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अफ़लातून अफ़लू
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Anti-Globalisation activist , General Secretary,Samajwadi Janaparishad
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राज्य सभा में का सभापतित्व उप राष्ट्रपति करते हैं।अब सहारनपुर के सवाल पर राज्य सभा में बोलने की शिद्दत से इजाजत मांगने वाली देश की सबसे बड़ी दलित नेता मायावती की स्थिति को महसूस कीजिए।
रिपब्लिक,टाइम्स नाउ, जी न्यूज की तुलना जरा राज्य सभा चैनल से कीजिएगा।इस चैनल की श्रेष्ठता,स्वायत्तता की वजह राज्य सभा के सभापति (उप राष्ट्रपति) हैं।
इन दो स्थितियों के मद्दे नजर गोपाल गांधी बेहतर उपराष्ट्रपति होंगे।नंदीग्राम,सिंगुर मसले पर राज्यपाल के नाते उनकी पहल बेनजीर थी।

गोपाल गांधी गुजराती से बेहतर तमिल(मां की भाषा) जानते हैं।विक्रम सेठ के प्रसिद्ध उपन्यास द सूटेबल बॉय का हिंदी अनुवाद उन्होंने किया है।

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''होने वाले उप-राष्ट्रपति का संक्षिप्त परिचय

वैंकया नायडू यूँ तो मामूली किसान हैं। RSS के स्वयंसेवक हैं। पैसा नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि है!

लेकिन उनका बेटा हर्ष नायडू भारत में Toyota कारों का सबसे बड़ा डीलर है। हर्ष टोयोटा नाम की इस कंपनी के 13 शहरों मे भव्य शोरूम हैं। हज़ारों करोड़ का टर्नओवर है।

टोयोटा के शोरूम जिसमें भी देखा है, वह 13 शोरूम के मालिक की हैसियत का अंदाज़ा लगा सकता है।

चेन्नई और हैदराबाद के सबसे बड़े शोरूम इनके हैं।

तेलंगाना सरकार ने पुलिस पेट्रोलिंग के लिए जब गाड़ियों का टेंडर निकाला तो यह नहीं लिखा था कि कैसी गाड़ी चाहिए। टेंडर में सीधे टोयोटा इनोवा लिखा था। टेंडर पेपर चैनल के पास आप देख सकते हैं।

उस समय टोयोटा की एकमात्र डीलर होने के कारन इनोवा का यह ठेका वेंकया नायडू के बेटे को मिला।

राष्ट्रीय चैनल पर एक बार ख़बर चली और फिर जाने कैसे सूचना और प्रसारण मंत्री के परिवार के घोटाले की ख़बर ग़ायब हो गई। चैनल पर मुकदमा हो गया। मुकदमा वेंकया के बेटे ने नहीं पुलिस ने किया है। यानी मुक़दमे का ख़र्च भी सरकार का।

ऐसा नहीं है कि वेंकैय्या को बेटे के बिज़नेस से मतलब नहीं है। हर शोरूम के उद्घाटन में जाते हैं। चेन्नई शोरूम के उद्घाटन मे गवर्नर को बुलाया गया। शोरूम के उद्घाटन में गवर्नर के आने का अद्भुत मामला है।

लेकिन नायडू ईमानदार हैं तो हैं।
नागपुर के रेशिमबाग नाले में नहाने और ब्राह्मणों को ख़ुश रखने वाले करप्ट नहीं होते।

ये नायडू परिवार का वह एक बिज़नेस है, जिसके बारे में हम सब जानते हैं। जो और है, वह फिर कभी।

नोट- इतनी स्टडी करके मैं मटीरियल निकाल रहा हूँ और विपक्ष के पेड थिंक टैंक और एनालिस्ट निठल्ले बैठे हैं। मुझे रिसर्चरों और स्टेटिसटिक्स वालों की टीम मिल जाती, तो सचमुच मज़ा आ जाता।''- +dilip mandal​ की फेबु पोस्ट 

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''होने वाले उप-राष्ट्रपति का संक्षिप्त परिचय

वैंकया नायडू यूँ तो मामूली किसान हैं। RSS के स्वयंसेवक हैं। पैसा नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि है!

