपुराणेभारतेतथा।

आदावन्तेचमध्येचहरि: सर्वत्र गीयते॥

वेद , रामायण, महाभारत और पुराणों में आदि, मध्य और अंत में सर्वत्र श्रीहरिका ही गुण- गान किया गया है।

बृहन्नारदीयपुराणका सुस्पष्ट उद्घोष है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैवकेवलम्।

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥

कलियुग में हरि के नाम, हरि के नाम, हरि के नाम के अतिरिक्त भव-बंधन से मुक्ति प्रदान करने वाला दूसरा अन्य कोई साधन नहीं है, अन्य कोई साधन नहीं है, अन्य कोई साधन नहीं है।

जय श्री राधे राधे
शुभ रात्रि
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Dinesh Dube dd's profile photo
 
बहुत सुंदर, शुभ प्रभात, जय श्री कृष्ण 
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आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 15.11
अध्याय पन्द्रह : पुरुषोत्तम योग 


यतन्तो योगिनश्र्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् |
यतन्तोSप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः || ११ ||


यतन्तः - प्रयास करते हुए; योगिनः - अध्यात्मवादी, योगी; - भी; एनम् - इसे; पश्यन्ति - देख सकते हैं; आत्मनि - अपने में; अवस्थितम् - स्थित; यतन्तः - प्रयास करते हुए; अपि - यद्यपि; अकृत-आत्मानः - आत्म-साक्षात्कार से विहीन; - नहीं; एनम् - इसे; पश्यन्ति - देखते हैं; अचेतसः - अविकसित मनों वाले, अज्ञानी |


आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त प्रयत्नशील योगीजन यह स्पष्ट रूप से देख सकते हैं । लेकिन जिनके मन विकसित नहीं हैं और जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं हैं, वे प्रयत्न करके भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है ।


तात्पर्य : अनेक योगी आत्म-साक्षात्कार के पथ पर होते हैं, लेकिन जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं है, वह यह नहीं देख पाता कि जीव के शरीर में कैसे-कैसे परिवर्तन हो रहा है । इस प्रसंग में योगिनः शब्द महत्त्वपूर्ण है । आजकल ऐसे अनेक तथाकथित योगी हैं और योगियों के तथाकथित संगठन हैं, लेकिन आत्म-साक्षात्कार के मामले में वे शून्य हैं । वे केवल कुछ आसनों में व्यस्त रहते हैं और यदि उनका शरीर सुगठित तथा स्वस्थ हो गया,तो वे संतुष्ट हो जाते हैं | उन्हें इसके अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं रहती । वे यतन्तोSप्यकृतात्मानः कहलाते हैं | यद्यपि वे तथाकथित योगपद्धति का प्रयास करते हैं, लेकिन वे स्वरूपसिद्ध नहीं हो पाते | ऐसे व्यक्ति आत्मा के देहान्तरण को नहीं समझ सकते | केवल वे ही ये सभी बातें समझ पाते हैं, जो सचमुच योग पद्धति में रमते हैं और जिन्हें आत्मा, जगत् तथा परमेश्र्वर की अनुभूति हो चुकी है | दूसरे शब्दों में, जो भक्तियोगी हैं वे ही समझ सकते हैं कि किस प्रकार से सब कुछ घटित होता है |

प्रश्न १ : इस श्लोक के प्रसंग में योगिनः शब्द क्यों महत्त्वपूर्ण है ?

