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रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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रूपचन्द्र शास्त्री's posts

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंलवार (21-02-2017) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in">
सो जा चादर तान के, रविकर दिया जवाब; (चर्चामंच 2596)
</a> पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंलवार (21-02-2017) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in">
सो जा चादर तान के, रविकर दिया जवाब; (चर्चामंच 2596)
</a> पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
गीत "जीवन आशातीत हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो लगता था कभी पराया,
जाने कब मनमीत हो गया।
पतझड़ में जो लिखा तराना,
वो वासन्ती गीत हो गया।।

अच्छे लगते हैं अब सपने,
अनजाने भी लगते अपने,
पारस पत्थर को छू करके,
रिश्ता आज पुनीत हो गया।

मैंने जब सरगम को गाया,
उसने सुर में ताल बजाया,
गायन-वादन के संगम से,
मनमोहक संगीत हो गया।

सुलझ गया है ताना-बाना,
लगता है संसार सुहाना,
बासन्ती अब सुमन हो गये,
जीवन आशातीत हो गया।
--
http://uchcharan.blogspot.in/2017/02/blog-post_20.html

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
गीत "जीवन आशातीत हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो लगता था कभी पराया,
जाने कब मनमीत हो गया।
पतझड़ में जो लिखा तराना,
वो वासन्ती गीत हो गया।।

अच्छे लगते हैं अब सपने,
अनजाने भी लगते अपने,
पारस पत्थर को छू करके,
रिश्ता आज पुनीत हो गया।

मैंने जब सरगम को गाया,
उसने सुर में ताल बजाया,
गायन-वादन के संगम से,
मनमोहक संगीत हो गया।

सुलझ गया है ताना-बाना,
लगता है संसार सुहाना,
बासन्ती अब सुमन हो गये,
जीवन आशातीत हो गया।
--
http://uchcharan.blogspot.in/2017/02/blog-post_20.html

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गीत "जीवन आशातीत हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जो लगता था कभी पराया, जाने कब मनमीत हो गया। पतझड़ में जो लिखा तराना, वो वासन्ती गीत हो गया।। अच्छे लगते हैं अब सपने, अनजाने भी लगते अपने, पारस पत्थर को छू करके, रिश्ता आज पुनीत हो गया। मैंने जब सरगम को गाया, उसने सुर में ताल बजाया, गायन-वादन के संगम से, मनम...

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20 फ़रवरी, 2017
बालकविता "बच्चों का संसार निराला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सीधा-सादा. भोला-भाला।
बच्चों का संसार निराला।।

बचपन सबसे होता अच्छा।
बच्चों का मन होता सच्चा।

पल में रूठें, पल में मानें।
बैर-भाव को ये क्या जानें।।

प्यारे-प्यारे सहज-सलोने।
बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।।

बच्चों से होती है माता।
ममता से है माँ का नाता।।

बच्चों से है दुनियादारी।
बच्चों की महिमा है न्यारी।।

कोई बचपन को लौटा दो।
फिर से बालक मुझे बना दो।।
--
http://nicenice-nice.blogspot.in/2017/02/blog-post_20.html

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बालकविता "बच्चों का संसार निराला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सीधा-सादा. भोला-भाला। बच्चों का संसार निराला।। बचपन सबसे होता अच्छा। बच्चों का मन होता सच्चा। पल में रूठें, पल में मानें। बैर-भाव को ये क्या जानें।। प्यारे-प्यारे सहज-सलोने। बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।। बच्चों से होती है माता। ममता से है माँ का नाता।। बच्चों...

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रविवार, 19 फ़रवरी 2017
मुक्तक "प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जीवन में सबको नहीं, मिल पाता है प्यार
बिन माँगे मिल जाय जो, वो होता उपहार
करना दग़ा-फरेब मत, कभी किसी के साथ
सम्बन्धों पर है खड़ी, दुनिया की दीवार
--
http://aapkaablog.blogspot.in/2017/02/blog-post_19.html

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मुक्तक "प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जीवन में सबको नहीं, मिल पाता है प्यार बिन माँगे मिल जाय जो, वो होता उपहार करना दग़ा-फरेब मत, कभी किसी के साथ सम्बन्धों पर है खड़ी, दुनिया की दीवार

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Sunday, February 19, 2017
"उजड़े चमन को सजा लीजिए" (चर्चा अंक-2595)
मित्रों
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सिनेमा घरों में राष्ट्रगान