लेकिन उनका बेटा हर्ष नायडू भारत में Toyota कारों का सबसे बड़ा डीलर है। हर्ष टोयोटा नाम की इस कंपनी के 13 शहरों मे भव्य शोरूम हैं। हज़ारों करोड़ का टर्नओवर है।

टोयोटा के शोरूम जिसमें भी देखा है, वह 13 शोरूम के मालिक की हैसियत का अंदाज़ा लगा सकता है।

चेन्नई और हैदराबाद के सबसे बड़े शोरूम इनके हैं।

तेलंगाना सरकार ने पुलिस पेट्रोलिंग के लिए जब गाड़ियों का टेंडर निकाला तो यह नहीं लिखा था कि कैसी गाड़ी चाहिए। टेंडर में सीधे टोयोटा इनोवा लिखा था। टेंडर पेपर चैनल के पास आप देख सकते हैं।

उस समय टोयोटा की एकमात्र डीलर होने के कारन इनोवा का यह ठेका वेंकया नायडू के बेटे को मिला।

राष्ट्रीय चैनल पर एक बार ख़बर चली और फिर जाने कैसे सूचना और प्रसारण मंत्री के परिवार के घोटाले की ख़बर ग़ायब हो गई। चैनल पर मुकदमा हो गया। मुकदमा वेंकया के बेटे ने नहीं पुलिस ने किया है। यानी मुक़दमे का ख़र्च भी सरकार का।

ऐसा नहीं है कि वेंकैय्या को बेटे के बिज़नेस से मतलब नहीं है। हर शोरूम के उद्घाटन में जाते हैं। चेन्नई शोरूम के उद्घाटन मे गवर्नर को बुलाया गया। शोरूम के उद्घाटन में गवर्नर के आने का अद्भुत मामला है।

लेकिन नायडू ईमानदार हैं तो हैं।
नागपुर के रेशिमबाग नाले में नहाने और ब्राह्मणों को ख़ुश रखने वाले करप्ट नहीं होते।

ये नायडू परिवार का वह एक बिज़नेस है, जिसके बारे में हम सब जानते हैं। जो और है, वह फिर कभी।

नोट- इतनी स्टडी करके मैं मटीरियल निकाल रहा हूँ और विपक्ष के पेड थिंक टैंक और एनालिस्ट निठल्ले बैठे हैं। मुझे रिसर्चरों और स्टेटिसटिक्स वालों की टीम मिल जाती, तो सचमुच मज़ा आ जाता।''- +dilip mandal​ की फेबु पोस्ट 