प्रश्न २ : ऐसे व्यक्ति ही आत्मा के देहान्तरण समझ सकते हैं जो सचमुच योग पद्धति में रमते हैं और जिन्हें आत्मा, जगत् तथा परमेश्र्वर की अनुभूति हो चुकी है |

१).सत्य
२).असत्य 
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आध्यात्मिक ज्ञान की प्रारंभिक समझ - Daily Spiritu…: http://youtu.be/RhcBXUrwSag
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Hem Singh's profile photoशत्रुघ्न दास's profile photo
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+Hem Singh हां कर्म की नितांत आवश्यकता है। पर कर्म की प्रेरणा और दिशा धर्म से प्राप्त होती है। बिना ज्ञान , दिशाहीन कर्म व्यर्थ अथवा घातक सिद्ध होता है। धर्मपालन का अर्थ कर्तव्यविहीन ,कर्मशून्य हो जाना नहीं है। सहमत है की आज समाज को खतरा है तो धर्म ज्ञान त्याग कर और गहरी खाई में कूदने जैसा होगा। 
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आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 15.14
अध्याय पन्द्रह : पुरुषोत्तम योग 


अहं वैश्र्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः |
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् || १४ ||


अहम् - मैं; वैश्र्वानरः - पाचक-अग्नि के रूप में पूर्ण अंश; भूत्वा* - बन कर; प्राणिनाम् - समस्त जीवों के; देवम् - शरीरों में; आश्रितः - स्थित; प्राण - उच्छ्वास, विश्र्वास; अपान - श्र्वास; समायुक्तः - सन्तुलित रखते हुए; पचामि - पचाता हूँ; अन्नम् - अन्न को; चतुः-विधम् - चार प्रकार के |


मैं समस्त जीवों के शरीरों में पाचन-अग्नि (वैश्र्वानर) हूँ और मैं श्र्वास-प्रश्र्वास (प्राण वायु) में रह कर चार प्रकार के अन्नों को पचाता हूँ ।


तात्पर्य: आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार आमाशय (पेट) में अग्नि होती है, जो वहाँ पहुँचे भोजन को पचाती है । जब यह अग्नि प्रज्ज्वलित नहीं रहती तो भूख नहीं जगती और जब यह अग्नि ठीक रहती है, तो भूख लगती है । कभी-कभी जब अग्नि मन्द हो जाती है तो उपचार की आवश्यकता होती है । जो भी हो, यह अग्नि भगवान् का प्रतिनिधि स्वरूप है । वैदिक मन्त्रों से भी (बृहदारण्यक उपनिषद् ५.९.१) पुष्टि होती है कि परमेश्र्वर या ब्रह्म अग्निरूप में आमाशय के भीतर स्थित है और समस्त प्रकार के अन्न को पचा ते हैं ?(अयमग्निर्वैश्र्वानरो योSयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते) । चूँकि भगवान् सभी प्रकार के अन्नों के पाचन में सहायक होते हैं, अतएव जीव भोजन करने के मामले में स्वतन्त्र नहीं है । जब तक परमेश्र्वर पाचन में सहायता नहीं करते, तब तक खाने की कोई सम्भावना नहीं है । इस प्रकार भगवान् ही अन्न को उत्पन्न करते और वे ही पचाते हैं और उनकी ही कृपा से हम जीवन का आनन्द उठाते हैं । वेदान्तसूत्र में (१.२.२७) भी इसकी पुष्टि हुई है । शब्दादिभ्योSन्तः प्रतिष्ठानाच्च - भगवान् शब्द के भीतर, शरीर के भीतर, वायु के भीतर तथा यहाँ तक कि पाचन शक्ति के रूप में आमाशय में भी उपस्थित हैं । अन्न चार प्रकार का होता है - कुछ निगले जाते हैं (पेय) , कुछ चबाये जाते हैं (भोज्य), कुछ चाटे जाते हैं (लेह्य) तथा कुछ चूसे जाते हैं (चोष्य) | भगवान् सभी प्रकार के अन्नों की पाचक शक्ति हैं |

प्रश्न १ : जीव भोजन करने के मामले में स्वतन्त्र क्यों नहीं है ?