कुछ अलग सा पर गगन शर्मा
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डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' के ब्लॉग
उच्चारण से

गीत
"देता है ऋतुराज निमन्त्रण"

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गीत
"बौराई गेहूँ की काया

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रात का गंजा
दिन का अंधा ‘उलूक’
बस रायता फैला रखा है

उलूक टाइम्स पर
सुशील कुमार जोशी
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किस्मत

इस दुनिया में बात एक ही मुझको सच्ची लगती है
अपनी सबसे बुरी ग़ैर की किस्मत अच्छी लगती है...
Sudhinama पर sadhana vaid
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गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए
देख सखी वीराने में
पागलपन अब हार गया
खुद को कुछ समझाने में ...
कागज मेरा मीत है,
कलम मेरी सहेली......
--
रॉस द्वीप पोर्ट ब्लेयर की यात्रा

Travelogue यात्रा लेख पर
SANDEEP PANWAR
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मुक्तक
"उजड़े चमन को सजा लीजिए"
आपका ब्लॉग
प्यार की गन्ध का कुछ मजा लीजिए।
साज खुशियों के अब तो बजा लीजिए।
जिन्दगी को जियो रोज उन्मुक्त हो,
अपने उजड़े चमन को सजा लीजिए।।
आपका ब्लॉग
--
707

सब तो न किताबें कहतीं हैं.....
भावना सक्सैना
इतिहास गवाह तो होता है घटनाओं का
लेकिन सारा कब कलम लिखा करती हैं?
जो उत्कीर्ण पाषाणों में, सब तो न किताबें कहतीं हैं,
सत्ताएँ सारी ही स्वविवेक से, पक्षपात करती हैं...
सहज साहित्य
--
जाग तू जनता जाग...!
(जागर) -
हे… जाग रे जाग! बिना मास्टरों का स्कूल मा जाग!
बिना डॉक्टरों का अस्पताल मा जाग!
बांजा पड़ी खेती-बाड़ी में जाग!
खंडर हव्यां कुड़ों में जाग!
बेरोजगार नोनी-नोन्यालों का फ्यूचर में जाग!
लालबत्ती-दायित्यधारियों का हूटर में जाग!
पराबेट स्कूलों की फीस में जाग!
पराबेट हास्पिटलों की तीस में जाग...
गढ़वाली कविता !!! पर
Mahendra S. Rana
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संस्कार

आज की पीढ़ी हो रही बेलगाम संस्कार हीन |
भव्य शहर संस्कार हैं विदेशी अपने नहीं |
है महां मूर्ख संस्कार न जानता पिछड़ जाता |
संस्कार मिले माता और पिता से है भाग्यशाली...
--
मनुहार

Akanksha पर Asha Saxena
--
"विंड चाइम"

जिंदगी की राहें पर
Mukesh Kumar Sinha
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बात ग़ज़ल की ----
डा श्याम गुप्त ....
सृजन मंच ऑनलाइन
( ----कविता व शायरी --- कविता, काव्य या साहित्य किसी विशेष, कालखंड, भाषा, देश या संस्कृति से बंधित नहीं होते | मानव जब मात्र मानव था जहां जाति, देश, वर्ण, काल, भाषा, संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं था तब भी प्रकृति के रोमांच, भय, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का अकेले में अथवा अन्य से सम्प्रेषण- शब्दहीन इंगितों, अर्थहीन उच्चारण स्वरों में करता होगा...
सृजन मंच ऑनलाइन
--
खजुराहो की तलाश में
जाने किस खजुराहो की तलाश में
भटकती है मन की मीन
कि एक घूँट की प्यास से लडती है
प्रतिदिन...
एक प्रयास पर vandana gupta
--
प्यार ही जीवन
प्यार ही जिंदगी है,
प्यार ही हर रंग है,
प्यार ही मंदिर है,
प्यार ही देवता है ,
पर आज इस प्यार से
महरूम है प्यार...
aashaye पर garima
--
बेनकाब हो जाये
Image result for नकाब
शहर में इंकलाब हो जाए
गॉँव भी आबताब हो जाए
लोग जब बंदगी करे दिल से
हर नियत मेहराब हो जाए...
sapne(सपने) पर
shashi purwar
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मैं रहूँ जैसे भी
लेकिन शाद यह कुनबा रहे
अंदाज़े ग़ाफ़िल पर
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
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मुख्य मंत्री का मुख

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पुतनी वोट डालने नहीं जायेगी,
बस्स!!