कश्मीर में हिन्दू-मुस्लिम आधार पर हिंसा को बन्द हुए बरसों हो चुके हैं।विहिप-टाइप संगठन देश के अन्य भागों में कश्मीर के सवाल पर साम्प्रदायिक चश्मे से अफवाह फैलाने की कोशिश जरूर करते हैं। गत दिनों श्रीनगर की जामा मस्जिद में सादी वर्दी में मौजूद एक पुलिस उपाधीक्षक की नृशंस हत्या को भी हाफ पैन्टिए मृतक के नाम के पीछे 'पंडित' लगा होना बता रहे हैं! दर,भट्ट जैसे surname हिन्दू और मुस्लिम दोनों में होते हैं।एक नामी हस्ती 'मिर्ज़ा पंडित धर' भी हुए थे।
कश्मीर यात्रा में पर्यटकों को कई मन्दिर 'टूरिस्ट सर्किट' अन्तर्गत जरूर दिखाए जाते हैं।सभी मन्दिर महफूज हैं।याद आ जाता है कि कश्मीर के मन्दिर को तोड़ने के आरोप की जांच के लिए वरिष्ठ पत्रकार बी जी वर्गीज साहब की सदारत में एक टीम ने दौरा किया था और आरोपों को गलत पाया था।
हमारे कश्मीर प्रवास के दौरान 'खीर भवानी मन्दिर' का वार्षिक मेला था।उस दिन State Holiday था।
पिछले विधान सभा आम चुनाव में लोगों ने घाटी में भरपूर मतदान किया था।फारूख अब्दुल्ला वाले हाल के 7-8 फीसदी वाला मतदान तब नहीं हुआ था।इसकी वजह थी- भारतीय जनता पार्टी।भाजपा के विरोध में वोट लेकर महबूबा मुफ्ती की पार्टी ने जब भाजपा के साथ सरकार बना ली तो लोगों में 'बहुत-काफी-ज्यादा नाराजगी' पैदा हुई।
भारत से गये एक भी सैलानी के साथ कश्मीर में साम्प्रदायिक आधार पर बदसलूकी नहीं होती है।मेरी चुनौती है,एक भी ऐसा वाकया हुआ हो तो बतायें।अब तो कश्मीरी पंडितों के साथ भी विवाद-संघर्ष बंद हो चुका है। मनमोहन सिंह के शासन काल में पंडितों की वापसी की एक योजना कुछ कारगर हुई।घाटी में लौट कर आये पंडितों ने अपनी नौकरियां शुरु की तो उनका वेतन केन्द्र सरकार ने दिया।मोदी के शासन काल में यह प्रक्रिया बन्द हो गई है।
मन्दिरों में तैनात अर्ध सैनिक बलों की मानसिकता की बानगी दे रहा हूं।खीर भवानी मन्दिर मेरी जांच करने वाला सिपाही बोला,'यही मन्दिर तो बचा है'।आदि शंकराचार्य का बनवाया मन्दिर श्रीनगर के निकट एक पहाड़ी पर है।सीढियां बनी हैं।वहां दक्षिण गुजरात के सोनगढ़ का सिपाही तैनात था।मेरे पिताजी जिस गांव में थे वहां के आश्रम विद्यालय से उसने 'उत्तर बुनियादी'(जूनियर हाई स्कूल) पास की थी।हम सीढी नहीं चढ़ पाए तो उसने मुझे अपने पर्स से दो तस्वीरें दिखाईं।एक तस्वीर एक मौजूदा (जिन्दा) शंकराचार्य की थी।सिपाही ने कहा,'मन्दिर इन्हीं का है'।मैंने कहा मन्दिर तो दो हजार साल पुराना बताया जाता है,उसके मालिक का फोटो कैसे खींचा गया होगा?
घाटी के नैसर्गिक नजारों से ज्यादा सुन्दर मुझे वहां के लोग लगे।हजरत बल में मुझसे बहुत अदब से पूछा गया कि मैंने रोजा रखा है अथवा नहीं।पर्यटन ,हस्तशिल्प और खेती मुख्य रोजगार है।श्रीनगर के गांधी आश्रम के खादी भंडार में स्थानीय उत्पादन के सुन्दर ऊनी कपड़े मिले।दुकान में तेन्दुलकर की लिखी 'महात्मा' से कुछ चित्र फोटोस्टैट करके लगाये हुए थे।गोलमेज सम्मेलन में जाते वक्त जहाज की केबिन में मालवीयजी लेटे हुए है और गांधीजी फर्श पर सूत कात रहे हैं।मैंने वहां के कर्मचारियों को बताया कि यह मालवीयजी हैं।एक बुजुर्ग कर्मचारी ने बहुत प्यार से मेरा हाथ चूम लिया। बड़ी बाढ़ के बाद मधु मक्खी पालन फिर से शुरु करने की कोशिश नहीं हुई है।कश्मीरी केशर के पराग से बना मधु केशरिया झंडे वालों के राज में मिलना कठिन तो होगा ही।