प्रश्न २ : रिक्त स्थान भरें : भगवान् के भीतर, के भीतर, के भीतर तथा यहाँ तक कि _ के रूप में __ में भी उपस्थित हैं ।
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Hindu Garjana हिन्दु गर्जना's profile photoಮಂಜುನಾಥ ಮಲ್ಲಿಕಾರ್ಜುನಯ್ಯ's profile photo
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आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 15.11
अध्याय पन्द्रह : पुरुषोत्तम योग 


यतन्तो योगिनश्र्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् |
यतन्तोSप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः || ११ ||


यतन्तः - प्रयास करते हुए; योगिनः - अध्यात्मवादी, योगी; - भी; एनम् - इसे; पश्यन्ति - देख सकते हैं; आत्मनि - अपने में; अवस्थितम् - स्थित; यतन्तः - प्रयास करते हुए; अपि - यद्यपि; अकृत-आत्मानः - आत्म-साक्षात्कार से विहीन; - नहीं; एनम् - इसे; पश्यन्ति - देखते हैं; अचेतसः - अविकसित मनों वाले, अज्ञानी |


आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त प्रयत्नशील योगीजन यह स्पष्ट रूप से देख सकते हैं । लेकिन जिनके मन विकसित नहीं हैं और जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं हैं, वे प्रयत्न करके भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है ।


तात्पर्य : अनेक योगी आत्म-साक्षात्कार के पथ पर होते हैं, लेकिन जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं है, वह यह नहीं देख पाता कि जीव के शरीर में कैसे-कैसे परिवर्तन हो रहा है । इस प्रसंग में योगिनः शब्द महत्त्वपूर्ण है । आजकल ऐसे अनेक तथाकथित योगी हैं और योगियों के तथाकथित संगठन हैं, लेकिन आत्म-साक्षात्कार के मामले में वे शून्य हैं । वे केवल कुछ आसनों में व्यस्त रहते हैं और यदि उनका शरीर सुगठित तथा स्वस्थ हो गया,तो वे संतुष्ट हो जाते हैं | उन्हें इसके अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं रहती । वे यतन्तोSप्यकृतात्मानः कहलाते हैं | यद्यपि वे तथाकथित योगपद्धति का प्रयास करते हैं, लेकिन वे स्वरूपसिद्ध नहीं हो पाते | ऐसे व्यक्ति आत्मा के देहान्तरण को नहीं समझ सकते | केवल वे ही ये सभी बातें समझ पाते हैं, जो सचमुच योग पद्धति में रमते हैं और जिन्हें आत्मा, जगत् तथा परमेश्र्वर की अनुभूति हो चुकी है | दूसरे शब्दों में, जो भक्तियोगी हैं वे ही समझ सकते हैं कि किस प्रकार से सब कुछ घटित होता है |

प्रश्न १ : इस श्लोक के प्रसंग में योगिनः शब्द क्यों महत्त्वपूर्ण है ?

प्रश्न २ : ऐसे व्यक्ति ही आत्मा के देहान्तरण समझ सकते हैं जो सचमुच योग पद्धति में रमते हैं और जिन्हें आत्मा, जगत् तथा परमेश्र्वर की अनुभूति हो चुकी है |

१).सत्य
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SRI ISOPANISAD
By His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada:
MANTRA ELEVEN

vidyāṁ cāvidyāṁ ca yas
tad vedobhayaṁ saha
avidyayā mṛtyuṁ tīrtvā
vidyayāmṛtam aśnute

vidyām—knowledge in fact; ca—and; avidyām—nescience; ca—and; yaḥ—a person who; tat—that; veda—knows; ubhayam—both; saha—simultaneously; avidyayā—by culture of nescience; mṛtyum—repeated death; tīrtvā—transcending; vidyayā—by culture of knowledge; amṛtam—deathlessness; aśnute—enjoys.

Only one who can learn the process of nescience and that of transcendental knowledge side by side can transcend the influence of repeated birth and death, and enjoy the full blessings of immortality.