उड़न तश्तरी ....
--
हमारे बुजुर्ग...

Vishaal Charchchit
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"जब तक मैंने समझा,जीवन क्या है?
जीवन बीत गया" !-
पीताम्बर दत्त शर्मा

5TH Pillar Corruption Killer
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बालकविता
"तीखी-मिर्च कभी मत खाओ"

नन्हे सुमन
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बालकविता
"सबके प्यारे बन जाओगे"

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तुम हसँती अच्छी लगती हो -
सुधीर मौर्य

कलम से..
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देते हो धोखा ...
देते हो धोखा महफ़िल में क्या शर्म नहीं बाक़ी दिल में
ज़ंग-आलूदा हैं सब छुरियां वो बात नहीं अब क़ातिल में...
साझा आसमान पर
Suresh Swapnil
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मोदी चुनाव में काला धन बाँट रहे

लो क सं घ र्ष ! पर
Randhir Singh Suman
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साप्ताहिक विशिष्ट चयन:
और मेरी नींद टूट गई.../
'श्याम जुनेजा '

नवोत्पल पर Shreesh K. Pathak
--
दर्पण

मन के वातायन(Mankevatayan) पर
Jayanti Prasad Sharma
--
जी-मेल एक्सप्रेस
मेरी नज़र से

ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र पर
vandana gupta
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जो है सो है !

मेरी भावनायें... पर रश्मि प्रभा.
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भगवान सब देखता है
लघु कथा
मंदिर से लौट कर दादी ने कहा --"क्या कल युग आ गया है, चोर भगवान को भी नहीं छोड़ते।' नन्हें राहुल ने पूछा - "क्या हुआ दादी ?' "रात को मंदिर में चोरी हो गई, भगवान के सारे गहने चले गए ।' " अरे दादी , चोरों को भी और कोई नहीं मिला,चोरी भी की तो भगवान के गहनों की...बेवकूफ कहीं के,अब तो वह जरूर पकड़े जाएगे ।' दादी ने चौंक कर पूछा --"वो कैसे...
Laghu-Katha -
My Hindi Short Stories -
Pavitra Agarwal
--
“यूपी के लड़कों” की
हवा खराब हो रही है !

बतंगड़ BATANGAD पर
HARSHVARDHAN TRIPATHI
--
प्रकाशित संपादकों के लिए
एक अप्रकाशित व्यंग्य
परसों जब मैं अपने ब्लॉग नास्तिक TheAtheist की अपनी एक पोस्ट ‘मनुवाद, इलीटवाद और न्याय’ के पृष्ठ पर गया तो देखा कि उसमें पाठकों के सवालों व राजेंद्र यादव के जवाबों से संबंधित लिंक काम नहीं कर रहा। क्लिक किया तो पता लगा कि संबंधित साइट देशकाल डॉट कॉम से यह स्तंभ ही ग़ायब है, मेरी अन्य कई रचनाएं भी ग़ायब हैं। एक व्यंग्य मौजूद है लेकिन उसमें से भी नाम ग़ायब है। यह मेरे साथ किसी न किसी रुप में चलता ही रहता है। इस बारे में अलग से लिखूंगा। * *बहरहाल, व्यंग्य यहां लगा रहा हूं...
saMVAdGhar संवादघर पर
Sanjay Grover
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वो अजब रात

अपनी मंजिल और आपकी तलाश पर
प्रभात
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सुन्दर मौसम तो बस यादों में ही रह जाते हैं
स्मिता सिन्हा

Shabdankan पर Bharat Tiwari
--
निरपेक्षता का ‘सुमन भाष्य’
शुरु में ही साफ-साफ जान लीजिए, यह आलेख अम्बरीश कुमार पर बिलकुल ही नहीं है। मैं उन्हें नहीं जानता। पहचानता भी नहीं। आज तक शकल नहीं देखी। हाँ नाम जरूर सुना, पढ़ा है...
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी
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बादशाह पर जुर्माना...
डॉ. रश्मि शील

मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal
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काजल कुमार के कार्टून ब्लॉग से-
कार्टून :-
बेशर्म का जनाजा है, अदब से नि‍कले
--
कार्टून :-
अरे बेगानो मुझे पहचानो
--
कालीदास की शकुंतला
--
प्रस्तुतकर्ता रूपचन्द्र शास्त्री मयंक चर्चा मंच पर Sunday, February 19, 2017
--
http://charchamanch.blogspot.in/2017/02/2595.html
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