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अजय कुमार झा
Worked at District and Sessions Judge Office , Delhi
Attended Central School Danapur Cantt
Lived in Krishna Nagar , Delhi
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खामोशियों का शोर बहुत गहरा ,बहुत तीखा होता है ,
चुप रह कर बोलने वाला "सैलाब" सरीखा होता है.....
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एम् सी डी के सफाईकर्मियों की तनखा नहीं मिल पाने का जिम्मेदार वही फोन बाबू है जो आजकल टीवी पे फोन से ही सबकी तनखा पंखा नहीं तनखा बाँट रहा है ....
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Dr. Krishna Pal Tripathi's profile photo
 
ठीक
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सुनो, रुको, देखो, बस बहुत हो चुका , जो करो बस एक बार करो ,
सदियाँ बीत गईं खेलते दोस्ती दुश्मनी , ऊंची और पुख्ता बहुत दीवार करो...

"इधर देखना मना है " ये चस्पा कर देना उस तरफ से ;) ;) ;) ;) 
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अजय कुमार झा

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उफ़  ये  ज़हरीला इश्क  भी न ...बहुत ही  गजब  और अलग  | बढ़िया ....
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#खरीखोटी : राहुल मनाएंगे अपना नया साल यूरोप में
नया साल मनाने के खिलाफ मौलाना जी जारी किया फ़तवा 

हाय राम ;) ;) ;) ;) ये तो मसला हो गया ..अब क्या बौआ फतवा लांघ के जायेंगे  :) :) :) 
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#‎खरीखोटी‬:नीतीश ने अफसरों से कहा कुछ भी करें , अपराध रोकें
चुलबुल पांडे को मुजफ्फरपुर और सिंघम को दरभंगा में पोस्टिंग की सिफारिश
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‪#‎खरीखोटी‬: नया साल "मनाने" यूरोप जायेंगे राहुल गांधी 
सैंटा बैग में बचे हुए गिफ्ट सैकेंड हैण्ड खरीदना उनकी सेकेण्ड प्रायरिटी रहेगी : कांग्रेस
;) ;) ;) ;) 
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अबे कौन कितनी दफा ये सारी धाराएं दफाएँ दिमाग में अपनी झोंक गया
सुना आज किसी ओकील बाबू ने , राम जी पे ही मुकदमा ठोंक दिया ...

जय हो , राम राज से न्याय राज तक ...सब राज़ ही राज़ है प्यारे
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अजय कुमार झा

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सबसे बडा सच यही  है  कि  किताबों की  अहमियत सभी को  नहीं  मालूम होती 
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‪#‎खरीखबर‬ : जल्दी ही राहुल संभालेंगे कांग्रेस की कमान 
बस ..................................एक बार ...बालिग हो जाएँ..
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Hemant Kumar Chaurasia's profile photo
 
कृपया आप यह भी आश्वस्त करें कि आपके अनुसार उनके लिए बालिग होने की उम्र कितनी निश्चित है।तब तक धैर्य रखने को आतुर रह सकूँ।
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#‎खरीखोटी‬: एल जी की बात न माने केंद्र सरकार : आप
 एल जी की माने नहीं , ए सी बी की सुने नहीं , एम् सी डी को देखे नहीं

अबे  तो क्या सिर्फ सैलरी बढाने के लिए ई छुपनछुपाई खेले थे क्या बे
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मैं घुमक्कड़ी करते हुए बहुत सारे स्थानों पर जा चूका हूँ और उनमें निश्चित रूप से बहुत से पहाडी स्थल भी थे , किन्तु अब चूंकि पूरी फुर्सत में पहाड़ों को जानने  और समझने ही गया था सो सब कुछ बहुत ध्यान से देख और समझ रहा था | लगभग एक सी जीवन शैली , एक ही जैसी दुकानें , एक ही जैसी जरूरतें और एक सी आदतें , कुछ कुछ को छोड़कर सबमें एक वही एक सी बात मगर वो एक सी बात का सम्मोहन भी अजब था और हमेशा से रहा होगा  , तभी पहाड़ शुरू से देव और मनुष्यों को अपनी ओर खींचते रहे थे | 
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पिछली गर्मियों की छुट्टीयों में अचानक ही पहाड़ों की सैर का बना कार्यक्रम कैसे आगे बढ़ रहा था ये आप इन और इन पोस्टों में पहले ही पढ़ देख चुके हैं | शिमला , कुफरी आदि के बाद स्वाभाविक रूप से अगला पड़ाव था मनाली | बुलबुल की तबियत अब...
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अभी मुझमें कहीं बाकी है थोडी सी जिंदगी ....................................................
Introduction

यदि एक पंक्ति में कहूं तो , एक आम आदमी जिसकी कोशिश है कि इंसान बना जाए , शेष कुछ नहीं । पिताजी फ़ौज में थे और माता गृहणि , माता पिता की दूसरे नंबर की संतान , प्रारंभ से ही पिताजी के साथ उनके नियमित स्थानांतरण के कारण लगभग पूरे भारत में भ्रमण और केंद्रीय विद्यालयों में अध्य्यन । वक्त ने करवट लिया और शहरों की खाक छानते छानते , उस वक्त ग्राम्य जीवन की शुरूआत हुआ जब यकायक ही परिवार ने गांव की ओर प्रस्थान किया । यौवन और संघर्ष के दिन , कॉलेज और युनिवर्सटी के दिन , जो भी बीते वो ग्राम्य जीवन से ही जुडे रहे और मैं भी भीतर तक जुडा रहा कहीं गांव की मिट्टी , पोखर , पवन और सब कुछ से ।

ऐतिहासिल ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय के साथ प्रतिष्ठा स्नातक की शिक्षा के बाद , मित्रों के समूह के साथ ही वर्ष 1996 में दिल्ली की ओर प्रस्थान । लक्ष्य था खुद को साबित और स्थापित करना । पत्रकारिता में डिप्लोमा लेने के दौरान ही ,वर्ष 1998 में  सरकारी सेवा में नियुक्ति हो गई । संप्रति , दिल्ली की अधीनस्थ जिला न्यायालय में बतौर वरिष्ठ न्यायिक सहायक पदस्थापित हूं और साथ साथ ही विधि की शिक्षा भी जारी है ।

पढने लिखने का शौक कब हुआ नहीं जानता ठीक ठीक । विद्यालय में कभी मेधावी छात्र नहीं रहा , मगर बचपन में कॉमिक्स , लडकपन में विजय विकास , कर्नल रंजीत , गुलशन नंदा जैसे उपन्यासों के बाद , जहां शैक्षणिक पाठ्यक्रम ने अंग्रेजी साहित्य के करीब किया तो बाद के दिनों में हिंदी साहित्य दिले के भीतर तक बस गया । संपादक के नाम हज़ारों पत्र , दोस्तों को सैकडों चिट्ठियां लिखने की आदत ने आगे जागर लेख , कहानियां , कविताएं , व्यंग्य , और जाने क्या क्या कितना लिखवा , पढना और लिखना आदत से अब एक जुनून सा बन गए हैं , लगता है कि जिंदगी कम है और किताबें ज्यादा तो जिंदगी खत्म होने से पहले जितना पढूं , जितना लिखूं कम है । समय बदला और कलम कागज की जगह ये टकटक कंप्यूटर ने ले लिया , यात्रा बदस्तूर जारी है , बिना थके , बिना रुके ……………

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