PURPORT
Since the start of the material world everyone is trying for a permanent life, but the law of Nature is so cruel that no one has avoided the hand of death. No one wants to die. That is a practical fact. Nor does anyone want to become old or diseased. But the 
law of Nature does not allow anyone immunity from death, old age or disease. The advancement of material knowledge has not solved these problems of life. Material science can discover the nuclear bomb to accelerate the process of death, but it cannot discover anything which can protect man from the cruel hands of death, disease and old age.
From the Puränas we learn of the activities of Hiranyakasipu: This king was materially very much advanced, and by his material acquisitions, by the strength of his nescience, he wanted to conquer death. He underwent a type of meditation so severe that all the planetary systems became disturbed by his mystic powers. He forced the creator of the universe, the demigod named Brahmã, to come down to him, and then he asked him for the benediction of becoming an amara, one who does not die. Brahmã refused to award this, however, because even he, the material creator, who 
has command over all the planets, is not himself an amara. He has a long duration of life, as is confirmed in the Bhagavad-gitä, but that does not mean that he doesn't have to die.
Hiranya means gold, and kasipu means soft bed. This gentleman was interested in these two things, money and women, and he wanted to enjoy this sort of life by becoming artificially immortal. He asked Brahmã many things indirectly in hopes of fulfilling his desire to become an amara. He asked benediction that he might not be killed by any man, animal, god, or any living being within the categories of the 8,400,000 species. He also asked that he might not die on the land, in the air, in the water or by any weapon whatsoever. So on and on, Hiranyakasipu thought foolishly that this would guarantee him against death. But in the end, although Brahmã granted him all these benedictions, he was killed by the Personality of Godhead in the Form of a half-man, half-lion. And no weapon was used to kill him except the nails of the Lord. He was killed on the lap of the wonderful Living Being Who was beyond his conception. The whole point here is that even Hiranyakasipu, the most powerful of materialists, could not become deathless by his various plans. What, then, will be accomplished by the tiny Hiranyakasipus of today, who make plans which are throttled from moment to moment? Sri Isopanisad instructs us not to make one-sided attempts to win the struggle for existence. Everyone is struggling hard for existence, but the law of material Nature is 
so hard and fast that it does not allow any to surpass it. In order to have permanent life one must be prepared to go back to Godhead.
This process of going back to Godhead is a different branch of knowledge, and it has to be learnt from the revealed Vedic Scriptures, such as the Upanisads, Vedãnta, Bhagavad-gitä, Srimad-Bhägavatam, etc. Therefore, to become happy in this life and to get a permanent blissful life after leaving this material body, one must take to this sacred literature and obtain transcendental knowledge.
The conditioned living being has forgotten his eternal relation with God, and he has mistakenly accepted the temporary place of birth as all-in-all. The Lord has kindly delivered the above mentioned Scriptures in India and other Scriptures in other countries to remind the forgetful human being that his home is not here in this material world. The living being is a spiritual entity, and he can only be happy by returning to his spiritual home, with the Godhead. The Personality of Godhead, from His Kingdom, sends His bona fide servants to propagate this mission of going back to Godhead, and sometimes He comes Himself to do this work. All living beings are His beloved sons, His parts and parcels, and therefore God is more sorry than we ourselves are for the sufferings which we are constantly undergoing in the material condition. The miseries of the material world are also indirect reminders of our incompatibility with dead matter, and intelligent 
living entities generally take note of these reminders, and side by side engage themselves in the culture of vidyã, or transcendental knowledge. Human life is the best opportunity for the culture of spiritual knowledge, and the human being who does not take advantage of this opportunity in human life is called a narãdhama, the lowest of human beings.
The path of avidyã, or material advancement of knowledge for sense gratification, means repetition of death and repetition of birth also. The living entity, as he is spiritually, has no birth or death. Birth and death are concerned with the outward covering of the spirit soul, the body. This is compared with the putting on and taking off of outward garments. Foolish human beings who are grossly absorbed in the culture of avidyã, nescience, do not mind this cruel process, but, being enamored of the beauty of the illusory energy, they do the same things over repeatedly, without learning any lesson from the law of Nature. The culture of vidyã or transcendental knowledge is essential for the human being. 