रमेश मिश्र बचपन का दोस्त है।मटरगश्ती के दौर में उसने बनारसी कहावत सुनाई,'साधु चले धीरे-धीरे,च्यूंटी बचाए के'।
गंगा-तट पर मैंने कहा,'अफलू चले तीरे-तीरे,टट्टी बचाए के'।
गंगा की गंदगी पर लोहिया जब पांचवे दशक में चिंतित होते थे तब नेहरू कहते,'गंगा कभी मैली हो सकती है?लोहिया गड़बड़ा गए हैं'।लोहिया की गंगा सफाई की एक योजना भी थी। उनकी किताब Interval During Politics में वह लेख था। स्वच्छ गंगा अभियान के लिए प्रो वीरभद्र मिश्र जब सांसदों में अपनी योजना की lobbying करवा रहे थे तब मुझसे वह लेख हासिल कर उसे भी अपनी सामग्री में शामिल किया था।
1985 में राजीव गांधी ने फ्रांस के सहयोग से गंगा सफाई की योजना चालू की।उद्घाटन के दिन अनिल कुमार मिश्र झुन्ना के साथ उन्हें काला झंडा दिखाने में मैं भी गिरफ्तार हुआ।
इस योजना की मौजूदा हालत यह है कि दीनापुर स्थित शहर के गंदे पानी के सफाई संयंत्र से गुजरने के बाद जो पानी गंगा मे मिलने के लिए निकलता है उस पर सरकारी बोर्ड लगा है,'यह पानी किसी उपयोग के लायक नहीं है' ।
इस सरकार ने एक अलग मंत्रालय बनाया है जिसकी मंत्री उमा भारती हैं।उनके एक आध्यात्मिक गुरु का आश्रम अस्सी नदी के गंगा के समागम स्थल पर अवैध तरीके से बना है।गोविंदाचार्य खड़े होकर बनवाते थे।
उत्तराखंड में गंगा पार बने बांध और धाराओं को आपस में जोड़ने के काम से गंगा के अविरल बहने और साफ रहने से कोई संबंध है,यह हाफ पैंटी नही समझना चाहते।

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Political Resolution , 11th Biennial Samajwadi Jan Parishad National Conference held at Jateswar,Distt Alipurduar,Pashchim Banga
The Bhartiya Janta Party has recently won a huge
electoral victory in Uttar Pradesh, a big state, after single handedly forming
the Central Government in 2014; on the other hand the leaders of this party in
power have played a huge role in handing over the ...

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सरल,सहज लेख।मेरे देश का भविष्य न हो।पढीए और मित्र-मण्डली में साझा कीजिए।

लाठी-पत्थर-खून नही, वाद-विवाद की आजादी!


साथियों,

लगभग डेढ़ साल पहले किरोड़ीमल कालेज में अंग्रेजी विभाग द्वारा ‘मुजफफर नगर बाकी है’ फिल्म स्क्रीनिंग करायी जा रही थी। एबीवीपी ने शिक्षकों-छात्रों के साथ मारपीट करते हुए फिल्म स्क्रीनिंग नही होने दी। उसके कुछ समय बाद ही खालसा कालेज थियेटर सोसायटी ‘अंकुर’ के एक नाटक को एबीवीपी ने हिन्दू विरोधी घोषित कर बैन लगवा दिया। देशभक्ती की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली एबीवीपी ने पिछले साल 23 मार्च भगत सिंह शहादत दिवस पर आर्ट फैकल्टी के सामने हो रही सभा में वक्ताओं के साथ मारपीट करते हुए सभा को नही होने दिया। ये डीयू में एबीवीपी द्वारा पिछले डेढ़-दो सालों में की गयी कुछ ‘देशभक्तीपूर्ण कार्यवाहियों’ का संक्षिप्त ब्यौरा है। इसी कड़ी में रामजस कालेज का मौजूदा मामला भी है।

रामजस कालेज में अंग्रेजी विभाग द्वारा ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ नाम से 21-22 फरवरी को दो दिवसीय संमिनार का आयोजन किया गया था। इस सेमिनार में देश में चलने वाले विभिन्न संघर्षो के बारे में बात होनी थी। इसके एक सेशन ‘बस्तर में संघर्ष’ विषय पर बात रखने के लिए उमर खालिद को भी बुलाया गया था। एबीवीपी ने उमर खालिद के आने का विरोध किया जिसके चलते उमर सेमिनार में नही आया परंतु सेमिनार अन्य वक्ताओं की उपस्थिति में चलता रहा। इस पर भी ‘देशभक्त’ एबीवीपी को तसल्ली नही मिली। उसने छात्रों-शिक्षकों को सेमिनार रूम के अंदर बंद करके बाहर से पथराव करना शुरू कर दिया। जिसमें कई छात्रों-शिक्षकों को गंभीर चोटें आयीं। ये सब दिलली पुलिस की मौजूदगी में ही हो रहा था।

अगले दिन पूरी घटना के विरोध में जब डीयू के अन्य छात्रों ने रामजस कालेज के छात्रों के साथ विरोध मार्च निकालने की कोशिश की तो एबीवीपी ने पुनः अपनी चिर-परिचित देशभक्ति दिखाते हुए छात्रों-शिक्षकों पर पथराव किया। छात्रों को पुलिस के सामने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। छात्राओं को गंदी गालियां देते हुए बाल पकड़कर खींचा गया। उनपर अण्डे-जूते फेंके गए। इन ‘देशभक्तिपूर्ण कार्यवाहियों’ के दौरान भी एबीवीपी ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाना नही भूल रहा था।

उसके बाद से ही पुलिस और मीडिया द्वारा पूरे मामले को दो गुटों की लड़ाई के रूप में दिखाया जा रहा है। यानि गुण्डागर्दी करने वाली एबीवीपी व हमलों का शिकार होने वाले आम छात्रों, दोनों को कसूरवार ठहराया जा रहा है। ये लड़ाई दो पक्षों की नही बल्कि इस बात की है कि डीयू में पढ़ाई, वाद-विवाद का माहौल होगा या फिर गुण्डागर्दी और पत्थरबाजी का। ये लड़ाई इस बात की है कि कैम्पसों में असहमतियों को जगह मिलेगी या फिर देशभक्ति व देशद्रोही के नाम पर उनको कुचला जाएगा। और आज हम डीयू के छात्र इसी लड़ाई को लड़ रहे हैं।

कैम्पसों में आवाजों को पहले भी दबाया जाता रहा है लेकिन केन्द्र में फासीवादी मंसूबें पालने वाली बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से ये हमले और अधिक तीखे हुए हैं। एफटीआईआई, हैदराबाद, जेएनयू, जामिया, डीयू हर जगह विरोध व असहमति की आवाज को दबाया जा रहा हे। कहीं ये छुपी गुण्डागर्दी के तहत हो रहा है तो कहीं खुली। एक तरफ शिक्षा बजट-सीटों में कटौती, फीसें बढ़ाकर आम छात्रों से शिक्षा का हक छीना जा रहा है तो दूसरी तरफ इसका विरोध करने वाली हर आवाज को ‘देशद्रोही’ कहकर दबा दिया जा रहा है। और इस तरह पूरा संघ गिरोह कैम्पसों को ‘शाखा’ में तब्दील कर देना चाहता है। जहां सं इन पत्थर बरसाने वालों की तरह के अन्य छात्र तैयार हो सकें।

हम डीयू के छात्र मौजूदा हमले को भी इसी रोशनी में देखते हैं। ये गुण्डा ताकतें खौफ का माहौल पैदा कर हमारी आवाजों को घांेटना चाहती हैं। आइए हम अपनी इंकलाबी एकता से हमारे कैम्पस पर छाए इन काले बादलों के बीच से चमकते सूरज को खींच लाए। गीत गाते, नारे लगाते डीयू की सड़को ये ऐलान करें-

"डीयू कैम्पस हमारा है, एबीवीपी के गुण्डों की जागीर नहीं। "
अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (हमारा दल,समाजवादी जन परिषद इस मंच का हिस्सा है)

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