Unrestricted sense enjoyment in the diseased, material condition of the senses must be restricted as far as possible. Unrestricted sense enjoyment in this bodily condition is the path of ignorance and death. The living entities are not without spiritual senses. 
Every living being in his original spiritual form has all the senses which are now material, covered by the body and the mind. Activities of the material senses are perverted reflections of spiritual pastimes. The engagement of the spirit soul under the material covering is the diseased condition of the soul. And real sense enjoyment is possible when the disease is removed. In our pure spiritual form, freed from all material contamination, pure enjoyment of the senses is possible. The aim of human life should, therefore, not be perverted sense enjoyment, but should be to cure the material disease. Aggravating the material disease is no sign of knowledge. It is the sign of culturing avidyã, ignorance.
The degree of a fever must not be increased from 105 to 107 for good health. The degree is to be reduced to the normal state of 98.6. That should be the aim of human life. The modern trend of material civilization is to increase the degree of the feverish material condition, which has therefore reached the point of 107 in the form of atomic energy, with the foolish politicians crying that at any moment the world may go to hell. That is the result of the advancement of material knowledge, and of the neglect of the most important part of life, the culture of spiritual knowledge. Here is a warning in Sri Isopanisad that we must not follow such a dangerous path leading to death. On the contrary, we must side by side develop the culture of spiritual knowledge so that we may become completely free from the cruel hands of death. This does not mean that all civic activities for the maintenance of the body should be stopped. There is no question of stopping activities, as there is no question of wiping out one's temperature altogether when trying to recover from a disease. We have already tried to explain the matter by the expression "to make the best use of a bad bargain." The culture of spiritual knowledge has to be done with the help of this body and mind, and therefore maintenance of the body and mind is required if we are to reach our goal. The normal temperature should be maintained at 98.6 degrees, but it should not be foolishly increased to the degree of 107. The great sages and saints of India wanted to maintain the normal temperature by a balanced program of material and spiritual knowledge. They never allowed the misuse of human intelligence for diseased sense gratification. Human activities diseased by a temperament of sense gratification have been regulated in the Vedas under the principles of Salvation. This system is found in four divisions: religion, economic development, sense gratification and salvation. At the present moment the people have no interest either in religion or salvation. They have only one aim in life, sense gratification, and in order to fulfill this end they have different plans for economic development. Misguided man thinks that religion should be maintained for its contribution to economic development, and that economic development is required for sense gratification. And in order to guarantee further sense gratification after death, in heaven, there is some system of religious observances. But this is not the purpose of the principles of salvation. The path of religion is actually for self realization. Economic development is required just to maintain the body in a sound, healthy condition. A man should live in a healthy condition of life with a sound mind just to realize vidyã, true knowledge, which is the aim of human life. This life is not meant for working like an ass or for the culture of avidyã or for sense gratification. The path of vidyã is most perfectly presented in the Srimad-Bhägavatam. The Bhägavatam directs a human being to utilize his life in the matter of enquiring about the Absolute Truth. The Absolute Truth is realized step by step as Brahman, Paramãtman, and, at last, Bhagavãn, the Personality of Godhead. This Absolute Truth is realized by the broadminded man who has attained knowledge and detachment, having followed the 18 principles of the Bhagavad-gitä described above. The central point in these 18 principles is the attainment of transcendental devotional service to the Personality of Godhead. Therefore it is recommended for all classes of men to learn the art of devotional service to the Lord. Religiousness, economic development and sense gratification without the aim of attaining devotional service to the Lord are all different forms of nescience, as will be shown hereafter in Sri Isopanisad. Thus, to culture vidyã especially in this age, one must always hear and chant and worship with concentrated attention, targetted on the Personality of Godhead, Who is the Lord of the transcendentalists.
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